लोकतांत्रिक विमर्श में मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका सदैव एक प्रकाश-स्तंभ के समान रही है। यह वह महत्वपूर्ण स्तंभ है जो सत्य और प्रामाणिक तथ्यों के आलोक से समाज का निरंतर पथ-प्रदर्शन करता है। किंतु, वर्तमान डिजिटल युग में इस प्रकाश-स्तंभ पर ही संगठित रूप से कीचड़ उछालने का जो कुत्सित प्रयास हो रहा है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है

आज हम एक ऐसे खतरनाक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं, जहाँ केवल सत्ता या विपक्ष ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए तथाकथित “कंटेंट क्रिएटर” भी गंभीर और निष्पक्ष पत्रकारिता को बदनाम करने की सुयोजित मुहिम में लगे हुए हैं।
यह मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) अब एक सोची-समझी रणनीति का रूप ले चुकी है। इसका मुख्य उद्देश्य पत्रकारिता की विश्वसनीयता को खंडित करके एक ऐसा अनियंत्रित सूचना तंत्र स्थापित करना है, जहाँ जवाबदेही और नैतिकता का कोई स्थान न हो।
मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) के पीछे के तथ्य और वर्तमान परिदृश्य
वैश्विक स्तर पर रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की ‘डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट’ जैसे अध्ययन बार-बार यह तथ्य सामने लाते रहे हैं कि सोशल मीडिया के अंधाधुंध विस्तार के कारण मुख्यधारा की मीडिया पर जनता के विश्वास में कृत्रिम रूप से गिरावट लाई गई है। भारत में आज करोड़ों युवा अपनी दैनिक सूचनाओं की खुराक के लिए केवल यूट्यूब या फेसबुक के एल्गोरिदम पर निर्भर हैं।
इस विशाल डिजिटल दर्शक वर्ग का लाभ उठाकर कुछ असामाजिक और एजेंडा-प्रेरित तत्व लगातार यह भ्रामक विमर्श गढ़ रहे हैं कि पारंपरिक मीडिया उनसे सब कुछ छिपा रहा है। यह मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) मात्र कुछ समाचार संस्थानों का विरोध नहीं है, बल्कि यह सूचना के उस पूरे प्रामाणिक तंत्र को ध्वस्त करने का प्रयास है, जो दशकों के संघर्ष और मूल्यों से निर्मित हुआ है।
मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) का उद्भव और बुनियादी कारण
इस विकराल समस्या के मूल में असीमित और सस्ते इंटरनेट की सुलभता तथा डिजिटल साक्षरता का भारी अभाव है। यूट्यूब और फेसबुक के वातानुकूलित कमरों में बैठे ये स्वयंभू विश्लेषक (Self-proclaimed Analysts) किसी भी अत्यंत गंभीर राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर मात्र आधा-अधूरा ज्ञान लेकर स्क्रीन पर प्रकट हो जाते हैं।
वे किसी घटना या समाचार की जटिलताओं और उसकी ऐतिहासिक परतों को समझने का न तो कोई गंभीर प्रयास करते हैं और न ही उनमें इसकी बौद्धिक क्षमता और शोध (Intellectual Capacity and Research) की कोई प्रवृत्ति होती है। उनका संपूर्ण ‘शोध’ अक्सर उन टीवी एंकरों के प्रलाप या व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के आधारहीन संदेशों पर टिका होता है, जिनकी स्वयं की पत्रकारिता सदैव गहरे संदेह के घेरे में रहती है। इन सुनी-सुनाई बातों को वे अपने वीडियो में उगलते हैं और जनमानस को गुमराह करते हैं।
मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) – गहन विश्लेषण और समाधान
इस संपूर्ण डिजिटल प्रहसन का सबसे हास्यास्पद और क्रुद्ध करने वाला पहलू यह है कि ये स्वयंभू ज्ञानी अपने हर वीडियो के अंत में बड़ी धूर्तता से एक रटी-रटाई पंक्ति जोड़ देते हैं “यह सब बातें मीडिया आपसे छिपा रही है।” यह वाक्य केवल एक साधारण टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह एक विषैला बाण है जो सीधे पत्रकारिता की साख पर प्रहार करता है।
इन “क्रिएटर्स” ने अपने जीवन में कभी ‘निर्भीक इंडिया’ जैसा कोई निष्पक्ष अखबार या शोधपरक पोर्टल खोलकर भी नहीं देखा होगा, जहाँ हर एक समाचार को तथ्यों की कठोर कसौटी पर कसकर और विभिन्न दृष्टिकोणों को शामिल कर प्रस्तुत किया जाता है। उन्हें इस बात का तनिक भी भान नहीं है कि एक प्रामाणिक खोजी रिपोर्ट को तैयार करने में कितनी मेहनत, कितना समय और कितना जोखिम निहित होता है। उनके लिए तो सब कुछ केवल सनसनी और क्लिकबेट (Sensation and Clickbait) है।
मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) का समाज पर घातक प्रभाव
जब ऐसे अज्ञानी लोग, जो स्वयं सूचना के लिए सबसे अविश्वसनीय स्रोतों पर निर्भर हैं, पूरी मीडिया बिरादरी पर सवाल उठाते हैं, तो यह वैसा ही प्रतीत होता है जैसे कोई सड़क-छाप नीम-हकीम, अनुभवी और योग्य सर्जनों के पूरे समुदाय को अयोग्य ठहरा रहा हो। इनका एकमात्र उद्देश्य अपनी अज्ञानता को छिपाना और सस्ते में लोकप्रियता हासिल करके अपने चैनल चमकाना है। इसके लिए गंभीर पत्रकारिता से आसान लक्ष्य और क्या हो सकता है?
यह हमला केवल कुछ पत्रकारों पर नहीं है; यह सत्य और तथ्य की पूरी अवधारणा पर हमला है। जब दर्शकों के मन में यह विषाक्त विचार बिठा दिया जाएगा कि सभी मीडिया संस्थान झूठे और बिकाऊ हैं, तो वे सूचना के लिए इन्हीं स्वयंभू ज्ञानियों के आश्रित हो जाएंगे। यह स्थिति अंततः लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा (Serious Threat to Democracy) बन जाती है, जो पूरे समाज को अराजकता के गहरे गर्त में धकेल सकती है।
मीडिया के खिलाफ साजिश (Conspiracy Against Media) को विफल करने के लिए सुझाव
समाज और देश के प्रबुद्ध वर्ग को इस गहरे षड्यंत्र को समय रहते पहचानना ही होगा। हमें यह समझना होगा कि निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता (Fact-based Journalism) एक अत्यंत जटिल और श्रमसाध्य कार्य है। इसे इन डिजिटल बाजीगरों के सस्ते मनोरंजन से तौलना तत्काल बंद करना होगा।
हमारी शिक्षा प्रणाली में ‘मीडिया साक्षरता’ को अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि लोग तथ्य और कोरी राय के बीच का अंतर समझ सकें। पाठकों और दर्शकों को स्वयं अपने विवेक का प्रयोग कर विश्वसनीय और अविश्वसनीय स्रोतों में अंतर करना सीखना होगा, अन्यथा हम सूचना के इस महासागर में सत्य की एक बूंद के लिए तरसते रह जाएंगे।
निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, मुख्यधारा के निष्पक्ष मीडिया को योजनाबद्ध तरीके से बदनाम करने का यह डिजिटल अभियान कोई सामान्य घटना नहीं है। यदि इस लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा (Serious Threat to Democracy) को समय रहते नहीं कुचला गया, तो हमारे समाज में सच और झूठ के बीच की विभाजक रेखा सदा के लिए धूमिल हो जाएगी। भारत के प्रत्येक जागरूक नागरिक का यह परम पुनीत कर्तव्य है कि वह सनसनीखेज शोर को नकार कर गंभीर, शोधपरक और उत्तरदायी पत्रकारिता का मजबूती से समर्थन करे। आइए, हम सब मिलकर इस डिजिटल भ्रमजाल को तोड़ें और ‘निर्भीक इंडिया’ जैसी निष्पक्ष आवाज़ों को शक्ति प्रदान करें, क्योंकि जब पत्रकारिता निर्भीक और सुरक्षित रहती है, तभी लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप निखर कर सामने आता है।

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