क्या आप भारतीय रेल से सफर करने की योजना बना रहे हैं? तो टिकट लेने के साथ-साथ ‘भगवान का नाम’ भी जरूर जप लें। ऐसा हम नहीं, बल्कि रेलवे की सुस्त और लचर सुरक्षा व्यवस्था चीख-चीख कर कह रही है।


निर्भीक इंडिया (संवाददाता नवनीत मिश्रा)- भारतीय रेलवे का सबसे महत्वाकांक्षी और जीवनरक्षक प्रोजेक्ट यानी ‘कवच’ आज भी सरकारी फाइलों में बुलेट ट्रेन की तरह दौड़ रहा है। लेकिन जमीन पर इसकी असल रफ्तार किसी पुरानी मालगाड़ी से भी बदतर है।
पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System): दावों की बुलेट ट्रेन और काम की मालगाड़ी
हाल ही में संसद में रेल मंत्री का बयान (Railway Minister Statement in Parliament) सामने आया है। श्री अश्विनी वैष्णव ने बड़े ही तकनीकी अंदाज में बताया कि यह एक बेहद जटिल स्वचालित ट्रेन सुरक्षा तकनीक है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि साल 2016 में शुरू हुई यह महत्वपूर्ण सुरक्षा योजना सात साल बाद भी इतनी अधूरी क्यों है? इस पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System) का विस्तार अब तक एक बहुत ही सीमित दायरे में ही क्यों सिमटा हुआ है?
क्या ओड़िशा के बालासोर जैसे भीषण और दिल दहला देने वाले रेल हादसों से सिस्टम ने कोई सबक नहीं लिया? यदि यह सुरक्षा तकनीक समय रहते पूरे नेटवर्क पर लागू हो गई होती, तो शायद कई बेकसूर यात्रियों की अनमोल जानें बचाई जा सकती थीं।
इस जीवनरक्षक प्रणाली में पांच प्रमुख सब-सिस्टम शामिल किए गए हैं। इनमें ऑप्टिकल फाइबर केबल, टेलीकॉम टावर, स्टेशन डेटा सेंटर, ट्रैकसाइड उपकरण और लोकोमोटिव पर लगे ऑनबोर्ड सिस्टम शामिल हैं। लेकिन इन उपकरणों को लगाने की गति ‘कछुए’ को भी मात दे रही है।
पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System) का 492 करोड़ का ‘कछुआ’ बजट
सरकार के बड़े-बड़े दावों की पोल तब और खुल जाती है जब हम क्षेत्रीय स्तर पर इसके क्रियान्वयन का आकलन करते हैं। कागजों पर पूर्वोत्तर रेलवे (NER) में भी इस तकनीक को लागू करने का एक शानदार खाका तैयार कर लिया गया है।
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, 1,441 रूट किलोमीटर पर इस कवच को लगाने की सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी गई है। इसके लिए बाकायदा 492 करोड़ का रेलवे बजट (Railway Budget of 492 Crores) (सटीक 492.21 करोड़ रुपये) भी आवंटित कर दिया गया है।
लेकिन हकीकत का आईना कुछ और ही तस्वीर दिखाता है। योजना के पहले चरण में यह मात्र 558 रूट किलोमीटर रेल खंडों पर ही लागू किया जा सकेगा। यानी बाकी के रूट के निर्दोष यात्रियों को अभी और कितने वर्षों तक ‘राम-भरोसे’ यात्रा करनी होगी, इसका कोई जवाब नहीं है।
इस प्रथम चरण की लॉटरी में लखनऊ और वाराणसी मंडल कवच (Lucknow and Varanasi Division Kavach) के कुछ चुनिंदा और महत्वपूर्ण रेल खंडों को ही शामिल किया गया है।
लखनऊ मंडल के सीतापुर सिटी-बुढ़वल, बुढ़वल-गोरखपुर कैंट, मानक नगर-लखनऊ-मल्हौर और बाराबंकी-बुढ़वल खंड इस पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System) का हिस्सा बने हैं।
वहीं वाराणसी मंडल के गोरखपुर कैंट-गोल्डिनगंज खंड को भी इस योजना में जगह मिली है। गोरखपुर कैंट-छपरा ग्रामीण खंड के लिए निविदा (Tender) जारी होने का झुनझुना भी पकड़ा दिया गया है, लेकिन यह धरातल पर कब उतरेगा, राम जाने!

पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System): तारों और टावरों में उलझी सुरक्षा!
रेल मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों की बाजीगरी भी कम दिलचस्प नहीं है। अपनी पीठ थपथपाते हुए मंत्रालय ने बताया है कि अब तक 8,570 किलोमीटर में ऑप्टिकल फाइबर और टेलीकॉम टावर (Optical Fiber and Telecom Tower) का जाल बिछाया जा चुका है।
इसके अलावा 1,100 टेलीकॉम टावर खड़े कर दिए गए हैं और 267 स्टेशनों पर ‘स्टेशन डेटा सेंटर’ स्थापित करने का बखान किया जा रहा है। कहा गया है कि 6,776 किलोमीटर ट्रैक पर ट्रैकसाइड उपकरण भी लगा दिए गए हैं।
लेकिन जरा इस टाइमलाइन (2016-2026) की क्रोनोलॉजी समझिए। 2016 में जिस कवच तकनीक का विकास शुरू हुआ, उसका पहला संस्करण 2019 में आता है। फिर व्यापक परीक्षण के नाम पर जुलाई 2024 में जाकर इसके अंतिम डिजाइन को स्वीकृति मिलती है!
यह कैसी लालफीताशाही और लेटलतीफी है? 2026 तक यह प्रणाली सिर्फ कुछ गिने-चुने रेल मार्गों पर ‘सीमित विस्तार’ का रोना रो रही है। मात्र 3,154 किलोमीटर तक चलने वाले लोकोमोटिव में इस प्रणाली के उपयोग से क्या पूरा भारत सुरक्षित हो गया?
जब तक 100% रेलवे नेटवर्क पर पूर्वोत्तर रेलवे कवच प्रणाली (North Eastern Railway Kavach System) पूरी तरह से सक्रिय नहीं होती, तब तक सुरक्षा का हर दावा सिर्फ एक खोखला राजनीतिक जुमला है। छपरा-बाराबंकी रेल मार्ग पर टावर लगाने का काम भले ही प्रगति पर हो, लेकिन यात्रियों की जान अभी भी दांव पर है।
तकनीकी विशेषज्ञ भी खुले तौर पर मानते हैं कि ट्रेन हादसों पर लगाम (Prevention of Train Accidents) तभी संभव है जब इस सुरक्षा प्रणाली का वास्तविक लाभ पूरे भारतीय रेल नेटवर्क को मिले। तब तक, भारतीय रेल के यात्रियों के पास एक ही सबसे मजबूत ‘कवच’ है—और वह है ‘भगवान का नाम’।

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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