प्रस्तावना – भारत के ‘अमृत काल’ और डिजिटल विकास के भव्य दावों के बीच, देश की जमीनी हकीकत आज लकड़ी के धुएं में दम तोड़ रही है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ की है जो विज्ञापनों में तो बुलेट ट्रेन की गति से दौड़ रहा है, लेकिन वास्तविकता में बैलगाड़ी से भी पीछे छूट गया है।

हैदराबाद की सड़कों पर फास्ट फूड बेचने वाले ‘चंदू’ जैसे हजारों छोटे व्यापारी आज मजबूरन पाषाण युग में लौटने को विवश हैं। जिस देश की जनता को ‘विश्वगुरु’ और विकसित भारत (Viksit Bharat) का सुनहरा और चकाचौंध भरा सपना दिन-रात दिखाया जा रहा है, वहां आलम यह है कि एक आम नागरिक को पांच से छह हजार रुपये की मोटी रकम खर्च करने के बावजूद अपना व्यापार चलाने के लिए व्यावसायिक एलपीजी गैस नसीब नहीं हो रही है।
ईरान यूएसए युद्ध (Iran usa war) ने कैसे खोली हमारी सरकारी दूरदर्शिता की पोल : विकसित भारत (Viksit Bharat) का पाषाण युग
पश्चिम एशिया में भड़के ईरान यूएसए युद्ध (Iran usa war) ने हमारी कथित ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक महारत और सरकारी दूरदर्शिता के उस अभेद्य किले की पूरी पोल खोलकर रख दी है, जिसे पीआर (PR) एजेंसियों ने बड़ी मेहनत से खड़ा किया था।
आज जब चंदू जैसे व्यापारी डिजिटल इंडिया के क्यूआर (QR) कोड से भुगतान लेते हुए लकड़ी के चूल्हे पर मंचूरियन और नूडल्स पकाते हैं, तो वह धुआं सीधे दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे उन नीति-निर्माताओं की आंखों में चुभना चाहिए, जो संकट आने से पहले सिर्फ ‘सत्ता का सुख’ भोगने में व्यस्त रहते हैं।
जब ‘ईरान अमेरिका’ (Iran america) की आहट पर चीन जाग रहा था, हमारी सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही थी
इस पूरे महासंकट का सबसे शर्मनाक पहलू हमारी कूटनीतिक और रणनीतिक विफलता है। कड़वा सच तो यह है कि सत्ता का सुख भोगने और चुनावी रैलियों में मगन रहने में प्रधानमंत्री और उनका पूरा तंत्र इतना व्यस्त था कि उन्हें पश्चिम एशिया में उठने वाले इस विनाशकारी तूफान की आहट तक नहीं मिली। दूसरी ओर, हमारे पड़ोसी और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी चीन की कूटनीतिक चालाकी देखिए! जब ईरान अमेरिका (Iran america) के बीच तनाव केवल बयानों तक सीमित था, तभी चाइना ने युद्ध की आहट को समय से पहले पकड़ लिया।
बिना कोई शोर मचाए, बिना किसी ‘मास्टरस्ट्रोक’ के विज्ञापनों के, चीनी सरकार ने एलपीजी और क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) का इतना विशाल भंडारण (Stockpile) कर लिया कि अगर ईरान यूएसए युद्ध (Iran usa war) अगले 6 महीने तक भी निर्बाध चलता रहे, तो भी चीन की अर्थव्यवस्था और वहां के ‘चंदू’ जैसे व्यापारियों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।और हम? हम विश्वगुरु बनने के नशे में तब जागे जब हमारे घर के चूल्हे बुझने लगे। यह अग्रिम तैयारी बनाम ‘हड़बड़ी की राजनीति’ का सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
युद्ध के बहाने 5 मोर्चों पर एक्सपोज होती हमारी ‘तैयारी’
इस वैश्विक तनाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे के उन सभी छिपे हुए छेदों को उजागर कर दिया है, जिन्हें अब तक राष्ट्रवाद के मोटे कालीन के नीचे छिपाया जा रहा था। हमारी इन्वेस्टिगेटिव डेस्क के अनुसार, स्थिति के 5 सबसे गंभीर और चौंकाने वाले पहलू इस प्रकार हैं:
मुनाफाखोरी और ब्लैक मार्केट का स्वर्ण काल: बाजार में गैस की इतनी भारी किल्लत है कि व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर रातों-रात ‘अदृश्य’ हो गए हैं। जो सिलेंडर मिल भी रहे हैं, वे ब्लैक मार्केट में बेचे जा रहे हैं। छह से दस रुपये प्रति किलो मिलने वाली लकड़ी अब व्यापारियों को इस भ्रष्ट सिस्टम से ज्यादा ‘किफायती’ और ‘ईमानदार’ लग रही है।
आर्थिक अनिश्चितता का बवंडर: जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। निवेशक डरे हुए हैं, जिसके कारण “सोने चांदी” (gold and silver) की कीमतों में बेतहाशा और कृत्रिम उछाल आ गया है। जनता का पैसा बाजार से निकलकर सुरक्षित ठिकानों में जा रहा है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक बुरा संकेत है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) का ‘पैनिक बटन’: अग्रिम तैयारी के बजाय, सरकार हमेशा की तरह ‘प्रतिक्रिया’ देने में व्यस्त है। जब संकट सिर पर फूट पड़ा, तब हड़बड़ी में ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ लागू कर दिया गया। सारा गैस उत्पादन घरेलू इस्तेमाल की ओर मोड़ दिया गया है, जिसने व्यावसायिक उपयोग को पूरी तरह पंगु बना दिया है।
कागजी आंकड़ों का मायाजाल: पेट्रोलियम मंत्रालय बड़ी बेशर्मी से कागजी आंकड़े पेश कर रहा है कि घरेलू एलपीजी उत्पादन में पच्चीस प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। अगर यह सरकारी दावा रत्ती भर भी सच है, तो आज गैस एजेंसियों के बाहर आम नागरिक गैस के लिए लंबी और हताश कतारों में धक्के क्यों खा रहे हैं?
नियंत्रण कक्ष का ‘डैमेज कंट्रोल’: अपनी नाकामी छुपाने के लिए गृह मंत्रालय ने आनन-फानन में चौबीसों घंटे (24×7) चलने वाला एक नियंत्रण कक्ष स्थापित कर दिया है। लेकिन एक लकड़ी के चूल्हे पर खांसते हुए चंदू के लिए इस ‘कंट्रोल रूम’ के टेलीफोन नंबरों का क्या मोल है?
एलपीजी गैस समाचार (LPG gas news): जब नीतियां गरीबों की आजीविका जला दें
आज सुबह जब आप टीवी खोलते हैं या इंटरनेट पर एलपीजी गैस समाचार (LPG gas news) खोजते हैं, तो आपको केवल सरकारी आश्वासनों की चाशनी ही परोसी जाती है। लेकिन सड़कों की हकीकत इन वातानुकूलित स्टूडियो से बहुत अलग है।
चंदू जैसे फास्ट फूड विक्रेता, जिनके पास न तो कोई बड़ा कॉरपोरेट बैकअप है और न ही सरकारी अनुदान, वे इस ईरान यूएसए युद्ध (Iran usa war) की सबसे भारी कीमत चुका रहे हैं। उन्होंने अपनी आधी कुकिंग लकड़ी के उस विशेष चूल्हे पर शिफ्ट कर दी है जो धुआं तो देता है, लेकिन कम से कम उनके परिवार को भूखा नहीं सोने देता।
सवाल यह नहीं है कि युद्ध क्यों हो रहा है; युद्ध तो अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति का हिस्सा हैं। असली सवाल यह है कि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दावा करने वाला हमारा तंत्र एक झटके में भरभरा कर क्यों गिर जाता है?
बिना किसी ‘प्लान बी’ (Plan B) के, बिना किसी पूर्व चेतावनी के, नीतियां थोप देना अब इस सिस्टम की एक लाइलाज बीमारी बन चुकी है। नियंत्रण कक्ष में बैठे बाबू क्या उन गरीबों के आंसू पोंछ पाएंगे जिनकी पूरी आजीविका और जीवन भर की पूंजी आज उस लकड़ी के धुएं में जलकर खाक हो रही है?
आगे की राह और ‘विश्वगुरु’ के लिए एक कड़वा संदेश
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना निष्कर्ष यही है कि हमारी नीतियां केवल ‘अच्छे दिनों’ के लिए बनाई जाती हैं, तूफानों का सामना करने के लिए नहीं। ईरान यूएसए युद्ध (Iran usa war) कोई अचानक आई प्राकृतिक आपदा नहीं था, बल्कि महीनों से सुलग रहा एक कूटनीतिक ज्वालामुखी था।
‘निर्भीक इंडिया’ अपने पाठकों से यह सोचने का आग्रह करता है कि जब तक हमारी सरकार केवल पीआर (PR) विज्ञापनों और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की चकाचौंध भरी दुनिया से बाहर नहीं निकलेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।
जब तक हम चीन जैसी ठोस, दूरदर्शी और मौन रणनीतियां बनाना नहीं सीखेंगे, जो संकट आने से पहले ही देश के ऊर्जा भंडार को सुरक्षित कर ले, तब तक विकसित भारत (Viksit Bharat) का यह भव्य रथ ऐसे ही लकड़ी के पहियों और धुएं के सहारे घिसटता रहेगा।
जनता को यह समझना होगा कि उनके वोट की कीमत केवल नारों में नहीं, बल्कि उन रणनीतियों में है जो उनकी रसोई की गैस को युद्ध की आंच से बचा सकें। क्या हमारा देश हमेशा संकट आने के बाद ही कुआं खोदने की इस आत्मघाती आदत का शिकार बना रहेगा?
नवनीत मिश्र (पत्रकार व मीडिया शोधार्थी)
एमएजेएमसी (डीडीयू गोरखपुर )

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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