प्रस्तावना : हर साल की तरह इस बार भी 8 मार्च को सोशल मीडिया से लेकर संसद तक ‘नारी शक्ति’ का ऐसा जयघोष हुआ, मानो देश की सारी समस्याएं एक ही दिन में सुलझ गई हों। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (International Women Day 2026) के अवसर पर बधाइयों का जो सैलाब उमड़ा, वह किसी ‘ब्लॉकबस्टर’ फिल्म की शानदार स्क्रिप्ट जैसा था।

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International Women Day 2026 : ‘नारी शक्ति’ के शोर में दबती ‘पुरुषों’ की चीखें और खोखली समानता का सच
कहीं गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने महिला विधायकों को 2 करोड़ रुपये का अतिरिक्त विकास अनुदान (Grant) बांट दिया, तो कहीं त्रिपुरा में ‘नारी सुरक्षा और सम्मान’ अभियान लॉन्च हो गया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता शिखर सम्मेलन में नजर आए। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपनी ‘एक्स’ (X) हैंडल की चाबियां महिला वैज्ञानिकों और शतरंज खिलाड़ी वैशाली को सौंप दीं और खुद को माताओं-बहनों के आशीर्वाद से ‘सबसे अमीर व्यक्ति’ घोषित कर दिया।
लेकिन, ‘निर्भीक इंडिया’ आज एक कड़वा सवाल पूछना चाहता है: यह सारा प्यार, ये सारे ग्रांट, ये सारे समिट केवल एक विशेष लिंग (Sex) के लिए ही क्यों? समानता (Equality) की बात करने वाले इस देश में जब 19 नवंबर यानी अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस (international men’s day) आता है, तो यह सारा सरकारी खजाना और हमदर्दी किस बिल में छुप जाती है?
क्यों पुरुषों को अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए केवल ‘लोन’ (जिसका ब्याज चुकाते-चुकाते उनकी कमर टूट जाए) मिलता है, जबकि महिलाओं को ‘ग्रांट’ (मुफ्त अनुदान) थमा दिया जाता है? यह लेख केवल एक समाचार नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम, समाज और न्यायपालिका के दोगलेपन पर एक तमाचा है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं के पीछे का राजनीतिक ढोंग
इस साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 थीम (international women’s day 2026 theme) कुछ भी रही हो, लेकिन असली थीम सिर्फ एक थी—वोट बैंक की राजनीति। जब विराट कोहली जैसे दिग्गज 8 मार्च को घरेलू हिंसा के खिलाफ ‘मूक दर्शक’ न बनने की अपील करते हैं, या नमो ड्रोन दीदी की तारीफें होती हैं, तो सब तालियां पीटते हैं।
लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (international women’s day) पर उमड़ने वाला यह सारा प्यार अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस (international mens day) पर कहाँ गायब हो जाता है? क्या 12 साल से देश चला रही सरकार एक दिन के लिए अपना ‘एक्स’ (X) हैंडल किसी ऐसे आम आदमी को नहीं दे सकती, जो फर्जी मुकदमों और सिस्टम की प्रताड़ना का शिकार हुआ हो? ताकि वह वह सच लिख सके, जिसे यह सिस्टम 12 सालों से छिपा रहा है?
मुख्य विशेषताएँ: जब ‘समानता’ बन जाए एक तरफा मजाक
हमारी व्यवस्था में महिलाओं के नाम पर होने वाले इस ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की कुछ कड़वी सच्चाइयां इस प्रकार हैं:
ग्रांट बनाम लोन का खेल: महिला विधायकों को 2-2 करोड़ का फंड, महिला उद्यमियों को बिना गारंटी के ग्रांट, लेकिन एक युवा पुरुष अगर बीमारी या शिक्षा के बाद स्टार्टअप करना चाहे, तो बैंक उसे धक्के मार कर ‘लोन’ की फाइलों में उलझा देते हैं।
- सहानुभूति का सिंड्रोम: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (international women’s day 2026) पर हर नेता अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं (international women day wishes) देता है, लेकिन क्या किसी नेता ने 19 नवंबर को पुरुषों के संघर्ष पर दो शब्द भी बोले हैं?
- खेलों में भी दिखावा: जब महिला विश्व कप 2025 (women world cup 2025) जैसी प्रतियोगिताएं आती हैं, तो ‘महिला सशक्तिकरण’ का झंडा बुलंद किया जाता है, लेकिन पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर कोई ‘वर्ल्ड कप’ या अभियान नहीं चलता।
- न्याय का तराजू: हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस (international day of women judges) पर बहुत बातें हुईं, लेकिन क्या इन न्यायाधीशों ने कभी उन झूठे मुकदमों पर स्वतः संज्ञान लिया है जो केवल पतियों को ब्लैकमेल करने के लिए दर्ज कराए जाते हैं?
- सोशल मीडिया का दिखावा: महिला दिवस 2026 (women day 2026) पर हर महिला को देवी बना दिया जाता है, लेकिन पुरुषों को केवल एक ‘एटीएम मशीन’ या ‘संभावित अपराधी’ की नजर से देखा जाता है।

मानव शर्मा, राजा रघुवंशी और अतुल सुभाष… ये केवल नाम नहीं, सिस्टम के मुंह पर तमाचा
जब हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (international women day 2026) का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन पुरुषों की लाशों को नहीं भूलना चाहिए जिन्हें इस ‘नारीवादी’ कानून ने निगल लिया। क्या आपको मानव शर्मा, राजा रघुवंशी और अतुल सुभाष के नाम याद हैं?
ये वे पुरुष थे जिन्होंने अपनी पत्नियों के ‘एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर’ (Extra-marital affairs), उनके प्रेमियों की धमकियों और ‘महिला कार्ड’ (Women/Victim Card) के खौफनाक खेल के आगे घुटने टेक दिए और मौत को गले लगा लिया।
जब एक पुरुष की पत्नी उसे धोखा देती है, उसका प्रेमी उसे धमकाता है, और बेशर्मी से ‘विक्टिम कार्ड’ खेलती है, तब यह ‘इडियट इंडियन लॉ’ (Idiot Indian Law) और हमारी महान न्यायपालिका अंधी क्यों हो जाती है? जब एक बेगुनाह आदमी अपनी पत्नी के झूठे मुकदमों से तंग आकर पंखे से लटक जाता है, तब कोई डब्ल्यूएचओ (WHO) मानवाधिकारों की बात क्यों नहीं करता?
ऐसे समय में कितनी महिलाएं आगे आकर जिम्मेदारी लेती हैं? चरित्रहीनता को ‘व्यक्तिगत पसंद’ बताकर ढक दिया जाता है, लेकिन उसी चरित्रहीनता के कारण जब एक पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है, तो कोई मोमबत्ती लेकर इंडिया गेट पर क्यों नहीं जाता?
इतिहास के पन्नों से: ‘अधिकारों’ की लड़ाई से ‘हथियार’ बनने तक का सफर
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (international women’s day) का इतिहास 1908 के मजदूर आंदोलन से जुड़ा है, जब 15,000 महिलाओं ने न्यूयॉर्क शहर में काम के घंटे कम करने, बेहतर वेतन और वोट देने के अधिकार की मांग को लेकर मार्च किया था। उस समय यह मांग जायज थी। 1911 में इसे पहली बार आधिकारिक तौर पर मनाया गया। इसका उद्देश्य महिलाओं को समान नागरिक अधिकार दिलाना था।
लेकिन आज? आज महिला दिवस 2026 (women day 2026) तक आते-आते यह दिन एक ‘कॉरपोरेट पीआर स्टंट’ और ‘जेंडर अपीजमेंट’ (Gender Appeasement) का हथियार बन गया है। आज कई मामलों में ‘नारी शक्ति’ के नाम पर बनाए गए कानून (जैसे 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम, भरण-पोषण कानून) का इस्तेमाल कुछ महिलाएं अपने पति और उसके परिवार को प्रताड़ित करने, धन ऐंठने और ‘लीगल टेररिज्म’ (Legal Terrorism) फैलाने के लिए कर रही हैं।
यह हम नहीं कह रहे, बल्कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इन कानूनों के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई है। इतिहास में जो दिन समानता के लिए बना था, आज वह विशेषाधिकार (Privilege) की मांग का दिन बन गया है।
निष्कर्ष: आगे की राह – दोमुंही नीति का अंत कब?
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 (International Women Day 2026) के इस मौके पर ‘निर्भीक इंडिया’ का यह लेख किसी महिला के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सड़े हुए ‘सिस्टम’ और सरकार के खिलाफ है जो इंसान को इंसान नहीं, बल्कि वोट बैंक और ‘सेक्स’ (Sex) के चश्मे से देखता है।
अगर सरकारें सच में ‘समानता’ चाहती हैं, तो महिला विधायकों की तरह पुरुष विधायकों को भी ग्रांट दें। बीमार, बेरोजगार और स्टार्टअप शुरू करने की चाह रखने वाले पुरुषों के लिए भी बिना गारंटी के अनुदान की व्यवस्था करें।
अगर 8 मार्च को महिलाओं को ‘एक्स’ हैंडल दिया जा सकता है, तो 19 नवंबर (अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस – international men’s day) को वह हैंडल उन पिताओं, पतियों और भाइयों को दें जो अदालतों के चक्कर काट-काट कर अपनी आधी जिंदगी गंवा चुके हैं। जब तक देश का कानून और समाज ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने वालों को सिर पर बिठाएगा और मानव शर्मा या अतुल सुभाष जैसे निर्दोष पुरुषों की मौतों पर आंखें मूंदे रहेगा, तब तक यह समानता का नारा एक भद्दा मजाक ही रहेगा।
शर्म आनी चाहिए ऐसे दोहरे मापदंड वाले समाज और व्यवस्था को, जहाँ न्याय का तराजू लिंग देखकर झुकता है। क्या आप एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बने रहना चाहेंगे जो एकतरफा जश्न मनाती है और दूसरे की चीखें अनसुनी कर देती है? सोचिएगा जरूर।
लेखक- नवनीत मिश्र (एम0ए0जे0एम0सी0) पत्रकार व मीडिया शोधार्थी

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