देख रहे हैं आप? यूपी विधानसभा का एआई कैमरा (UP assembly AI Camera) आने वाला है। दावा किया जा रहा है कि यह एआई कैमरा विधायकों की उपस्थिति, भाषण और गतिविधियों को पूरी तरह पारदर्शी बना देगा। सुना आपने? अब विधायक जी कब आएंगे, कब सोएंगे, कब जागेंगे और कब मोबाइल पर स्क्रोल करेंगे – सबका हिसाब किताब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) रखेगा। वाह! जैसे जनता अब तक सोई हुई थी और अब जाकर "सुपर कैमरे" हमें सच्चाई दिखाएंगे।

लेकिन ज़रा सोचिए – यह सारा खेल कितना हास्यास्पद (sarcastic) है। दुनिया भर की उन्नत तकनीक के नाम पर कैमरे लगाए जाएंगे, प्रोफाइल बनाई जाएगी, और डेटा एनालिसिस होगा। मगर सवाल वही – क्या वाकई इससे पारदर्शिता आएगी या बस टेक्नोलॉजी का एक और दिखावा होगा?
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यूपी विधानसभा का एआई कैमरा (UP assembly AI Camera) के जादू से जनप्रतिनिधि होंगे कर्तव्यनिष्ठ
सरकार का कहना है कि यूपी विधानसभा का एआई कैमरा (UP assembly AI Camera) इस मानसून सत्र से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू होगा और शीतकालीन सत्र में पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इसमें चेहरे पहचानने वाली फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (Facial Recognition Technology) होगी। हर विधायक का नाम, दल, निर्वाचन क्षेत्र, जन्मतिथि, फोटो और निजी विवरण सिस्टम में फीड किया जाएगा।
वाह जी वाह! यानी अब विधायक जी का पूरा डिजिटल बायोडाटा (Digital Bio-data) हमारे सामने होगा। कितने घंटे सदन में रहे, किन मुद्दों पर बोले और कितनी बार कुर्सी पर ऊँघते पाए गए – सबका रिकॉर्ड रहेगा।
लेकिन सवाल ये उठता है – क्या जनता को अब तक यह नहीं पता कि विधायक सदन में कितने सक्रिय या निष्क्रिय हैं? क्या यह पारदर्शिता जनता की आँखों से छिपी हुई थी जिसे अब कैमरे दिखाएँगे?
यूपी विधानसभा का एआई कैमरा (UP assembly AI Camera) : पारदर्शिता या नौटंकी?
यूपी विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना जी का बयान बड़ा रोचक है। वे कहते हैं – “यह निगरानी नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास है। विधायक पहले से ही जनता की नज़रों में हैं, इसलिए किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”
वाह साहब! यानी जनता की नज़रों से जो पारदर्शिता नहीं दिखती, वह अब विदेशी कैमरों और एआई सिस्टम से दिखेगी? तंज़ यह है कि जनता तो दशकों से विधायक जी की “पारदर्शिता” देखती आई है – विकास के नाम पर घोषणाएँ, भाषण में बड़े-बड़े वादे और हकीकत में टूटी सड़कें, बदहाल अस्पताल और खाली रोजगार मेलों का हाल।
टेक्नोलॉजी का फर्जी आत्मविश्वास (False Confidence of Technology)
अब आइए असली मुद्दे पर। हम एआई (AI) और डिजिटल इंडिया (Digital India) के बड़े-बड़े झंडे लहराते हैं। मगर हकीकत यह है कि भारत के पास न तो अपना ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System) है, न अपना ऐप स्टोर (App Store/Play Store)। यहां तक कि सोशल मीडिया (Social Media) प्लेटफॉर्म्स भी विदेशी कंपनियों के कब्जे में हैं।
तो ज़रा सोचिए, यूपी विधानसभा का एआई माडल (UP assembly AI model) आखिर किस तकनीक पर चलेगा? कैमरे किसके होंगे? डेटा किसके सर्वर पर जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल – इस डेटा का इस्तेमाल कौन करेगा?
क्या यह सिस्टम वाकई भारत का होगा या फिर किसी विदेशी कंपनी की तकनीक पर आधारित? यानी विधायक जी तो “पारदर्शी” होंगे, मगर सिस्टम चलाने वाले पूरी तरह अपारदर्शी!
जनता को लुभाने का नया नारा (New Slogan to Lure People)
यह टेक्नोलॉजी ऐसे बेची जा रही है जैसे भारत ने खुद का “होममेड एआई” बना लिया हो। जैसे हम सिलिकॉन वैली को टक्कर देने वाले हों। लेकिन असलियत तो यह है कि भारत अब भी तकनीकी गुलामी से जूझ रहा है।
जैसे जनता को पहले “डिजिटल इंडिया” का सपना दिखाया गया, फिर “मेक इन इंडिया” का, अब “एआई इंडिया” का नया पैकेज पेश है।
विधायक बनाम एआई
मान लीजिए कैमरों ने बता दिया कि अमुक विधायक रोज देर से आते हैं और भाषण नहीं देते। तो क्या इससे उनके टिकट कटेंगे? क्या इससे राजनीति का चरित्र सुधरेगा? असल में, यह पूरा तामाशा केवल यह दिखाने के लिए है कि विधानसभा “हाई-टेक” हो गई है। जैसे कोई होटल अपने गेट पर इलेक्ट्रॉनिक बेल लगा ले और दावा करे कि अब वहां चोरी नहीं होगी
सवाल उठता है कि एआई (AI) से विधानसभा सुधरेगी या नहीं? शायद नहीं। क्योंकि असली सुधार तब होगा जब नेता अपने काम से जवाबदेह होंगे, न कि कैमरों से। जब कानून बनाने की नीयत होगी, न कि केवल रिकॉर्ड रखने की।
निष्कर्ष
यूपी विधानसभा का एआई माडल (UP assembly AI model) सुनने में भले ही भविष्य की तकनीक जैसा लगे, पर हकीकत में यह टेक्नोलॉजी शोकेस (Technology Showcase) से ज्यादा कुछ नहीं। जनता को “पारदर्शिता” का सपना दिखाया जा रहा है, जबकि असल पारदर्शिता तो तब आएगी जब विधायक और सरकार अपने वादों और काम पर खरे उतरेंगे।
दुनिया के सबसे उन्नत कैमरे भी उस सच्चाई को नहीं पकड़ सकते जो जनता रोज अपनी गलियों और मोहल्लों में देख रही है।
यह लेख लिख है - नवनीत मिश्रा
पत्रकार एवं मीडिया शोधार्थी
एम.ए.जे.एम.सी.

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