प्रस्तावना- भारतीय टेलीविज़न पत्रकारिता आज एक ऐसे अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ी है, जहाँ उसके समक्ष दो स्पष्ट मार्ग हैं। एक मार्ग जनहित, सत्य और निष्पक्ष समाचारों का अत्यंत कठिन तथा पथरीला मार्ग है, जबकि दूसरा सनसनी, शोरगुल और भ्रामक चमक से भरा सुगम राजमार्ग है। अत्यंत खेद का विषय है कि अधिकांश प्रमुख समाचार चैनलों ने बिना किसी नैतिक हिचक के इस दूसरे मार्ग का चयन कर लिया है।

टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP): परिचय और समस्या का गहन विश्लेषण
परिणामस्वरूप, जो समाचार कक्ष (Newsrooms) कभी सत्य और तथ्य के अन्वेषण के पवित्र केंद्र हुआ करते थे, वे आज दर्शकों की भावनाओं से खेलने और उन्हें दिग्भ्रमित करने के कारखानों में तब्दील हो गए हैं।
इस संपूर्ण वैचारिक पतन के केंद्र में केवल एक ही लक्ष्य स्थापित है टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP), जिसने पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों को विज्ञापन और मुनाफे की वेदी पर चढ़ा दिया है।
टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (Television Rating Point – TRP) का अर्थशास्त्र और मायाजाल
इस गंभीर पतन को गहराई से समझने के लिए इसके मूल आर्थिक कारण को समझना आवश्यक है। टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (Television Rating Point – TRP), जो मूल रूप से किसी कार्यक्रम की लोकप्रियता और दर्शकों की संख्या मापने का एक तकनीकी पैमाना मात्र हुआ करती थी, आज वह समाचार चैनलों के लिए जीवन और मरण का प्रश्न बन गई है।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा जारी किए जाने वाले इस जादुई आंकड़े पर ही मीडिया उद्योग के हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापनों का भविष्य टिका होता है। विज्ञापनदाता केवल उन्हीं चैनलों पर अपना धन लुटाते हैं जिनकी रेटिंग सबसे ऊपर होती है। इसी व्यवस्था ने पत्रकारिता को एक जन-सेवा से हटाकर एक विशुद्ध व्यावसायिक उत्पाद बना दिया है।
टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP) और समाचारों की विकृत परिभाषा
इस टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP) ने समाचार की पूरी परिभाषा को ही विकृत करके रख दिया है। आज के समय में समाचार वह नहीं है जो देश, समाज और आम जनता के लिए महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, समाचार वह बन गया है जो दर्शकों को टेलीविजन स्क्रीन से किसी चुंबक की तरह चिपकाए रखे।
इस अवांछित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए चैनलों को चाहे कितना ही झूठ, कितनी ही नफरत और कितनी ही मूर्खता क्यों न परोसनी पड़े, वे इससे तनिक भी पीछे नहीं हटते। हाल के वर्षों में रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट जैसे वैश्विक अध्ययनों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि भारतीय टेलीविज़न न्यूज़ पर जनता का विश्वास लगातार कम हो रहा है, जिसका मुख्य कारण यही आधारहीन और चीखती-चिल्लाती रिपोर्टिंग है।
टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP): विश्लेषण और समाधान
यह संपूर्ण स्थिति केवल मीडिया उद्योग की आंतरिक समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए एक बेहद अशुभ और खतरनाक संकेत है। एक अच्छी तरह से सूचित और जागरूक नागरिक ही एक परिपक्व लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव होता है।
लेकिन, जब सूचना प्रदान करने वाले सर्वोच्च संस्थान ही जनमानस को सनसनी और सस्ते मनोरंजन के नाम पर गुमराह करने लगें, तो लोकतांत्रिक चेतना स्वतः ही कमजोर पड़ने लगती है। वर्ष 2020 में सामने आए कुख्यात टीआरपी घोटाले (TRP Scam) ने इस व्यवस्था के संगठित अपराध को भी उजागर किया था, जहाँ यह आरोप लगे थे कि अनैतिक तरीकों से रेटिंग को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया था। यह सिद्ध करता है कि मुनाफे के लिए कुछ भी किया जा सकता है।
प्राइम टाइम की बहस (Prime Time Debates) और बौद्धिक दिवालियापन (Intellectual Bankruptcy)
इस पतन का सबसे वीभत्स और शर्मनाक स्वरूप हमें प्रतिदिन शाम के समय समाचार चैनलों पर देखने को मिलता है। प्राइम टाइम की बहस (Prime Time Debates) को जरा ध्यान से देखिए; वे अब कोई सूचनात्मक, ज्ञानवर्धक या तार्किक चर्चा नहीं रह गई हैं। वास्तविकता यह है कि वे अब मुर्गों की लड़ाई के अखाड़े बन चुके हैं।
इन बहसों में देश के वास्तविक और ज्वलंत मुद्दे जैसे बढ़ती बेरोजगारी, बेलगाम महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की कमियां और चरमराती स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से गायब रहते हैं। उनकी जगह अब भूत-प्रेत, एलियन, सीमा पार से आई प्रेमिकाओं की बेसिर-पैर की कहानियों और चीखते-चिल्लाते राजनीतिक प्रवक्ताओं ने ले ली है। यह पत्रकारिता का घोर पतन है और यह विशुद्ध रूप से भारतीय मीडिया का बौद्धिक दिवालियापन (Intellectual Bankruptcy) है।
भावनात्मक शोषण (Emotional Exploitation) और दर्शकों की शक्ति और रिमोट कंट्रोल (Power of Viewers and Remote Control)
इन समाचार चैनलों का कार्यप्रणाली मॉडल अब दर्शकों को एक नशेड़ी की तरह उत्तेजना की अगली खुराक देने पर निर्भर हो गया है। धार्मिक, सांप्रदायिक और छद्म-राष्ट्रवाद के मुद्दों को बिना किसी कारण तूल देकर समाज में भय, अविश्वास और नफरत का माहौल बनाया जाता है। यह कोई अनजाने में हुई भूल नहीं है, बल्कि यह मीडिया द्वारा अपने ही नागरिकों का किया जा रहा सुनियोजित भावनात्मक शोषण (Emotional Exploitation) है।
इस टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP) से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग अब दर्शकों के विवेक और उनकी सामूहिक जागरूकता में ही निहित है। समाज को दर्शकों की शक्ति और रिमोट कंट्रोल (Power of Viewers and Remote Control) की अपनी असीम ताकत को पहचानना ही होगा।
आपके हाथ में मौजूद रिमोट का वह छोटा सा बटन केवल चैनल बदलने का कोई सामान्य उपकरण नहीं है, बल्कि वह नफरत और झूठ के इस बड़े व्यापार को रातों-रात धराशायी करने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अस्त्र है।
निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, टीआरपी की अंधी दौड़ (Blind Race for TRP) ने पत्रकारिता के इस महान पेशे को एक ऐसे अंधे कुएं में धकेल दिया है जहाँ से वापस लौटना अत्यंत कठिन प्रतीत होता है। जब समाचार चैनल समाज के सजग प्रहरी की अपनी पवित्र भूमिका छोड़कर मदारी की तरह तमाशा दिखाने लगें, तो समाज का वैचारिक रूप से खोखला होना तय है। अब गेंद पूरी तरह से देश के दर्शकों के पाले में है।
उन्हें उन सभी समाचार चैनलों को पूरी तरह से नकारना और उनका बहिष्कार करना होगा जो समाचार के नाम पर केवल कोलाहल और उन्माद बेचते हैं। जब तक देश का आम दर्शक इस सस्ती सनसनी को खारिज कर सार्थक, शांत और जन-सरोकार वाले समाचारों की दृढ़ता से मांग नहीं करेगा, तब तक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का यह पतन यूं ही जारी रहेगा। पत्रकारिता को बचाने का यह युद्ध अब न्यूज़ रूम में नहीं, बल्कि आपके ड्रॉइंग रूम में लड़ा जाएगा।
निर्भीक इंडिया के प्रधान संपादक के कलम से।

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