पूर्वांचल-विद्युत निगम समेत यूपी में बिजली निजीकरण की प्रक्रिया पर विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, गोरखपुर ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण को प्रबंधन और निजी घरानों के बीच एक “मिली भगत” करार दिया है।

निर्भीक इंडिया (संवाददाता गोरखपुर)- समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से यूपी में बिजली निजीकरण को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। उनका आरोप है कि यूपी में बिजली निजीकरण की पूरी प्रक्रिया एकतरफा है, जिसका आधार स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 नामक एक ऐसा दस्तावेज है जो पूरी तरह से निजी कंपनियों के पक्ष में बनाया गया है। संघर्ष समिति ने इस दस्तावेज को सार्वजनिक करने और इस पर आम उपभोक्ताओं तथा बिजली कर्मियों की राय लेने की मांग भी उठाई है।
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यूपी में बिजली निजीकरण : प्रक्रिया पर मिलीभगत का आरोप
संघर्ष समिति का कहना है कि यूपी में बिजली निजीकरण के लिए तैयार किया गया स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 कई गंभीर सवाल खड़े करता है। समिति ने दावा किया है कि इस दस्तावेज के प्रावधानों का पालन करने पर सरकार को कई वर्षों तक निजी कंपनियों को वित्तीय सहायता देनी पड़ेगी।
कर्मचारी संघ ने आरोप लगाया कि: अरबों का खर्च: निजी कंपनियों को मुनाफे में लाने के लिए सरकार को ‘ट्रांजिशन सपोर्ट’ के नाम पर कम से कम 5 से 7 वर्ष तक सस्ती दरों पर बिजली आपूर्ति करनी होगी। यह अवधि तब तक बढ़ सकती है जब तक निजी कंपनियां लाभ में न आ जाएं, और इस पर सरकार को अरबों रुपए खर्च करने पड़ेंगे।
सरकार पर देनदारियों का बोझ: निजी घरानों को ‘क्लीन बैलेंस शीट’ दी जाएगी, जिसका अर्थ है कि निगमों के घाटे और देनदारियों का पूरा बोझ सरकार अपने ऊपर ले लेगी।
कम दाम पर जमीन: निजी कंपनियों को निगमों की सारी जमीन बेहद कम दामों पर उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे सरकार को राजस्व का नुकसान होगा।
टैरिफ में वृद्धि: कर्मचारियों की सेवान्त सुविधाओं (टर्मिनल बेनिफिट्स) का भुगतान भी निजी कंपनियों द्वारा टैरिफ के माध्यम से उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाएगा, जिससे बिजली की दरें बढ़ेंगी।
संघर्ष समिति के अनुसार, यह डॉक्यूमेंट एक ऐसा जाल है जिसमें फंसकर सरकार को हर साल अरबों-खरबों रुपए निजी कंपनियों को देने पड़ेंगे, जबकि घाटे का सारा दायित्व सरकार का रहेगा और आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ेगा।

यूपी में बिजली निजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव पर संदेह
संघर्ष समिति ने प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव पर भी संदेह जताया है। भारत सरकार ने 14 मई 2025 को विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण हेतु स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 जारी किया। कर्मचारियों को यह जानकारी मिली है कि पावर कॉरपोरेशन ने पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल निगमों के लिए जो आरएफपी (RFP) डॉक्यूमेंट बनाया है, वह इसी नए दस्तावेज पर आधारित है।
संघर्ष समिति ने याद दिलाया कि इससे पहले जब ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट का चयन हुआ था, तब निजीकरण का आधार स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2020 बताया गया था। कंसल्टेंट के चयन और आरएफपी डॉक्यूमेंट तैयार होने के बीच, आधार दस्तावेज को बदलकर 2025 कर दिया गया। इस बदलाव को देखते हुए संघर्ष समिति ने मांग की है कि निजीकरण की पूरी प्रक्रिया को तत्काल रद्द किया जाए और स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट 2025 को सार्वजनिक किया जाए, क्योंकि इसी के आधार पर 42 जनपदों की बिजली व्यवस्था निजी हाथों में सौंपी जा रही है।
संघर्ष समिति के पदाधिकारियों, जिनमें सीबी उपाध्याय, इस्माइल खान, पुष्पेन्द्र सिंह, जीवेश नन्दन सहित अन्य कई नाम शामिल हैं, ने बताया कि उनकी यह लड़ाई 278 दिनों से चल रही है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन और शासन के कुछ उच्च अधिकारी निजी घरानों के साथ मिलकर सरकार को अंधेरे में रखकर यह निर्णय थोपना चाहते हैं।
यह विरोध प्रदर्शन दर्शाता है कि बिजली निजीकरण का मुद्दा न सिर्फ कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा है, बल्कि इसका सीधा असर सरकारी राजस्व और आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा।

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