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दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में इन दिनों दावों और हकीकत के बीच एक बहुत बड़ी खाई नजर आ रही है। हाल ही में स्ववित्तपोषित योजना के अंतर्गत संचालित पाठ्यक्रमों के विभागाध्यक्षों एवं शिक्षकों की एक डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) आयोजित की गई।

निर्भीक इंडिया (संवाददाता नवनीत मिश्रा)- कुलपति प्रो. पूनम टंडन (Prof Poonam Tandon) की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कागजों पर तो विश्वविद्यालय को ‘ऑक्सफोर्ड’ बनाने की पूरी पटकथा लिख दी गई। मीटिंग में इंजीनियरिंग, कृषि, फार्मेसी, प्रबंधन और विधि जैसे विभागों के करीब 90 शिक्षक शामिल हुए।
DDU Gorakhpur VC Meeting : शोध के खोखले दावे और पत्रकारिता विभाग से सौतेला व्यवहार
लेकिन सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को गढ़ने वाला डीडीयू पत्रकारिता विभाग (DDU Journalism Department) इस पूरी चर्चा से नदारद क्यों रहा? क्या डीडीयू प्रशासन की नजर में पत्रकारिता की कोई अहमियत नहीं है?
इस हाई-प्रोफाइल डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) में बड़ी-बड़ी बातें की गईं। ‘यूनिवर्सिटी रिसर्च एक्सीलेंस अवार्ड (UREA) 2025’ बांटे गए। कुलपति महोदया ने शिक्षकों को स्कोपस (Scopus) सूचीबद्ध जर्नलों में शोध पत्र प्रकाशित करने, पेटेंट दाखिल करने और अंतरविभागीय शोध परियोजनाओं के लिए अनुदान लाने का लंबा-चौड़ा उपदेश दिया।
यह सुनकर ऐसा प्रतीत होता है मानो डीडीयू विश्व स्तर के शोध का मक्का बन चुका है। नव नियुक्त शिक्षकों को संस्थागत ईमेल आईडी बांटने और बिना पीएचडी वाले शिक्षकों को डॉक्टरेट में नामांकन लेने का फरमान भी सुनाया गया। लेकिन यह सारी ‘बाजारोन्मुखी’ और ‘शोधपरक’ बातें उस वक्त एक भद्दा मजाक बन जाती हैं, जब विश्वविद्यालय के एक अहम विभाग की छत से पानी टपक रहा हो।
इस डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इसमें पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग का कोई भी शिक्षक दूर-दूर तक नजर नहीं आया। क्या उन्हें इस महत्वपूर्ण बैठक में बुलाया ही नहीं गया था? या फिर वे प्रशासन के झूठे वादों से आजिज आकर खुद ही इस दिखावे से दूर रहे?
एक तरफ कुलपति प्रतिमाह और त्रैमासिक शोध समीक्षा बैठकों का सुझाव दे रही हैं, और दूसरी तरफ एक पूरा का पूरा विभाग अपने अस्तित्व और मूलभूत सुविधाओं के लिए भीख मांग रहा है। यह दोहरा रवैया विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस गंभीर मामले की तह तक जाने के लिए ‘निर्भीक इंडिया’ (Nirbhik India) ने अपनी पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) से सीधे व्हाट्सएप के जरिए संपर्क साधा। हमने स्पष्ट शब्दों में पूछा- “महोदय कुलपति डीडीयू द्वारा बुलाये गए स्ववित्तपोषित शिक्षकों के साथ वार्ता में डीडीयूजीयू के पत्रकारिता एवं जनसंचार के शिक्षक स्ववित्तपोषित शिक्षक नहीं दिख रहे हैं, कृपया एक बार क्लियर करके बता देंगे कि क्या इस बैठक में मास कम्युनिकेशन के टीचर उपलब्ध थे या नहीं?” लेकिन, खबर लिखे जाने तक PRO महोदय की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। यह ‘चुप्पी’ चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि प्रशासन के पास अपने इस सौतेले व्यवहार का कोई तार्किक जवाब नहीं है।

DDU Gorakhpur VC Meeting : झूठे वादों का पुलिंदा और डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) का छलावा
जब डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) में ‘गुणवत्तापूर्ण शोध’ पर तालियां बज रही थीं, उसी वक्त डीडीयू पत्रकारिता विभाग (DDU Journalism Department) के छात्र अपने ठगे जाने का मातम मना रहे थे। प्रशासन के वादों की फेहरिस्त और उनके टूटने का सिलसिला बेहद शर्मनाक है। मीडिया लैब का जो वादा सत्र 2023-25 के छात्रों से किया गया था, वह आज तक हवा-हवाई है।

हद तो तब हो गई जब छात्रों के दबाव में आकर डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) के नाम पर विश्वविद्यालय के आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज पर एक पूर्णतः फर्जी फोटो अपलोड कर दी गई, जिसका आज तक प्रशासन ने कोई खंडन करने की जहमत नहीं उठाई।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन (Prof Poonam Tandon) के वादों का कच्चा चिट्ठा यहीं खत्म नहीं होता। विगत 7 अगस्त को कुलपति ने अपने कार्यालय में पत्रकारिता के छात्रों को बुलाकर बड़े गर्व से दावा किया था कि आने वाले दो महीनों में इस पाठ्यक्रम के लिए 50 लाख रुपये का भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट किया जाएगा। यह दावा भी पूरी तरह से सफेद झूठ साबित हुआ।
उसी दिन 7 अगस्त को जब छात्रों ने डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) के उद्घाटन की तारीख पूछी, तो DSW (डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर) की मौजूदगी में सर्वसम्मति से 14 नवंबर की तारीख तय की गई। लेकिन 14 नवंबर भी बीत गया और उद्घाटन का कोई अता-पता नहीं।



प्रशासन की बेशर्मी की इंतहा तब हुई जब 4 नवंबर को हिन्दी विभाग के और पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष जो अब पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर गुप्ता को उपवास रखना पड़ा था। डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) के निर्माण के लिए उपवास तक रखना पड़ा। उस वक्त भी कुलपति ने उनसे वादा किया था कि कम से कम 3 दिन और अधिकतम 7 दिनों के भीतर लैब का कार्य शुरू करवा दिया जाएगा। आज वह वादा भी झूठ का एक और पुलिंदा बनकर रह गया है।
ऐसे में डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) में किए जा रहे संस्थागत विकास के दावे खोखले ड्रम की तरह बज रहे हैं, जिनमें आवाज तो बहुत है लेकिन अंदर कुछ नहीं है।
अब पत्रकारिता के छात्रों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी मांगें एकदम स्पष्ट और जायज हैं। पहली मांग यह है कि डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) का आज ही शिलान्यास हो और कुलपति लिखित रूप में उद्घाटन की तारीख दें। जब तक सुविधाएं नहीं मिलतीं, वर्तमान में पत्रकारिता पाठ्यक्रम में एनरोल सभी छात्र-छात्राओं की आधी ट्यूशन फीस वापस की जाए।
स्कोपस जर्नल की बात करने वाले प्रशासन को यह देखना चाहिए कि छात्रों की कक्षाओं की छतें टूटी हैं, प्लास्टर उखड़ रहे हैं, पंखे जले हुए हैं, दीवारों से सीलन चू रही है और डेस्क-बेंच टूटे पड़े हैं। छात्रों की मांग है कि कक्षाओं को आधुनिक बनाया जाए, ग्रीन बोर्ड हटाकर स्मार्टबोर्ड लगाए जाएं, और BAJMC 5th सेमेस्टर व MAJMC 3rd सेमेस्टर के छात्रों को लैब उद्घाटन के बाद 6 महीने का अतिरिक्त एक्सेस दिया जाए।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हत्या का सुनियोजित प्रयास?
डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) की पूरी पटकथा को देखकर एक बेहद कड़वा लेकिन प्रासंगिक सवाल उठता है। क्या भारत सरकार के कुछ कथित पैमानों की तर्ज पर अब डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय प्रशासन भी जनमानस की मूलभूत इकाई जनसंचार और लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग ‘पत्रकारिता’ को पूरी तरह से दबा देना चाहता है?
जब एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्रों को लैब, अच्छी कक्षाएं और बुनियादी सम्मान नहीं मिलेगा, तो वे समाज के लिए निर्भीक पत्रकार कैसे बनेंगे? शायद प्रशासन यही चाहता है कि कोई निर्भीक आवाज इस कैंपस से बाहर ही न निकले।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन (Prof Poonam Tandon) ने इस डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) में शोध पर लंबे-चौड़े प्रवचन दिए हैं। लेकिन क्या प्रो. टंडन को डीडीयू के इस तथाकथित पत्रकारिता विभाग में पिछले 2 पास-आउट बैचों द्वारा किए गए लघु शोध प्रबंधों (Dissertations) की रत्ती भर भी जानकारी है?
क्या उन्हें पता है कि बिना संसाधनों के भी उन छात्रों ने कितनी रोचक और कीमती खोजें की हैं? इसका जवाब है- नहीं। क्योंकि कुलपति महोदया ने आज तक कभी उन पास-आउट बैच के छात्रों से बैठकर बात ही नहीं की। जो प्रशासन अपने ही छात्रों के जमीनी शोध को नहीं जानता, वह विदेशी जर्नल्स में छपने के खोखले सपने बेच रहा है।
यह विडंबना ही है कि डीडीयू पत्रकारिता विभाग (DDU Journalism Department) को स्ववित्तपोषित (Self-Financed) बताकर छात्रों से मोटी फीस तो वसूली जाती है, लेकिन जब सुविधाओं की बात आती है, तो प्रशासन के पास सिर्फ तारीखें और फर्जी इंस्टाग्राम तस्वीरें होती हैं।
एक तरफ 90 शिक्षकों को बुलाकर शैक्षणिक प्रतिष्ठा का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, और दूसरी तरफ जनसंचार विभाग के शिक्षकों को बैठक से ही गायब कर दिया जाता है। यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अक्षमता और एक विशेष विभाग के प्रति दुर्भावनापूर्ण ‘स्टेप-मदरली ट्रीटमेंट’ (सौतेला व्यवहार) को दर्शाता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझ लेना चाहिए कि ‘निर्भीक इंडिया’ और यहां के जुझारू छात्र उनके इस निरंकुश रवैये को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे। डीडीयू गोरखपुर कुलपति बैठक (DDU Gorakhpur VC Meeting) के दिखावे से काम नहीं चलेगा।
जब तक डीडीयू मीडिया लैब (DDU Media Lab) धरातल पर नहीं उतरती, जर्जर कक्षाएं स्मार्ट क्लास में नहीं बदलतीं और झूठे वादों के लिए जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। कागजों पर ‘एक्सीलेंस अवार्ड’ बांटने से पहले कुलपति को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि वे एक पत्रकारिता विभाग को खंडहर में तब्दील करके किस ‘एक्सीलेंस’ की बात कर रही हैं।

निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 245 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।
Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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