10 मई 2026 का दिन पूर्वांचल के चिकित्सा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने वह कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पूर्व तक इस क्षेत्र में असंभव मानी जाती थी।

पूर्वांचल में पहली बार गर्भस्थ शिशु का इलाज (Treatment of unborn baby)
चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐसा चमत्कार प्रस्तुत किया है जिसने आम जनमानस में एक नई आशा का संचार किया है। क्या गर्भ के अंदर बच्चे का इलाज संभव है? इस जटिल प्रश्न का उत्तर देते हुए एम्स के विशेषज्ञों ने इंट्रायूटेराइन ट्रांसफ्यूजन (Intrauterine Blood Transfusion) तकनीक का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। यह पूर्वांचल में पहली बार गर्भस्थ शिशु का इलाज होने का गौरवपूर्ण क्षण है, जहां एक अजन्मे शिशु को मौत के मुंह से सुरक्षित वापस लाया गया है।
कुशीनगर जनपद की एक संघर्षशील महिला के लिए यह मातृत्व का सफर अत्यंत पीड़ादायक और चुनौतियों से भरा रहा था। वह चौथी बार गर्भवती थीं, लेकिन इससे पहले की उनकी सभी गर्भावस्थाएं एक गहरे शोक में परिवर्तित हो चुकी थीं।
बार-बार अपनी संतानों को खोने का जो असीम दुख इस परिवार ने झेला था, उसने उनकी उम्मीदों को लगभग समाप्त कर दिया था। इस बार जब उन्होंने गर्भधारण किया, तो खुशियों से अधिक एक अनजाना भय उनके मन में व्याप्त था। आम लोगों के संघर्ष और उनकी व्यथा को गहराई से समझने वाले इस उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थान ने उनकी इस चिंता को गंभीरता से लिया और एक सघन जांच प्रक्रिया का आरंभ किया।
एम्स की एंटीनैटल ओपीडी में जब इस पीड़ित माता का परीक्षण हुआ, तो विशेषज्ञों ने विस्तृत और गहन जांच की। इस चिकित्सीय परीक्षण में ‘इनडायरेक्ट कूंब्स टेस्ट’ (Indirect Coombs Test) सकारात्मक पाया गया। यह एक अत्यंत चिंताजनक संकेत था। इसके तत्काल बाद चिकित्सकों ने नियमित डॉप्लर अल्ट्रासाउंड के माध्यम से निरंतर निगरानी आरंभ कर दी।
कुछ ही समय में यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया कि इस बार भी गर्भ में पल रहे शिशु को गंभीर एनीमिया (रक्ताल्पता) ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। शिशु के रक्त कण अत्यंत तीव्र गति से नष्ट हो रहे थे, जिसके कारण उसके नन्हे हृदय की विफलता और गर्भ में ही मृत्यु का भयावह संकट उत्पन्न हो गया था।
इस अत्यंत गंभीर परिस्थिति में RH Isoimmunization का इलाज (Treatment for RH Isoimmunization) ही शिशु को बचाने का एकमात्र विकल्प था। पूर्व में ऐसे जटिल और जीवनरक्षक उपचार के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के मरीजों को विवश होकर लखनऊ जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। यह न केवल आर्थिक रूप से बोझिल था, बल्कि समय के अभाव के कारण कई बार यह देरी प्राणघातक भी सिद्ध होती थी।
परंतु अब, एम्स गोरखपुर प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की तत्परता से यह बाधा दूर हो गई है। यह उपलब्धि इस बात का सशक्त प्रमाण है कि उन्नत चिकित्सा अब महानगरों की परिधि से बाहर निकलकर पूर्वांचल के सुदूर क्षेत्रों के नागरिकों की सुलभ पहुँच में आ रही है।

जटिल प्रक्रिया का सफल निष्पादन: पूर्वांचल में पहली बार गर्भस्थ शिशु का इलाज
गर्भ में पल रहे शिशु की जान कैसे बचाएं, यह चुनौती किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। जैसे किसी गंभीर एनीमिया से ग्रसित वयस्क रोगी को शिराओं (नसों) के माध्यम से रक्त चढ़ाकर नवजीवन प्रदान किया जाता है, ठीक उसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर परंतु अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर यह प्रक्रिया अपनाई गई।
इस जटिलतम शल्य क्रिया में माता के गर्भ के भीतर पल रहे शिशु की जीवन रेखा, अर्थात् गर्भनाल (Umbilical Cord) तक विशेष और अत्याधुनिक तकनीक की सहायता से सावधानीपूर्वक पहुँच बनाई गई। गर्भ में बच्चे को खून चढ़ाना (Blood transfusion to baby inside womb) कोई साधारण कार्य नहीं है। यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का वह विस्मयकारी स्वरूप है जिसमें उस नन्हीं जान का उपचार किया गया जिसने अभी इस दुनिया में अपनी पहली सांस भी नहीं ली है।
इस अत्यंत जटिल एवं जीवनरक्षक प्रक्रिया को साकार करने का वास्तविक श्रेय डॉ. प्रीति बाला सिंह को जाता है। डॉ. सिंह, जो कि एम्स में मातृ एवं भ्रूण चिकित्सा (Maternal Fetal Medicine) की नोडल अधिकारी और स्त्री प्रसूति रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर हैं, ने अपने अदम्य साहस और निपुणता का उत्कृष्ट परिचय दिया।
पूरी शल्य क्रिया के दौरान एक क्षण के लिए भी सतर्कता में कमी नहीं आने दी गई। विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक समर्पित टीम द्वारा भ्रूण की प्रत्येक धड़कन, उसके रक्त प्रवाह की गति और माता की शारीरिक स्थिति पर निरंतर और निर्बाध निगरानी रखी गई। यह गोरखपुर एम्स में भ्रूण का इलाज (Fetal treatment in Gorakhpur AIIMS) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ है।
इस एम्स गोरखपुर ऐतिहासिक उपलब्धि (AIIMS Gorakhpur historic achievement) के पीछे कुशल नेतृत्व और दृढ़ मार्गदर्शन की अत्यंत अहम भूमिका रही है। संस्थान की कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ मेजर जनरल प्रोफेसर (डॉ.) विभा दत्ता के दूरदर्शी मार्गदर्शन ने इस असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को धरातल पर संभव बनाया।
इसके साथ ही, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) शिखा सेठ के सजग नेतृत्व और निर्देशन में पूरी टीम ने एक अद्भुत सामंजस्य के साथ कार्य किया। एक उत्कृष्ट संस्थान वही होता है जहां का नेतृत्व अपने सहयोगियों को निरंतर नवाचार के लिए प्रेरित करता है, और एम्स गोरखपुर ने इस जीवनरक्षक कार्यप्रणाली के माध्यम से यही सिद्ध किया है।
किसी भी शल्य क्रिया, विशेषकर जहां रक्त की तत्काल आवश्यकता हो, वहां ब्लड बैंक की भूमिका सर्वोपरि और जीवनदायिनी होती है। इस विशिष्ट मामले में, अजन्मे शिशु के लिए अत्यंत विशिष्ट प्रकार के रक्त की तुरंत आवश्यकता थी।
इस बड़ी चुनौती को डॉ. सौरभ मूर्ति के अथक प्रयासों और तत्परता ने पूर्ण किया। उनके इस महत्वपूर्ण योगदान के बिना इस इंट्रा-यूटेराइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन (Intrauterine Blood Transfusion) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूर्ण करना अत्यंत दुष्कर था।
इसके अतिरिक्त, सीनियर रेजिडेंट डॉ. राम रुंडला, विभाग के अन्य वरिष्ठ एवं कनिष्ठ रेजिडेंट्स तथा नर्सिंग अधिकारियों की टीम ने दिन-रात एक करके इस टीमवर्क का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसने शिशु के प्राणों की रक्षा की।
एक नई आशा का उदय: पूर्वांचल में पहली बार गर्भस्थ शिशु का इलाज से भविष्य की राह
मातृ एवं भ्रूण चिकित्सा पूर्वांचल (Maternal and Fetal Medicine Purvanchal) के क्षेत्र में एम्स गोरखपुर अब एक नई वैचारिक और प्रायोगिक क्रांति का सूत्रधार बन रहा है। यह मात्र एक सफल शल्य क्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुदृढ़ आधारशिला रखने का सार्थक प्रयास है।
इसी दूरगामी सोच के अंतर्गत, इसी वर्ष प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में ‘मैटरनल-फीटल मेडिसिन’ में दो वर्षीय पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप (PDF) पाठ्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया गया है। यह पूर्वांचल के चिकित्सा जगत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण शैक्षणिक छलांग है। इस उच्च स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत डॉ. राम रुंडला ने अपना प्रशिक्षण भी आरंभ कर दिया है, जो भविष्य में इस क्षेत्र को और अधिक विशेषज्ञ एवं संवेदनशील चिकित्सक प्रदान करेगा।
चिकित्सा विशेषज्ञों के दृष्टिकोण से यदि मूल्यांकन किया जाए तो, भ्रूण चिकित्सा विज्ञान (Fetal Medicine Science) आधुनिक युग का सबसे बड़ा और कल्याणकारी चमत्कार है। यह विज्ञान हमें प्रकृति के उस रहस्यमयी आवरण के भीतर झांकने और सकारात्मक हस्तक्षेप करने की शक्ति प्रदान करता है जो अब तक मानवीय पहुँच से सर्वथा परे माना जाता था।
पूर्वांचल में चिकित्सा विज्ञान (Medical science in Purvanchal) का यह उभरता हुआ स्वरूप उन लाखों माताओं के लिए एक सच्चा वरदान है जो जटिल गर्भावस्थाओं के कारण अपने मातृत्व सुख से वंचित रह जाती थीं। यूपी में पहली बार गर्भ में बच्चे का इलाज (First-time treatment of baby in womb in UP) होने से अब पूरे राज्य में चिकित्सा के नए और सर्वोच्च मानदंड स्थापित हुए हैं।
इस गौरवमयी और ऐतिहासिक उपलब्धि पर अपनी गहन प्रसन्नता व्यक्त करते हुए संस्थान की निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) विभा दत्ता ने संपूर्ण चिकित्सा दल को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। उन्होंने प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग, फीटल मेडिसिन टीम, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग, रेजिडेंट चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
उनका यह कथन अत्यंत प्रासंगिक और मर्मस्पर्शी है कि यह सफलता केवल एम्स संस्थान के लिए ही गर्व का विषय नहीं है, अपितु यह संपूर्ण पूर्वांचल की संघर्षशील माताओं और उनके गर्भस्थ शिशुओं के लिए उन्नत एवं जीवनरक्षक चिकित्सा सेवाओं की एक नई और स्वर्णिम दिशा का स्पष्ट निर्धारण है। जटिल गर्भावस्था का इलाज पूर्वांचल में अब एक सुलभ और सुरक्षित वास्तविकता बन गया है।
निष्कर्षतः, इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलता के साथ एम्स गोरखपुर की मैटरनल-फीटल मेडिसिन यूनिट अत्यंत तीव्र गति से अपनी सेवाओं का विस्तार कर रही है। यह अब केवल एक अस्पताल का सामान्य विभाग नहीं रह गया है, बल्कि पूर्वांचल में जटिल और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के लिए एक उभरते हुए उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) के रूप में स्वयं को मजबूती से स्थापित कर रहा है।
‘पूर्वांचल में पहली बार गर्भस्थ शिशु का इलाज’ शीर्षक मात्र एक सूचनात्मक समाचार नहीं है, बल्कि यह उन सभी बेबस, शोषित और निराश परिवारों के लिए एक सशक्त संदेश है कि अब उन्हें अपने अजेय जीवन संघर्ष में अकेले नहीं लड़ना होगा; आधुनिक चिकित्सा विज्ञान उनके द्वार पर एक रक्षक बनकर खड़ा है।

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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