प्रस्तावना – उत्तर प्रदेश की सड़कों पर आजकल गाड़ियां कम पलटती हैं, और पुलिस की मनगढ़ंत ‘कहानियां’ ज्यादा गढ़ी जाती हैं। क्या आपने यूपी पुलिस की वह ‘ब्लॉकबस्टर स्क्रिप्ट’ सुनी है? यह स्क्रिप्ट इतनी घिसी-पिटी हो चुकी है कि अब तो शायद बॉलीवुड के ‘बी-ग्रेड’ फिल्मों के फ्लॉप लेखक भी इसे चुराने से कतराएं। कहानी कुछ यूं शुरू होती है: खूंखार मुजरिम पुलिस की जीप से जा रहा था।

अचानक, किसी ‘रहस्यमयी’ और ‘अदृश्य’ शक्ति के प्रभाव से गाड़ी पलट गई। या फिर, मुजरिम को अचानक लघुशंका (वॉशरूम) जाने की तीव्र इच्छा हुई और उसने मौका पाते ही ‘सुपरमैन’ की फुर्ती से दरोगा जी की सरकारी पिस्तौल छीन ली।
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न्याय का ‘एनकाउंटर’: Allahabad High Court on UP Police की सख्त टिप्पणी और ‘ठोको नीति’ की असलियत
इसके बाद वह भागता है, पुलिस ‘पूर्ण आत्मरक्षा’ में अपनी आंखें बंद करके गोली चलाती है और… चमत्कार! ‘एनकाउंटर’ या फिर यूपी पुलिस का पैर में हाफ एनकाउंटर (UP Police half encounter in leg) मुकम्मल हो जाता है। यह सब कुछ इतनी सटीकता से होता है मानो किसी ने स्टॉपवॉच लगाकर रिहर्सल की हो। लेकिन, तालियों की गड़गड़ाहट और सोशल मीडिया के ‘स्वैग’ के बीच, न्याय के मंदिर से एक ऐसी आवाज उठी है जिसने इस पूरे ‘सिंघम’ वाले तिलिस्म को चकनाचूर कर दिया है।
हाल ही में, यूपी पुलिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court on UP Police) का जो रुख सामने आया है, उसने न केवल पुलिस महकमे बल्कि पूरी व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। निर्भीक इंडिया की इस विस्तृत और तीखी पड़ताल में, आइए समझते हैं कि कैसे न्यायपालिका ने इस ‘मनोरंजन’ पर रोक लगाने की चेतावनी दी है और ‘इंस्टेंट जस्टिस’ के नाम पर पर्दे के पीछे क्या खेल चल रहा है।
‘स्क्रिप्टेड’ बहादुरी और कोर्ट का आईना
ऐसा लगता है कि अपराधियों ने कसम खा रखी है कि वे पुलिस कस्टडी में ही शौच का बहाना बनाएंगे और पुलिस की कमर से बंधी पिस्तौल को खिलौने की तरह निकाल लेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा ‘इत्तेफाक’ होता है, वह यह है कि अपराधी की चलाई गई गोली हमेशा हवा में उड़ जाती है या पुलिस की बुलेटप्रूफ जैकेट को चूमकर निकल जाती है, लेकिन पुलिस की गोली अचूक होती है वह सीधा सीने या घुटने का ही पता पूछती है। पिस्तौल छिनने का यह ‘शुभ मुहूर्त’ इतना अचूक और नाटकीय होता है कि देश की सबसे बड़ी अदालतें भी भौचक्की रह जाएं। यही कारण है कि अब न्यायपालिका के सब्र का बांध टूट चुका है।
मुख्य विशेषताएँ: ‘ठोको नीति’ का विश्लेषण और अदालती तमाचा
इस पूरे ‘एनकाउंटर राज’ की बखिया उधेड़ते हुए, कुछ बेहद अहम और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिन पर हर उस नागरिक को विचार करना चाहिए जो तालियां बजाकर इस ‘इंस्टेंट न्याय’ का जश्न मनाता है:
- न्यायपालिका की सख्त फटकार: व्यवस्था में जब पुलिस खुद ही अदालत बन जाए, तो न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी भी कांप उठती है।
- वीरता या अपराध?: प्रमोशन और गैलेंट्री मेडल की अंधी दौड़ ने पुलिसिंग के मूल ढांचे (जांच और साक्ष्य) को खत्म कर दिया है।
- हाफ एनकाउंटर का चलन: जान से मारने की जगह, घुटने में गोली मारकर ‘जिंदा लाश’ बना देने का नया ‘ट्रेंड’, जो कानूनी पचड़ों से बचने का पुलिसिया शॉर्टकट है।
- मुआवजे का खेल: फर्जी एनकाउंटर साबित होने पर पुलिस की जेब से नहीं, बल्कि आम जनता के टैक्स के पैसों से हर्जाना भरा जाता है।
- राजनीतिक नफा-नुकसान: एनकाउंटर अब कानून-व्यवस्था का टूल नहीं, बल्कि चुनाव जीतने और ‘माहौल’ बनाने का सबसे बड़ा पीआर (PR) स्टंट बन चुका है।
अदालत की दहाड़: जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की सिंगल बेंच (Justice Arun Kumar Deshwal single bench) का कड़ा संदेश
न्याय की चौखट पर जब ‘ठोको नीति’ की फाइल पहुंची, तो अदालत ने जो कहा, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने लायक है। जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की सिंगल बेंच (Justice Arun Kumar Deshwal single bench) ने यूपी पुलिस की इस स्वयंभू ‘वीरता’ की बखिया उधेड़ते हुए बेहद सख्त और तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में आईना दिखाते हुए कहा कि, “पुलिस कानून से ऊपर नहीं है। सजा देना न्यायपालिका का काम है, पुलिस का नहीं।”
माननीय अदालत ने साफ किया कि सिर्फ आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन पाने, छाती पर गैलेंट्री मेडल सजाने या सोशल मीडिया और अखबारों के पहले पन्ने पर ‘सुर्खियां’ बटोरने के लिए अपनी सर्विस रिवॉल्वर से गोली चलाना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।
यूपी पुलिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court on UP Police) की यह टिप्पणी इस बात का प्रमाण है कि ‘कानून के राज’ (Rule of Law) और ‘पुलिस के राज’ (Police State) के बीच की लकीर अब धुंधली हो चुकी है। क्या पुलिस का काम सबूत इकट्ठा करके मुजरिम को कटघरे में खड़ा करना है, या फिर बीच चौराहे पर खुद ही ‘जजमेंट’ पास कर देना?
सरकार का तर्क: “सामने से गोली आएगी तो…”
अदालत की इस फटकार के विपरीत, सूबे के मुखिया, सीएम योगी आदित्यनाथ जी और उनकी सरकार का तर्क बिल्कुल अलग और आक्रामक है। उनका मंचों से अक्सर यही कहना होता है कि “सामने से गोली आएगी तो पुलिस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगी।” बिल्कुल सही बात है मुख्यमंत्री जी! आत्मरक्षा का अधिकार तो भारत का संविधान हर नागरिक को देता है, पुलिस तो फिर भी वर्दीधारी बल है।
लेकिन, यहाँ सवाल ‘आत्मरक्षा’ का नहीं, ‘पैटर्न’ का है। कमाल का इत्तेफाक तो यह है कि यह ‘आत्मरक्षा’ हमेशा एक ही तरह की स्क्रिप्ट का पालन क्यों करती है? ऐसा कैसे संभव है कि हथकड़ी लगा हुआ, निहत्था और पुलिस की भारी जीप में चार हट्टे-कट्टे जवानों के बीच बैठा हुआ कोई मुजरिम अचानक ‘जेम्स बॉन्ड’ बन जाता है? यह ‘ठोको नीति’ की जिद अब न्याय व्यवस्था का उपहास उड़ा रही है। जब अपराध नियंत्रण के नाम पर राज्य खुद एक हत्यारा बन जाए, तो समाज में खौफ अपराधियों का नहीं, बल्कि खाकी वर्दी का पनपने लगता है।

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ बनने की अंधी दौड़ और मेडल की भूख
उत्तर प्रदेश में आजकल महकमे के भीतर ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ होना एक अलग ही ‘स्वैग’ और रसूख का प्रतीक बन गया है। जो अधिकारी सड़कों पर खून बहाता है, उसे रातों-रात हीरो बना दिया जाता है। इस अंधी दौड़ का एक जीता-जागता उदाहरण हैं डिप्टी एसपी डीके शाही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट (Deputy SP DK Shahi encounter specialist)। इनकी ‘उपलब्धियों’ का ग्राफ किसी कॉर्पोरेट सीईओ के टारगेट अचीवमेंट से भी ज्यादा तेज भागता है।
70 से अधिक कुख्यात अपराधियों का एनकाउंटर, झोली में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन, और छाती पर गर्व से सजे 5 गैलेंट्री (वीरता) मेडल! यह आंकड़ा सुनकर किसी भी फिल्म के ‘कॉप यूनिवर्स’ के निर्देशक को रश्क हो जाए। साल 2024 के ही पन्ने पलट लें; उन्नाव के अनुज प्रताप सिंह से लेकर मथुरा के पंकज यादव के एनकाउंटर तक, हर एक ‘गोलीकांड’ के बाद पुलिसकर्मियों को भारत सरकार या राज्य सरकार से ‘वीरता पदक’ का प्रसाद बंट जाता है।
तार्किक रूप से सोचिए, जब इनाम के तौर पर मेडल, शोहरत, प्रमोशन और समाज में ‘बाहुबली’ वाली छवि मुफ्त में बंट रही हो, तो भला कौन सा पुलिस अधिकारी महीनों तक सबूत जुटाने, गवाहों को सुरक्षित रखने और सालों साल कोर्ट में गवाही देने का उबाऊ और मेहनत भरा काम करना चाहेगा? यूपी पुलिस का पैर में हाफ एनकाउंटर (UP Police half encounter in leg) तो एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ बन गया है जिसमें मुजरिम मरता भी नहीं है (जिससे मानवाधिकार वालों का ज्यादा हल्ला न मचे) और पुलिस अधिकारी की ‘दहशत’ भी कायम हो जाती है। यह न्याय नहीं है, यह एक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ है।
2006 का वो खौफनाक सच: ‘राजा राम’ की चीखें आज भी गूंजती हैं
जो लोग वातानुकूलित कमरों में बैठकर, ट्विटर (X) पर ‘ठोक दो’ लिखकर तालियां पीटते हैं, उन्हें यह लगता है कि हर एनकाउंटर में सिर्फ ‘दुर्दांत अपराधी’ और माफिया ही मारे जाते हैं। अगर आपको भी यही मुगालता है, तो जरा 2006 के एटा के उस ‘फर्जी एनकाउंटर’ के पन्ने पलट लीजिए।
राजा राम नाम का एक सीधा-साधा, गरीब बढ़ई, जिसका जरायम की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं था, वह पुलिस की अपनी वर्दी पर मेडल टांकने की हवस और गोली का शिकार हो गया। उसे खूंखार डकैत बताकर मार गिराया गया। उसकी विधवा पत्नी ने न्याय की आस में 16 साल तक अदालतों की चौखट पर अपनी एड़ियां रगड़ीं। अपने आंसू पिए, धमकियां सहीं। तब जाकर आख़िरकार सीबीआई कोर्ट ने गाजियाबाद में 9 पुलिसवालों को फर्जी एनकाउंटर का दोषी माना और आजीवन कारावास व 5 साल की सजा सुनाई।
सोचिए, जब रक्षक ही अपनी वर्दी को चमकाने और प्रमोशन की लालच में भक्षक बन जाएं, तो एक आम, गरीब आदमी न्याय की गुहार लगाने किसके दरवाजे पर जाए? क्या उस राजा राम के खून के छींटे उन तालियों पर नहीं पड़े थे, जो उस दिन उस फर्जी एनकाउंटर पर बजाई गई थीं?
मानवाधिकार और सियासत: एक खतरनाक कॉकटेल
इस पूरे मकड़जाल में पुलिस एनकाउंटर पर एनएचआरसी गाइडलाइंस (NHRC guidelines on police encounter) की धज्जियां किस तरह उड़ाई जाती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं कि हर एनकाउंटर की मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए, एफआईआर दर्ज होनी चाहिए और स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए। लेकिन यूपी में ये गाइडलाइंस महज एक ‘सुझाव’ बनकर रह गई हैं, जिनका पालन केवल फाइलों का पेट भरने के लिए किया जाता है।
जब कोई एनकाउंटर फर्जी साबित हो जाता है, तो NHRC पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश देता है। लेकिन जरा ठहरिए! क्या आपको लगता है कि वह 5 लाख या 10 लाख रुपये का मुआवजा गोली चलाने वाले उस ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ की तनख्वाह या संपत्ति से काटा जाता है? बिल्कुल नहीं! वह पैसा सरकारी खजाने से जाता है—यानी आपके और मेरे द्वारा भरे गए इनकम टैक्स और जीएसटी के पैसों से। यानी, पुलिस शौक से निर्दोषों को मारे, और उसका हर्जाना आम जनता भरे। यह कैसी व्यवस्था है?
विपक्ष का प्रहार और एक्सपोज होती ‘स्क्रिप्ट’
इस ज्वलंत मुद्दे पर राजनीतिक गलियारों में भी आग लगी हुई है। सपा नेता उदयवीर सिंह का बयान (SP leader Udayveer Singh statement) इस पूरे परिदृश्य पर एक बेहद सटीक तंज है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि पुलिस की ‘हथियार छीन कर भागने’ वाली यह रटी-रटाई कहानी अब पूरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है। जनता अब इस ‘खराब पटकथा’ पर हंसने लगी है।
सपा नेता की यह चेतावनी बिल्कुल जायज है कि जो अधिकारी आज सत्ता के नशे में चूर होकर सत्ताधारियों को खुश करने के लिए फर्जी एनकाउंटर कर रहे हैं और तालियां बटोर रहे हैं, जब सत्ता बदलेगी या जब स्वतंत्र जांच का हथौड़ा चलेगा, तो कल वे ही जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे होंगे। एटा का राजा राम कांड इसका सबसे बड़ा सबूत है। राजनीति में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन हत्या का दाग ताउम्र वर्दी पर चिपका रहता है।
निष्कर्ष: वाहवाही या बर्बादी? आगे की राह
यूपी पुलिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court on UP Police) की यह कड़ी टिप्पणी महज़ एक अदालती आदेश नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के लिए खतरे की घंटी है। सोशल मीडिया पर ‘ठोक दो’, ‘गाड़ी पलट दो’ लिखकर तालियां पीटने वाली उस ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ की जनता को अब यह समझना होगा कि न्याय में देरी यकीनन हमारे सिस्टम की एक बड़ी नाकामी है। अदालतों में करोड़ों केस पेंडिंग हैं, न्याय मिलने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं। लेकिन, इस नाकामी का समाधान ‘इंस्टेंट एनकाउंटर’ या सड़क किनारे पुलिस द्वारा दी गई ‘गोली की सज़ा’ कतई नहीं हो सकता।
हमें यह खौफनाक हकीकत स्वीकार करनी होगी कि जिस दिन यह ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ सरकारी पिस्तौल आपके या मेरे किसी जानने वाले, किसी ‘राजा राम’ जैसे निर्दोष की तरफ घूमेगी, उस दिन यह सारी फर्जी वाहवाही और जश्न मातम में बदल जाएगा। तब कोई मेडल या कोई राजनेता आपके आंसू पोंछने नहीं आएगा।
लोकतंत्र को एक ‘पुलिस स्टेट’ (Police State) में बदलने का यह खूनी खेल बेहद खतरनाक है। असली पुलिसिंग अपराधियों को सजा दिलाना है, खुद जल्लाद बनना नहीं। निर्भीक इंडिया का यह मानना है कि समय रहते अगर हम और हमारी व्यवस्था नहीं चेती, तो वह दिन दूर नहीं जब हम न्याय के लिए अदालतों की तरफ नहीं, बल्कि पुलिस थानों के बाहर खड़ी ‘पलटने वाली जीपों’ की तरफ खौफ से देख रहे होंगे।
नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
एमएजेएमसी

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