सुप्रीम कोर्ट के द्वारा चुनावी बांड (Electoral Bond) को असंवैधानिक करार देने और चुनाव आयोग (Election Commission) को इससे जुड़ी सभी जानकारी जिसमें चंदे देने वाले का नाम और उसकी पृष्ठभूमि को सार्वजनिक करने का आदेश दिया, उसके बाद से ही जनता के एक अच्छे खासे वर्ग को इससे जुड़ी जानकारी जानकारी जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी और जैसा उम्मीद था कि, राजनीतिक दलों के चंदों में होने वाला खुलासा चौकायेंगा तो, जी हाँ सैटियागों मार्टिन (Santiago Martin) के नाम ने एक बार फिर से राजनैतिक पार्टी के सांसे तेज कर दिया है।

निर्भीक इंडिया:- चुनावी बांड (Electoral Bond) से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने को लेकर भारतीय स्टेट बैंक ने तो मामले को जून तक लटकाने का पूरा योजना बना लिया था, लेकिन शुक्र है, कि इस देश में अभी भी कुछ निष्पक्ष प्रेस और सुप्रीम कोर्ट है, जिसने इस बहानेबाजी को नकारते हुए तत्काल तय समयसीमा में जानकारी को चुनाव आयोग की वेबसाइड पर डालने के लिए निर्देशित किया।
चुनावी बांड (Electoral Bond) का राजा निकला लॉटरी किंग सैटियांगों मार्टिन
चुनावी बांड (Electoral Bond) के माध्यम से राजनैतिक दलों को चंदा देने में सर्वाधिक स्थान पाने वाला सैंटियागों मार्टिन (Santiago Martin) फयूचर गेंमिग का मालिक और लॉटरी किंग के नाम देश में जाना जाता है। सैंटियागों मार्टिन पर लगभग 1 दशक से भारतीय ऐजन्सियाँ लगातार कार्यवाही कर रही है।
चुनावी बांड (Electoral Bond) के माध्यम से इस लॉटरी किंग सैटियागों मार्टिन (Santiago Martin) ने लगभग 1368 करोड़ रूपयें का चंदा दिया है। इस चंदे को वर्ष 2019 से 2024 के बीच दिया गया था। चुनाव आयोग द्वारा प्रकट किए गए आंकड़ों से मार्टिन की कंपनी के बांड अधिग्रहण में प्रवेश की समय-सीमा का पता चलता है, जो कि अक्टूबर 2020 में शुरू होकर 2021, 2022 और 2023 तक जारी रहीं, जिसमें सबसे हालिया लेनदेन जनवरी 2024 में दर्ज किया गया है।
मासिक खरीद का विश्लेषण शिखर और गर्त को दर्शाता है जनवरी 2022 में 210 करोड़ रुपये का चरम देखा गया, जबकि अप्रैल 2022 में 100 करोड़ रुपये के बांड की खरीद देखी गई।
इस पूरे वित्तीय संकट के दौरान, मार्टिन के लेन-देन पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का साया मंडरा रहा है, जिसने दिसंबर 2021 से जुलाई 2022 तक कई मौकों पर मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में उनकी संपत्तियों को कुर्क किया है।
विशेष रूप से, अक्टूबर 2021 में, इस तरह की जांच के बीच, कंपनी ने अपने दूसरे सबसे बड़े बांड अधिग्रहण को अंजाम दिया, जिसकी राशि एक ही महीने में 195 करोड़ रुपये थी।
इसके अतिरिक्त, बढ़ते आरोपों के बीच, तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष केएस अलागिरी ने दिसंबर 2021 में मार्टिन की कंपनी से दान की ओर इशारा करते हुए चिंता जताई
लॉटरी किंग सैंटियागो मार्टिन (Santiago Martin) कौन है
सैंटियागो मार्टिन (Santiago Martin) की परोपकारी फाउंडेशन की वेबसाइट के रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी यात्रा म्यांमार के यांगून में एक मजदूर के रूप में शुरू हुई, इससे पहले कि वह 1988 में तमिलनाडु में लॉटरी उद्यम शुरू करने के लिए भारत वापस आए।
उनकी उद्यमशीलता की भावना ने उन्हें कर्नाटक और केरल भर में अपनी पहुंच का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया, अंततः उन्हें पूर्वाेत्तर में ले जाया गया जहां उन्होंने एक सरकारी लॉटरी पहल का नेतृत्व किया।
सीमाओं से परे, मार्टिन ने वैश्विक स्तर पर अपने व्यवसाय का विस्तार करते हुए भूटान और नेपाल में प्रवेश किया। वेबसाइट निर्माण, रियल एस्टेट, कपड़ा और आतिथ्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उनके विविधीकरण का भी विवरण देती है।
विशेष रूप से, सैंटियागो मार्टिन (Santiago Martin) ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ लॉटरी ट्रेड एंड अलाइड इंडस्ट्रीज में अध्यक्ष का सम्मानित पद रखते हैं, जो भारत के भीतर लॉटरी क्षेत्र की अखंडता और विकास को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित संस्था है।
उनके नेतृत्व में उनका उद्यम, फ्यूचर गेमिंग सॉल्यूशंस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, इस महासंघ का एक सम्मानित सदस्य बन गया है। इसके अतिरिक्त, वेबसाइट विश्व लॉटरी एसोसिएशन की प्रगतिशील पहलों में मार्टिन की भागीदारी पर प्रकाश डालती है, विशेष रूप से ऑनलाइन गेमिंग, कैसीनो और खेल सट्टेबाजी के क्षेत्र में काम करती है।
द्रमुक पार्टी के साथ मार्टिन के घनिष्ठ संबंध को इसकी किस्मत को मजबूत करने के लिए व्यापक रूप से स्वीकार किया गया था, फिर भी जब अन्नाद्रमुक ने सत्ता संभाली तो उनकी निष्ठा में बदलाव आया। राजनीतिक बदलाव के बीच, लॉटरी क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति ने खुद को विवादों में फंसा हुआ पाया, कड़े गुंडा अधिनियम के तहत कई डीएमके नेताओं के साथ भूमि कब्जा करने के आरोपों का सामना करना पड़ा।
कठिन कानूनी लड़ाई के बावजूद, सैंटियागो मार्टिन की किस्मत तब बदल गई जब मद्रास उच्च न्यायालय ने उसे जमानत देते हुए उसकी हिरासत रद्द कर दी। हालाँकि, मार्टिन की कानूनी समस्याएँ बनी रहीं क्योंकि उन्हें लॉटरी मामलों से संबंधित कई सीबीआई आरोपपत्रों से जूझना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आठ महीने तक सलाखों के पीछे रहना पड़ा।
एक हालिया घटनाक्रम में, मई 2023 में मार्टिन के मामलों पर एक और कार्रवाई हुई, इस बार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग (रोकथाम) अधिनियम के तहत 457 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की।
इस मामले में कथित तौर पर मार्टिन को सिक्किम सरकार को 900 करोड़ रुपये से अधिक के भारी नुकसान से जोड़ा गया, जिससे उनकी कानूनी उलझनों में जटिलता की एक और परत जुड़ गई।
इसके अलावा, मार्टिन के उतार-चढ़ाव वाले अतीत की पड़ताल करते हुए, 2011 में कोयंबटूर जिला प्रशासन द्वारा गुंडा अधिनियम के तहत दर्ज किया गया मामला हालिया विवादों से पहले की कानूनी उलझनों की एक तस्वीर पेश करता है।
रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इस कठिन अवधि के दौरान, मार्टिन को कई आरोपों का सामना करना पड़ा, जिसमें धोखाधड़ी और भूमि हड़पने से संबंधित 14 आरोप शामिल थे।
चुनावी बांड योजना एवं उसकी पीछे की मानसिकता समझे
राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, केंद्र सरकार ने 2017 के बजट सत्र के दौरान चुनावी बांड (Electoral Bond) योजना शुरू की। 2018 में संसद द्वारा पारित होने के बाद, इस योजना को आधिकारिक तौर पर उस वर्ष बाद में अधिसूचित किया गया था।
हालाँकि, 2022 में, चुनावी बॉन्ड (Electoral Bond) योजना में उल्लेखनीय संशोधन पेश किए गए, विशेष रूप से एक वर्ष के भीतर बिक्री दिनों की संख्या 70 से बढ़ाकर 85 कर दी गई। यह समायोजन गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ मेल खाता है, जो चुनावी फंडिंग की गतिशीलता के महत्व को रेखांकित करता है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, राजनीतिक दलों को मार्च 2018 से जनवरी 2024 तक चुनावी बांड के माध्यम से कुल 16,492 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।
साथ ही, वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए ऑडिट रिपोर्ट भी सौंपी गई। चुनाव आयोग का अनुमान है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उस अवधि के दौरान चुनावी बांड के माध्यम से 1,294 करोड़ रुपये से अधिक का दान प्राप्त किया, जो इस तंत्र द्वारा प्रदान किए गए पर्याप्त वित्तीय प्रवाह को दर्शाता है।
अगर हम इस लॉटरी किंग सैटियागों मार्टिन द्वारा सबसे ज्यादा 1368 करोड़ रूपये का चंदा दिया और यदि हम इसी के साथ ही चंदा देने वाले व्यक्ति का पृष्ठभूमि देखे, तो क्या यह कहना गलत तो नहीं होगा कि यदि कोई अपना पैसा किसी राजनीतिक दल को दे रहा है और यदि व दल कही सत्ता में भी है, तो वह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर उसकेा विभिन्न प्रकार से लाभ नहीं पहुँचायेंगा।
यह कैसे सम्भव है, कि एक व्यापारी, बिजनेसमैन, ठेकेदार या कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपना एक रूपया भी किसी को ऐसे न दे व बिना किसी उद्देश्य के हजारों करोड़ का चंदा किसी भी राजनैतिक पार्टी को दे और यदि वह सत्ता में आयें तो उससे अपनाा हित नहीं साधें।
यदि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश नहीं होता तो एक आम जनता को यह पता नहीं चलता है। एक आदमी को हर समान पर कर देना पड़ता है और किसी बड़े रेस्टोरेंट में खा ले तो टैक्स के साथ ही कई सर्विस टैक्स को भी जोड़ कर मांगा जाता है, और हमारे देश के नेताओं और पार्टी सुप्रीम कोर्ट में यह कहती है, कि पार्टी के चंदे का हिसाब जनता को जानने का अधिकार नहीं है।
यह सभी पार्टी कुछ वर्ष सत्ता में रहती और कुछ ज्यादा वोट पा लेती है, तो लगता है, कि हम इस देश के राजा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, कि किसी पार्टी ने प्रेस और सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दिया है इससे पहले भी ऐसे ही सरकार बनी और तानाशाही रवैइयै ने ‘‘देश को आपातकाल’’ के दर्शन करवा दिये थे।
लेखक- नवनीत मिश्र प्रधान संपादक निर्भीक इंडिया

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