बिजली विभाग निजीकरण को लेकर विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, गोरखपुर (Vidyut Karmchari Sanyukt Sangharsh Samiti, Gorakhpur) ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के प्रस्तावित निजीकरण को रोकने की अपील की है। संघर्ष समिति ने इसके पीछे चंडीगढ़ में हाल ही में हुए बिजली के निजीकरण की विफलता का हवाला दिया है, जिसे निजीकरण के पक्ष में एक 'टेस्ट केस' के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कर्मियों का कहना है कि यह निर्णय 42 गरीब जिलों पर एक 'विफल प्रयोग' थोपने जैसा है।

निर्भीक इंडिया संवाददाता (नवनीत मिश्र) – संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि ओडिशा, उत्तर प्रदेश के आगरा और ग्रेटर नोएडा सहित देश के कई अन्य हिस्सों में भी बिजली विभाग निजीकरण के प्रयास पहले ही विफल हो चुके हैं। उनका कहना है कि चंडीगढ़ का अनुभव इस बात का ताजा सबूत है कि निजीकरण उपभोक्ताओं के लिए लाभकारी नहीं है।
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बिजली विभाग निजीकरण एक ‘विफल’ प्रयोग : विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति
संघर्ष समिति गोरखपुर के संरक्षक इस्माइल खान ने बताया कि चंडीगढ़ में बिजली का निजीकरण (Chandigarh bijli ka nijikaran) 1 फरवरी 2025 को गोयनका की एमीनेंट पॉवर कंपनी लिमिटेड को सौंपा गया था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि निजीकरण के बाद 24 घंटे निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति सुनिश्चित होगी। हालांकि, मात्र छह महीने में ही स्थिति पूरी तरह से बदल गई है।
इस्माइल खान के मुताबिक, चंडीगढ़ में अब आए दिन 2 से 6 घंटे तक की बिजली कटौती हो रही है, जिससे आम नागरिक भीषण गर्मी में परेशान हैं। उन्होंने चंडीगढ़ की मेयर हरप्रीत कौर बाबला के बयान का भी उल्लेख किया, जिन्होंने कहा है कि निजीकरण के बाद शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं है और कंपनी की हेल्पलाइन भी निष्क्रिय हो गई है। चंडीगढ़ रेजिडेंट एसोसिएशन वेलफेयर फेडरेशन के अध्यक्ष हितेश पुरी ने भी घरेलू उपभोक्ताओं, खासकर गरीबों के लिए, बिजली कटौती में वृद्धि पर चिंता जताई है।

बिजली विभाग निजीकरण के विरोध मे समिति ने उठाए कुछ सवाल
संघर्ष समिति के सह-संयोजक प्रभुनाथ प्रसाद ने दावा किया कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के लिए तैयार किया गया आरएफपी (RFP) दस्तावेज चंडीगढ़ के आरएफपी पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि चंडीगढ़ में ₹22,000 करोड़ की परिसंपत्तियों को बेचने के लिए मात्र ₹124 करोड़ की रिजर्व प्राइस रखी गई थी और अंत में यह विभाग केवल ₹871 करोड़ में बेच दिया गया।
संघर्ष समिति गोरखपुर के कोषाध्यक्ष संगमलाल मौर्य ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में ₹1 लाख करोड़ की परिसंपत्तियों के लिए मात्र ₹6500 करोड़ की रिजर्व प्राइस रखी गई है। उन्होंने इस दस्तावेज को ‘लूट का दस्तावेज’ करार दिया और इसे तत्काल रद्द करने की मांग की।
उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग निजीकरण के पिछले अनुभव
संघर्ष समिति गोरखपुर के कार्यवाहक संयोजक जीवेश नन्दन ने जोर देकर कहा कि 42 गरीब जिलों पर निजीकरण का भयावह प्रयोग करने से पहले उत्तर प्रदेश में पहले से लागू ग्रेटर नोएडा और आगरा के निजीकरण की समीक्षा की जानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि ग्रेटर नोएडा में खराब प्रदर्शन के कारण सरकार निजीकरण का करार रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा लड़ रही है। इसी तरह, आगरा में टोरेंट पॉवर कंपनी ने पॉवर कॉर्पोरेशन का ₹2200 करोड़ का राजस्व हड़प लिया है और कंपनी को लागत से कम मूल्य पर बिजली देने के कारण कॉर्पोरेशन को ₹10 हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है।
इन विफलताओं के आलोक में, संघर्ष समिति ने कहा कि यह जरूरी है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल के निजीकरण का निर्णय तुरंत वापस लिया जाए। आज वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज और आगरा सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में निजीकरण के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किए गए, जिसमें बड़ी संख्या में विद्युत कर्मी शामिल थे।

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