प्रस्तावना – आज के दौर में जब भारत विश्वगुरु बनने और आर्थिक महाशक्ति की कुर्सी पर बैठने का सपना देख रहा है, तब देश के भीतर एक बहुत ही खामोश लेकिन खौफनाक बदलाव जन्म ले रहा है। एक तरफ संसद के वातानुकूलित कमरों में बैठे राजनेता देश के युवाओं और जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) के कसीदे पढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ सड़क पर खड़ा एक आम भारतीय युवा लड़का अपनी ही जिंदगी, अपनी शादी और अपने भविष्य को लेकर खौफ में जी रहा है। यह खौफ किसी बाहरी दुश्मन का नहीं है, बल्कि उस खोखले और एकतरफा सिस्टम का है, जिसने विवाह जैसी पवित्र संस्था को एक कानूनी फंदे में तब्दील कर दिया है।

परिणाम बहुत स्पष्ट है। आज का ‘सच्चा मर्द’ विवाह से मोह भंग कर चुका है। वह समझ गया है कि एकतरफा कानूनों के जाल में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद करने से बेहतर है कि वह अकेले जिए। और इसी खामोश बहिष्कार का नतीजा है कि देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है।
हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री श्री बी.एल. वर्मा ने लोकसभा में जो आंकड़े पेश किए, वे डराने वाले हैं। उन आंकड़ों के अनुसार भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) तक भयानक रूप से बढ़ने वाली है। लेकिन क्या सरकार ने यह सोचने की जहमत उठाई है कि आखिर देश का युवा बच्चे पैदा करने और घर बसाने से क्यों भाग रहा है? आइए इस कड़वे सच का विश्लेषण करते हैं।
भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) का डरावना सच : जनसांख्यिकीय सुनामी
लोकसभा में पेश की गई राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग द्वारा गठित जनसंख्या अनुमान तकनीकी समूह की रिपोर्ट को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह किसी हॉरर फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती। रिपोर्ट साफ बताती है कि 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के वृद्धजनों की जनसंख्या, जो वर्ष 2011 में 10 करोड़ थी, वह भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) के अनुमानों के तहत छलांग लगाकर 23 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि कुल जनसंख्या में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 8.4 प्रतिशत से बढ़कर 14.9 प्रतिशत हो जाएगी।
इसके साथ ही एक और खौफनाक आंकड़ा सामने आया है। घटते प्रजनन दर की वजह से 15 वर्ष से कम आयु की जनसंख्या का अनुपात 2011 के 30.9 प्रतिशत से गिरकर 2036 में 20.1 प्रतिशत पर आने का अनुमान है। नीति आयोग ने अपने स्थिति पत्र “भारत में वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल में सुधार” में इस जनसांख्यिकीय संक्रमण के रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया है।
लेकिन नीति आयोग के ये पन्ने उस असली दर्द को नहीं बयां करते जो आज के युवाओं के दिलों में पल रहा है। सरकार मान कर चल रही है कि लोग स्वाभाविक रूप से कम बच्चे पैदा कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय युवा खास तौर पर भारतीय युवा लड़के, शादी और बच्चे पैदा करने के बजाय एकतरफा व्यवस्था से खुद को बचा रहे हैं।
सच्चे मर्दों का विवाह से मोह भंग और भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) का सीधा कनेक्शन
आजकल भारतीय युवाओं के बीच करियर बनाम शादी (Career vs Marriage for Indian Men) की बहस एक नया ही रूप ले चुकी है। पहले युवा करियर सेटल होने के बाद शादी के सपने सजाते थे, लेकिन आज का युवा करियर इसलिए बना रहा है ताकि वह अपनी जरूरतों के अनुसार अकेले जीवन जी सके और किसी ‘गोल्ड डिगर’ या झूठे मुकदमों का शिकार न हो।
आज की सच्चाई बेहद कड़वी है। लड़कों ने अपने आस-पास, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में देख लिया है कि कैसे आजकल की लड़कियों के अवैध संबंधों और बेवफाई के बावजूद, कानून अंधा होकर केवल महिला का ही पक्ष लेता है।
लड़के देख रहे हैं कि यदि पत्नी धोखा दे, प्रेमी के साथ पकड़ी जाए या झूठे आरोप लगाए, तब भी एकतरफा नारीवादी भारतीय कानून के चक्कर में पड़कर पति को ही अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘एलिमोनी’ (गुज़ारा भत्ता) के रूप में देना पड़ता है।
नारीवादी कानूनों का दुरुपयोग (Misuse of Feminist Laws) आज चरम पर है। 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम और दहेज प्रताड़ना के मामलों में 80 प्रतिशत से ज्यादा केस अदालतों में झूठे साबित होते हैं, लेकिन तब तक एक निर्दोष आदमी का करियर, उसका सम्मान और उसका पूरा परिवार बर्बाद हो चुका होता है।
युवा सोच रहा है कि जिस शादी में उसे सिर्फ एटीएम मशीन समझा जाए, जहाँ उसकी भावनाओं की कोई कद्र न हो, और जहाँ एक झूठी शिकायत पर पुलिस उसे और उसके बूढ़े मां-बाप को रातों-रात जेल में डाल दे, वैसी शादी करने का क्या फायदा?
यही कारण है कि ‘सच्चे मर्दों का विवाह से मोह भंग’ हो चुका है। वे अब शादी के मंडप से दूर भाग रहे हैं। और जब शादियां ही नहीं होंगी या टिकेंगी ही नहीं, तो बच्चे कहाँ से आएंगे? यही सीधा कारण है जो भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) के संकट को और गहरा कर रहा है।
खून, फंदे और नाइंसाफी: क्या भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) इन आंसुओं का परिणाम है?
जब हम पुरुष अधिकार और न्याय (Men’s Rights and Justice) की बात करते हैं, तो भारत का न्याय तंत्र मानो कान में रुई और आंखों पर पट्टी बांध लेता है। कई ऐसे उदाहरण हैं जो रूह कंपा देते हैं। राजा रघुवंशी, अतुल सुभाष, मानव शर्मा और ना जाने ऐसे कितने अनगिनत मामले हैं, जहाँ पीड़ित पति या लड़के की आवाज एफआईआर में दर्ज ही नहीं होती।
अतुल सुभाष जैसे होनहार टेक पेशेवर ने अपनी पत्नी और ससुराल वालों के झूठे मुकदमों, लगातार ब्लैकमेलिंग और पैसों की उगाही से तंग आकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। उसने अपने पीछे जो पन्ने छोड़े, वे भारतीय न्याय व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा हैं। मानव शर्मा और राजा रघुवंशी जैसे युवाओं ने भी इसी प्रताड़ना के चलते मौत को गले लगा लिया। पुलिस का रवैया ऐसा होता है मानो कोई आदमी पीड़ित हो ही नहीं सकता।
इससे भी ज्यादा खौफनाक वे घटनाएं हैं जो आज रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। पत्नी का अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर देना आज एक आम खबर बन चुकी है। कभी दूध में जहर देकर, कभी सोते हुए पति का गला घोंटकर, तो कभी प्रेमी के साथ मिलकर पति के टुकड़े-टुकड़े करके सूटकेस में फेंकने जैसी दरिंदगी सामने आती है।
विडंबना देखिए कि पति दिन रात खून पसीना एक करके उसी पत्नी के शौक पूरे करता है, और बदले में उसे मौत मिलती है। इन सभी खबरों को मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ने वाला आज का युवा लड़का यही सोचता है कि इस जानलेवा खतरे में पड़ने से अच्छा है कि इंसान अकेला ही जी ले। जब युवाओं के मन में यह खौफ बैठ जाएगा, तो समाज का ताना-बाना टूटना तय है।
विवाह का बहिष्कार और घटती प्रजनन दर भारत (Declining Fertility Rate India) का खौफनाक मंजर
युवाओं के इस अलगाव का सबसे बड़ा असर जनसांख्यिकी पर पड़ रहा है। घटती प्रजनन दर भारत (Declining Fertility Rate India) अब केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी का सूचक है। अगर पुरुष शादी से इनकार करेगा या 35-40 की उम्र तक शादी को टालता रहेगा, तो समाज में प्रजनन दर का गिरना स्वाभाविक है।
एक तरफ सरकार ‘राष्ट्रीय युवा नीति 2014’ का ढिंढोरा पीट रही है, शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता के माध्यम से उत्पादक कार्यबल तैयार करने की बातें कर रही है। लेकिन वह यह भूल रही है कि कोई भी कार्यबल बिना मानसिक शांति और पारिवारिक स्थिरता के उत्पादक नहीं हो सकता। जिस देश का युवा अदालतों के चक्कर काट रहा हो, झूठे मुकदमों में अपनी जमानत के लिए वकीलों को लाखों रुपये लुटा रहा हो, वह देश खाक विश्वगुरु बनेगा?
आज भारत का युवा उस दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ उसका भविष्य है और दूसरी तरफ एकतरफा कानूनी फंदा। वह अपनी मेहनत की कमाई को किसी बेवफा साथी की ‘एलिमोनी’ में लुटाने के बजाय, अपने माता-पिता की सेवा करने और अपनी शर्तों पर दुनिया घूमने में खर्च कर रहा है। इसी ‘सिंगल’ रहने के ट्रेंड ने भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) के संकट को जन्म दिया है, क्योंकि नई पीढ़ी तो दुनिया में आ ही नहीं रही है।

सरकार की प्राथमिकता: वरिष्ठ नागरिक कल्याण योजनाएं (Senior Citizen Welfare Schemes) और भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) की तैयारी
सरकार को शायद यह समझ आ गया है कि देश अब युवाओं का नहीं, बल्कि बूढ़ों का होने वाला है। इसलिए सरकार ने अपना पूरा फोकस युवाओं के घर बसाने से हटाकर वृद्धों के आश्रम बनाने पर लगा दिया है। सरकार ने वृद्धजनों की देखभाल और स्वास्थ्य के लिए वरिष्ठ नागरिक कल्याण योजनाएं (Senior Citizen Welfare Schemes) की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर ली है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय देश भर में ‘अटलवयोअभ्युदय योजना (एवीवाईएवाई)’ लागू कर रहा है। इसके तहत वरिष्ठ नागरिक गृहों, सतत देखभाल गृहों और मोबाइल चिकित्सा इकाइयों के रखरखाव के लिए संगठनों को सहायता दी जा रही है। इसके अलावा, राष्ट्रीय वयोश्री योजना 2017 से चल रही है, जो गरीब बुजुर्गों को जीवनयापन के लिए सहायक उपकरण देती है। एल्डरलाइन (14567) जैसी हेल्पलाइन भी शुरू की गई है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अक्टूबर 2024 में ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ का विस्तार करते हुए 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा प्रदान कर दिया है, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। साथ ही राष्ट्रीय बुजुर्ग स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (एनपीएचसीई) लागू किया जा रहा है, जिसमें जिला अस्पतालों से लेकर एम्स जैसे क्षेत्रीय जराचिकित्सा केंद्रों तक में बुजुर्गों के लिए विशेष वार्ड और ओपीडी की व्यवस्था है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय ‘राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी)’ के जरिए 60 से 79 वर्ष के लोगों को 200 रुपये और 80 वर्ष से ऊपर के लोगों को 500 रुपये प्रति माह पेंशन दे रहा है। वित्तीय सेवा विभाग ‘अटल पेंशन योजना (एपीवाई)’ चला रहा है, जिसमें 18 से 40 वर्ष की आयु के लोग अंशदान करके 60 वर्ष के बाद गारंटीशुदा पेंशन पा सकते हैं।
यह सब देखकर ऐसा लगता है कि सरकार ने मान लिया है कि भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) तक भयानक रूप से बढ़ेगी और परिवार नामक संस्था टूट चुकी होगी, इसलिए सरकार खुद ही एक विशाल ‘ओल्ड एज होम’ चलाने की तैयारी में है।
निष्कर्ष: क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ कोई परिवार नहीं होगा?
यह अत्यंत दुखद और व्यंग्यात्मक है कि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहाँ सड़क पर चलने वाले हर पुरुष को एक संभावित अपराधी की नजर से देखा जाता है, और हर महिला को जन्मजात मासूम। नारीवादी कानूनों का दुरुपयोग (Misuse of Feminist Laws) और पुरुष अधिकार और न्याय (Men’s Rights and Justice) के प्रति न्यायालयों की घोर उदासीनता ने भारतीय समाज की जड़ों में मट्ठा डाल दिया है।
जब एक युवा लड़का यह देखता है कि उसके खून-पसीने की कमाई, उसका घर, यहाँ तक कि उसके बच्चों की कस्टडी भी किसी ऐसी महिला को सौंप दी जाती है जिसने उसी के साथ धोखा किया है, तो उसका इस व्यवस्था से विश्वास उठ जाना लाजमी है।
राजा रघुवंशी, अतुल सुभाष और मानव शर्मा की चीखें भले ही पुलिस की एफआईआर डायरी में दर्ज न हुई हों, लेकिन उन चीखों ने आज के करोड़ों युवाओं के कानों में यह संदेश जरूर फूंक दिया है कि “सावधान! शादी एक कानूनी ट्रैप है।”
सरकार चाहे कितनी भी ‘वरिष्ठ नागरिक कार्य योजना’ बना ले या ‘सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन (एसएजीई)’ जैसी स्टार्टअप पहल शुरू कर ले, लेकिन अगर समाज का युवा ही भीतर से टूट चुका होगा, तो देश का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा।
घटती प्रजनन दर और भारत की बुजुर्ग आबादी 2036 (India Aging Population 2036) का यह संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह हमारे अपने बनाए हुए उन पक्षपाती कानूनों और सामाजिक दोहरेपन का नतीजा है, जिसने एक सच्चे और ईमानदार पुरुष को विवाह जैसी संस्था से खौफजदा कर दिया है।
अगर समय रहते इन कानूनों में पुरुष आयोग बनाकर संतुलन नहीं लाया गया, व्यभिचार और झूठे केस करने वालों पर सख्त सजा का प्रावधान नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत सिर्फ एक ऐसा देश बनकर रह जाएगा जहाँ केवल वृद्धाश्रम होंगे, सूने घर होंगे और उन सूने घरों में बैठे वो अकेले पुरुष होंगे, जिन्होंने किसी झूठे मुकदमे से बचने के लिए कभी शादी का सेहरा ही नहीं बांधा। देश बूढ़ा हो रहा है, और इसकी वजह कोई और नहीं, बल्कि वह सिस्टम है जो अपने ही बेटों को न्याय देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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