बिजली निजीकरण के विरोध में विद्युत कर्मचारियों का आंदोलन लगातार 290 दिनों से जारी है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, गोरखपुर के नेतृत्व में पूरे प्रदेश के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

निर्भीक इंडिया (संवाददाता गोरखपुर)- कर्मचारियों का आरोप है कि निजीकरण की राह पर चल रही सरकार उत्पीड़न की कार्रवाई कर रही है, जिसमें वेतन रोकना और बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी शामिल है।
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बिजली निजीकरण के विरोध पर वेतन रोकने और छंटनी से गुस्सा
संघर्ष समिति ने बताया कि निजीकरण के विरोध में चल रहे इस आंदोलन के कारण प्रबंधन ने दमन का रास्ता अपना लिया है। गोरखपुर सहित पूरे प्रदेश में हजारों बिजली कर्मियों को पिछले तीन महीनों (जून, जुलाई, और अगस्त) का वेतन नहीं दिया गया है।
समिति ने इसे “अमानवीय” और “उत्पीड़न की पराकाष्ठा” बताया है। संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि फेसियल अटेंडेंस के नाम पर कई कर्मचारियों के वेतन रोके गए हैं।
निजीकरण के नाम पर बड़े पैमाने पर संविदा कर्मचारियों की छंटनी भी की गई है। 55 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हजारों संविदा कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि कई अन्य की डाउनसाइजिंग के नाम पर नौकरी चली गई है।
समिति का कहना है कि संविदा कर्मियों को इस तरह हटाने से प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
बिजली निजीकरण: स्मार्ट मीटर और विरोध की वजह
संघर्ष समिति का यह भी कहना है कि निजी घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए कर्मचारियों और पेंशनरों के आवासों पर जबरदस्ती स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि यह कदम कर्मचारियों को मिल रही रियायती बिजली सुविधा को समाप्त करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
संघर्ष समिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता और कर्मचारियों के खिलाफ की गई सभी उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयां निरस्त नहीं की जातीं।
विरोध प्रदर्शन का व्यापक असर
आज, 290वें दिन, बिजली कर्मियों ने प्रदेश के विभिन्न जिलों और परियोजनाओं जैसे वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, बस्ती, अलीगढ़, मथुरा, झांसी, बरेली और अन्य जगहों पर व्यापक विरोध प्रदर्शन किया।
ये प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि कर्मचारी अपनी मांगों पर अडिग हैं और इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या कर्मचारियों की मांगों पर कोई विचार किया जाता है।


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