हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने दिल्ली की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने का एक आदेश जारी किया है, जिसने हमारे समाज के एक खास वर्ग को बेचैन कर दिया है। यह वो संभ्रांत वर्ग है जो अपनी एयर-कंडीशंड कारों में बैठकर, शाम की चाय के साथ, सोशल मीडिया पर कुत्तों के प्रति अपने "प्यार" का प्रदर्शन करना पसंद करता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उनके इस पवित्र जज़्बे पर एक करारा प्रहार है। वे इसे "अमानवीय" और "क्रूर" बता रहे हैं और अब ट्विटर पर "जस्टिस फॉर डॉग्स" का नारा लगा रहे हैं।

यह कैसा “प्यार” है, जो सिर्फ दिखावे का है? ये वही लोग हैं जो पिज्जा खाते हुए गरीब बस्तियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों की “आजादी” की वकालत करते हैं। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने उनकी इस “दया” की दुकान पर ताला लगाने का काम किया है।
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) के फैसले पर कड़वी सच्चाई और ‘मीठी’ वकालत के बीच की जंग
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने अपने आदेश में एक बेहद सीधी और तार्किक बात कही है: सड़कें इंसानों के लिए हैं, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और दृष्टिहीन लोगों की सुरक्षा के लिए। लेकिन यह बात हमारे ‘पशु प्रेमियों’ को पसंद नहीं आई। आखिर, उनका काम सड़कों पर कुत्तों को बिरयानी खिलाकर अपनी दरियादिली दिखाना है, फिर चाहे उसी सड़क पर किसी बच्चे को रेबीज से मौत हो जाए या किसी बुजुर्ग को कुत्ता काट ले।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 20,000 लोग रेबीज से मरते हैं, जिनमें से अधिकांश भारत में होते हैं। वहीं, भारत में सालाना लगभग 22 लाख लोगों को कुत्तों के काटने की घटनाएं होती हैं। लेकिन इन आँकड़ों से क्या फर्क पड़ता है, जब मामला “भावनाओं और संवेदनाओं” का हो?
ये तथाकथित डॉग लवर्स (dogs lover) हमेशा एक ही बात कहते हैं कि कुत्तों को सड़कों से हटाना समस्या का समाधान नहीं है। तो फिर क्या है? क्या समाधान यह है कि हम हर दिन किसी बच्चे की चीख सुनें, किसी गरीब का इलाज पर पैसा खर्च होता देखें? क्या समस्या का समाधान यह है कि हम सड़कों पर बिना डर के चल भी न पाएँ? यह एक ऐसा दिखावा है, जहाँ समस्या की गंभीरता को अनदेखा कर सिर्फ भावनात्मक नारे लगाए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ऑर्डर पर डॉग लवर्स (dogs lover) की ‘दया’ की दुकान और दिखावे की असलियत
इनमें से कई ‘पशु प्रेमी’ वही लोग हैं जो डिनर में चिकन टिक्का और मटन खाते हैं। उनकी थाली में मांस होता है, लेकिन जब बात सड़कों पर रहने वाले कुत्तों की आती है, तो उनके अंदर का डॉग लवर्स (dogs lover) जाग जाता है। यह कैसी दया है जो सिर्फ कुछ खास जानवरों के लिए है? यह कैसा प्रेम है जो पिंजरे में बंद जानवरों को मारकर खाने को तो सही मानता है, लेकिन उन्हीं की प्रजाति के एक आवारा जानवर की “आजादी” को छीनना बर्दाश्त नहीं कर सकता?
यह एक तरह का ‘वर्चुअल सिग्नलिंग’ है, जहाँ दिखावा असल जिम्मेदारी से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर इन लोगों को कुत्तों की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें अपने घरों में ही रख लें। कोर्ट ने यह नहीं कहा कि कुत्तों को मार दो, बल्कि यह कहा कि उन्हें शेल्टर होम में रखो। यह फैसला कुत्तों और इंसानों, दोनों के लिए बेहतर है। लेकिन ये ‘डॉग लवर्स’ ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि घर में कुत्तों को रखना महंगा और थकाऊ काम है। बाहर खाना खिलाना सस्ता है और फोटो भी अच्छी आती है।
एक सच्चा समाधान या सिर्फ हंगामा?
सुप्रीम कोर्ट का आदेश न सिर्फ इंसानों की सुरक्षा के लिए है, बल्कि कुत्तों के लिए भी एक सुरक्षित और स्थिर जीवन सुनिश्चित करता है। सड़क पर रहने वाले कुत्ते अक्सर बीमार होते हैं, भूखे रहते हैं और गाड़ियों से कुचले जाते हैं। शेल्टर होम में उन्हें नसबंदी, सही देखभाल और भोजन मिल सकता है।
लेकिन ‘डॉग लवर्स’ का उद्देश्य समाधान ढूंढना नहीं, बल्कि हंगामा करना है। यह हंगामा उनकी दिखावे वाली “मानवता” को जिन्दा रखता है। जब एक देश की सर्वोच्च अदालत (supreme court) को नागरिकों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह हमारे समाज की विफलता को दर्शाता है। यह दिखाता है कि हमने ‘भावनात्मकता’ को ‘तर्क’ से ऊपर रख दिया है। उम्मीद है कि यह आदेश केवल एक कागजी कार्यवाही बनकर नहीं रह जाएगा, बल्कि एक ऐसी पहल बनेगा जो सड़कों को इंसानों और कुत्तों दोनों के लिए सुरक्षित बनाएगी।
लेख- नवनीत मिश्र
(पत्रकार व मीडिया शोधार्थी एम0ए0जे0एम0सी0)

निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 245 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।

निर्भीक इंडिया केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उन मूल्यों का पुनर्जन्म है जो सदियों पुराने हैं। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) द्वारा पंजीकृत, हमारे सफर की औपचारिक शुरुआत जून 2023 में हुई। तकनीकी रूप से हम अभी नए हैं, लेकिन हमारी वैचारिक जड़ें अत्यंत गहरी और समृद्ध हैं।
हम उस पत्रकारिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं जिसका लिखित इतिहास 244 साल पुराना है। हम उस निर्भीकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के माध्यम से सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। हमारा उद्देश्य आज के दौर में उसी स्पष्टवादिता और साहस को जीवित रखना है। हम सिर्फ खबरें नहीं पहुँचाते, बल्कि समाज के सामने सच का आईना रखते हैं।
आइए, निर्भीक पत्रकारिता के इस अभियान में हमारे साथ जुड़ें और एक जागरूक भारत के निर्माण में सहभागी बनें।
———————————————————————————————————————–
Nirbhik India is a registered newspaper with the Registrar of Newspapers for India (RNI), officially embarking on its journey in June 2023. While we may be “young” in terms of our registration date, the spirit of journalism we represent is centuries old.
We carry forward a 244-year-old legacy of fearless reporting—a tradition that empowered visionaries like Raja Ram Mohan Roy to challenge deep-rooted social evils like Sati and child marriage. Even as a new entrant in the digital and print space, our commitment remains rooted in that same historic courage.
We don’t just report the news; we uphold the truth without fear or favor. Join us in this mission to revive authentic journalism. Be a part of our journey as we strive to keep the flame of truth burning bright in modern India.
Connect with us and support the voice of integrity.

You must be logged in to post a comment.