उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली निगमों के निजीकरण के विरोध में आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली कर्मी ने प्राधिकरण के साथ योगी सरकार की चुप्पी पर भी सवाल किया

निर्भीक इंडिया (संवाददाता नवनीत मिश्रा)- विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, गोरखपुर ने आरोप लगाया है कि योगी सरकार पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के साथ-साथ पाँच प्रमुख शहरों की बिजली व्यवस्था को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है निजीकरण के विरोध में चल रहे इस आंदोलन का आज 295वाँ दिन था, जब प्रदेश के सभी जिलों में बिजली कर्मियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।
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पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली कर्मी ने लगाए निजीकरण की प्रक्रिया गंभीर आरोप
संघर्ष समिति ने बताया कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के लिए बनाए गए ‘आरएफपी डॉक्यूमेंट’ पर विद्युत नियामक आयोग ने जो आपत्तियाँ लगाई थीं, उनका जवाब तैयार कर लिया गया है।
समिति का कहना है कि पावर कॉरपोरेशन किसी भी समय इन दस्तावेजों के अनुमोदन के लिए नियामक आयोग से संपर्क कर सकता है, जिससे निजीकरण की प्रक्रिया को और तेज किया जा सके।
समिति ने विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष श्री अरविंद कुमार से अपील की है कि वे इस दस्तावेज़ को अस्वीकृत कर दें। अगर इस पर चर्चा होती है, तो समिति के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए, क्योंकि यह बिजली कर्मियों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है।

पूर्वांचल और दक्षिणांचलबिजली कर्मी ने वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग को बतया निजीकरण की नई चाल?
संघर्ष समिति ने यह भी आरोप लगाया है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल के निजीकरण के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश के पाँच अन्य शहरों—कानपुर, मेरठ, अलीगढ़, बरेली, और लखनऊ—की बिजली व्यवस्था को भी निजीकरण की दिशा में मोड़ा जा रहा है।
समिति का कहना है कि इन शहरों में की जा रही ‘ऊर्ध्वाधर पुनर्गठन’ (वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग) की प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य उनकी बिजली व्यवस्था का निजीकरण करना है। इस दावे की पुष्टि करते हुए समिति ने पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष डॉ. आशीष गोयल के एक बयान का हवाला दिया।
डॉ. गोयल ने ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन की वेबसाइट पर अपनी उपलब्धियों में इस बात का जिक्र किया है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल के निजीकरण के साथ ही इन पाँच शहरों की बिजली व्यवस्था में भी सुधार के लिए वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग की जा रही है। इससे बिजली कर्मियों की आशंका को बल मिलता है कि यह निजीकरण की एक सोची-समझी रणनीति है।
सरकारी बनाम निजीकरण: पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली कर्मी के विरोध का कारण
संघर्ष समिति ने तर्क दिया कि बिजली व्यवस्था में सुधार के लिए निजीकरण ही एकमात्र उपाय नहीं है। उन्होंने कई ऐसे शहरों का उदाहरण दिया जहाँ सरकारी क्षेत्र में रहते हुए भी बिजली व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
बेंगलुरु, पटियाला, पुणे, हैदराबाद, और गुड़गांव जैसे शहर इस बात का सबूत हैं कि कुशल प्रबंधन और बेहतर कार्यप्रणाली से सरकारी व्यवस्था में भी गुणवत्ता लाई जा सकती है। बिजली कर्मियों ने कहा कि सरकारी क्षेत्र में रहते हुए उन्होंने हर चुनौती का सामना किया है—चाहे वह भीषण गर्मी में रिकॉर्ड बिजली आपूर्ति की बात हो या कुंभ जैसे बड़े आयोजनों में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने की।
उन्होंने कहा कि प्रबंधन द्वारा की जा रही दमनकारी कार्रवाइयां और वेतन न देने जैसी अमानवीय कार्रवाई भी बिजली कर्मियों के आक्रोश का कारण है। संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता और कर्मचारियों पर की गई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई को वापस नहीं लिया जाता।
आज, वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, और अन्य प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शनों ने यह साबित कर दिया है कि यह मुद्दा केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेशव्यापी आंदोलन बन चुका है।

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