वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य वर्तमान में एक अत्यंत संवेदनशील, जटिल और परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है । विशेष रूप से मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) के भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने उस निर्बाध ऊर्जा प्रवाह के समक्ष अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है, जिस पर भारत जैसी तेजी से उभरती और विशाल अर्थव्यवस्थाएं अपनी निरंतर वृद्धि, औद्योगिक विकास और वृहद-आर्थिक स्थिरता के लिए निर्भर हैं।

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प्रस्तावना: मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) की आहट
पिछले एक दशक में सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के दृष्टिकोण को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है । सरकार ने वर्ष 2047 तक देश को ऊर्जा के क्षेत्र में पूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाने का एक अत्यधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि, इन महत्वाकांक्षी दावों, नीतिगत पहलों और जमीनी हकीकत के बीच एक स्पष्ट संरचनात्मक अंतर मौजूद है । वर्तमान मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) ने भारत की इस संरचनात्मक ऊर्जा भेद्यता को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका सैन्य संघर्ष (Iran-Israel-US Military Conflict) का वैश्विक प्रभाव
28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिकी और इजरायली संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुए युद्ध ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी है । भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा और तेल उपभोक्ता देश है, जो वैश्विक खपत में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है।
इस विशाल मांग को पूरा करने के लिए भारत को भारी मात्रा में आयात पर निर्भर रहना पड़ता है । इस युद्ध ने भारत की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला पर तत्काल और गहरा प्रभाव डाला है ।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता के दावों का पर्दाफाश: मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) की पृष्ठभूमि में
भारत की ऊर्जा वास्तुकला वर्तमान में एक बड़े विरोधाभास पर आधारित है, जहाँ देश के पास विश्व स्तर की विशाल रिफाइनिंग क्षमता है, लेकिन इस क्षमता को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन अत्यंत सीमित है । पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ तथा अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के नवीनतम आंकड़ों का विश्लेषण इस विरोधाभास को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है ।
- घटता घरेलू उत्पादन: अप्रैल 2022 से मार्च 2025 के बीच भारत के घरेलू कच्चे तेल के उत्पादन में 2.18% की गिरावट दर्ज की गई है। अक्टूबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत का घरेलू कच्चा तेल उत्पादन मात्र 2.3 मिलियन मीट्रिक टन था, जबकि इसी अवधि के दौरान रिफाइनरियों द्वारा कुल 22.5 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल का प्रसंस्करण किया गया ।
- विशाल रिफाइनिंग क्षमता: मार्च 2024 तक भारत की रिफाइनिंग क्षमता 256.8 मिलियन मीट्रिक टन थी, जिसमें 23 प्रमुख रिफाइनरियां शामिल हैं । भारत की रिफाइनिंग क्षमता 250 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष के आंकड़े को पार कर चुकी है, जो इसे विश्व स्तर पर शीर्ष पांच रिफाइनिंग देशों में से एक बनाती है ।
- आयात निर्भरता की भयावह स्थिति: पिछले पांच वर्षों में कच्चे तेल के लिए भारत की आयात निर्भरता 85 से 88 प्रतिशत के बीच रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में कच्चे तेल की आयात निर्भरता 88.2% थी, जो वित्त वर्ष 2025-26 के जनवरी महीने तक बढ़कर 88.6% के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है ।
- मध्य पूर्व पर अत्यधिक संकेंद्रण: 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अपने कच्चे तेल के आयात का 48.7%, एलएनजी आयात का 68.4% और एलपीजी आयात का 91% से अधिक हिस्सा केवल मध्य पूर्व के अस्थिर क्षेत्र से प्राप्त किया ।
होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक आपूर्ति (Strait of Hormuz and Global Supply) पर मंडराता खतरा
मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) का सबसे विनाशकारी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परिणाम होर्मुज जलडमरूमध्य का वस्तुतः बंद हो जाना है । ओमान और ईरान के बीच स्थित यह जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा चोकपॉइंट है । पिछले वर्ष, लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और परिष्कृत उत्पाद प्रतिदिन इस संकीर्ण जलमार्ग से गुजरे थे।
संघर्ष के बढ़ने और जहाजों पर सीधे हमलों के बाद से, इस मार्ग से तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही में 90% से अधिक की भारी गिरावट आई है । अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध वैश्विक बाजारों में दर्ज किया गया अब तक का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति झटका पैदा कर रहा है । खाड़ी उत्पादकों ने अपने उत्पादन में कम से कम 10 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कटौती की है, जो वैश्विक तेल मांग का लगभग 10% है ।
आपातकालीन बफर और नीतियां: मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) से निपटने की रणनीति
मध्य पूर्व में पूर्ण पैमाने पर युद्ध और आपूर्ति में संभावित व्यवधान के बीच, किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा की पहली पंक्ति उसके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार होते हैं । भारत ने अपनी आयात भेद्यता को स्वीकार करते हुए पिछले कुछ वर्षों में अपनी आपातकालीन भंडारण क्षमता को विकसित करने का प्रयास किया है ।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) की कड़वी सच्चाई
सीमित क्षमता: वर्तमान में, चरण-1 के तहत भारत की कुल रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार क्षमता महज 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है ।
- भौगोलिक वितरण: इन भंडारों का वितरण दक्षिण और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में किया गया है, जिसमें विशाखापत्तनम में 1.33 मिलियन मीट्रिक टन, मंगलुरु में 1.5 मिलियन मीट्रिक टन, और पादुर में 2.5 मिलियन मीट्रिक टन की क्षमता स्थापित की गई है ।
- वैश्विक मानकों से पिछड़ापन: वर्तमान में ये रणनीतिक भंडार लगभग 80% भरे हुए हैं और भारत की विशाल राष्ट्रीय मांग के अनुसार केवल 9 से 10 दिनों का क्रूड ऑयल कवरेज प्रदान करते हैं । अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी अपने सदस्य देशों को आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए कम से कम 90 दिनों के शुद्ध आयात के बराबर तेल स्टॉक बनाए रखने का निर्देश देती है । भारत का 9.5 दिनों का रणनीतिक भंडार काफी अपर्याप्त प्रतीत होता है ।
- तुलनात्मक विश्लेषण: तुलनात्मक दृष्टिकोण से, चीन ने रणनीतिक रूप से अपने भंडार का विस्तार किया है जो लगभग 130 दिनों की मांग को पूरा कर सकता है, जबकि जापान के पास लगभग आठ महीने की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त इन्वेंट्री मौजूद है ।
विस्तार में देरी: सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड के तहत सरकार ने दूसरे चरण को मंजूरी दी है, जिसमें 6.5 मिलियन मीट्रिक टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता स्थापित की जाएगी । हालांकि, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में देरी के कारण इन परियोजनाओं के चालू होने में इस दशक के अंत तक का समय लग सकता है, जो अल्पावधि में भारत की भेद्यता को बढ़ाता है ।
आपातकालीन गैस आवंटन नीति (Emergency Gas Allocation Policy) का कड़ा कदम
एलएनजी आपूर्तिकर्ताओं द्वारा अप्रत्याशित घटना घोषित किए जाने के बाद, आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हुई है । इस संकट का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार ने अपनी गैस आवंटन प्राथमिकताओं को तत्काल प्रभाव से संशोधित किया है ।
नई आपातकालीन गैस आवंटन नीति (Emergency Gas Allocation Policy) के तहत प्राकृतिक गैस का 100% आवंटन एलपीजी उत्पादकों, सीएनजी आपूर्तिकर्ताओं, और पाइप वाली घरेलू गैस वितरकों को सुनिश्चित किया गया है । इसके अतिरिक्त, ‘प्राकृतिक गैस आदेश 2026’ के तहत उर्वरक संयंत्रों को ‘प्राथमिकता क्षेत्र-2’ में रखा गया है ।
इसके अंतर्गत, उर्वरक संयंत्रों को उनके पिछले छह महीनों की औसत खपत का कम से कम 70% गैस प्रदान किया जाएगा । इन प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए, सरकार ने पेट्रोकेमिकल संयंत्रों, रिफाइनरियों और उच्च मूल्य वाले वाणिज्यिक औद्योगिक उपभोक्ताओं को दी जाने वाली गैस आपूर्ति में भारी कटौती की है ।
कूटनीतिक चालें: मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) के दौर में भारत का रुख
इस अभूतपूर्व और बहुआयामी वैश्विक संकट का सामना करने के लिए, भारत सरकार ने कूटनीतिक संतुलन, रणनीतिक स्वायत्तता, और आक्रामक घरेलू नीतिगत समायोजन का एक परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाया है ।
रूसी तेल और अमेरिकी टैरिफ (Russian Oil and US Tariffs) का भू-राजनीतिक दबाव : भारत की ऊर्जा कूटनीति का सबसे जटिल पहलू रूस, अमेरिका और वेनेजुएला के बीच उसका भू-राजनीतिक संतुलन है ।
2022 में G7 देशों द्वारा मूल्य सीमा के कारण रूसी कच्चे तेल की कीमतें काफी गिर गई थीं । 2021 में भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी मात्र 2.5% थी, जो 2023 में छलांग लगाकर 39% हो गई थी । हालांकि, अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत द्वारा रूसी तेल की निरंतर खरीद के जवाब में द्वितीयक टैरिफ लागू करते हुए कुल टैरिफ दर को 50% तक बढ़ा दिया ।
रूसी तेल और अमेरिकी टैरिफ (Russian Oil and US Tariffs) के इस संकट ने व्यापारिक वास्तविकता को बदल दिया । जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में रूस से कच्चे तेल के आयात में साल-दर-साल आधार पर 40% की भारी गिरावट दर्ज की गई । दबाव को कम करने के लिए, भारत ने वेनेजुएला और संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने आपूर्तिकर्ता आधार में फिर से मजबूती से शामिल किया है ।
रणनीतिक संप्रभुता और इंडिया फर्स्ट नीति (India First Policy)
वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर करने और बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के प्रयास में, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और G7 देशों ने समन्वित तेल निकासी का प्रस्ताव रखा था । लेकिन भारत सरकार ने एक दृढ़ रुख अपनाते हुए इस पहल में शामिल होने से इनकार कर दिया ।
सरकार के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, भारत ने अपनी इंडिया फर्स्ट नीति (India First Policy) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है । इस इंडिया फर्स्ट नीति (India First Policy) के अंतर्गत भारत का तर्क है कि उसके सीमित रणनीतिक भंडार पूरी तरह से वास्तविक और भौतिक घरेलू आपूर्ति व्यवधानों से निपटने के लिए एक अंतिम बफर के रूप में हैं ।
सरकार की यह इंडिया फर्स्ट नीति (India First Policy) स्पष्ट करती है कि इन अमूल्य भंडारों का उपयोग वैश्विक मूल्य अस्थिरता को शांत करने या अमीर देशों के बाजार हेरफेर प्रयासों का समर्थन करने के लिए नहीं किया जा सकता ।
भारत की वर्तमान अस्वीकृति और मजबूती से अपनाई गई यह इंडिया फर्स्ट नीति (India First Policy) यह दर्शाती है कि वह अब अपनी रणनीतिक परिसंपत्तियों का प्रबंधन केवल अपनी घरेलू प्राथमिकताओं के आधार पर करेगा ।
इथेनॉल सम्मिश्रण लक्ष्य 2025 (Ethanol Blending Target 2025) और स्वच्छ ऊर्जा
आयात निर्भरता कम करने की दिशा में सरकार की सबसे सफल नीतियों में से एक इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम रहा है । सरकार ने इथेनॉल सम्मिश्रण लक्ष्य 2025 (Ethanol Blending Target 2025) के तहत पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया है । जनवरी 2024 को समाप्त होने वाले तीन महीनों में यह मिश्रण दर 11% तक पहुंच गई थी ।
सरकारी अनुमानों के अनुसार, केवल 2021-22 में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर भारत ने लगभग 2.7 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई है । सरकार ने कम्प्रेस्ड बायोगैस को भी बढ़ावा दिया है, जो गैसोलीन के एक हरित विकल्प के रूप में उभर रहा है ।
निष्कर्ष: मध्य पूर्व युद्ध और तेल संकट (Middle East War and Oil Crisis) से सबक
भारत की ऊर्जा सुरक्षा वास्तुकला वर्तमान में एक अत्यंत जटिल और निर्णायक चौराहे पर खड़ी है । यद्यपि भारत के पास अपने 5.33 मिलियन मीट्रिक टन के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और वाणिज्यिक भंडार के कारण तात्कालिक आपूर्ति संकट को टालने की क्षमता है, लेकिन ये भंडार दीर्घकालिक युद्ध की स्थिति में स्पष्ट रूप से अपर्याप्त साबित होंगे ।
88.6% आयात निर्भरता की कठोर वास्तविकता यह बताती है कि जब तक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम उत्पादों को प्रतिस्थापित नहीं कर देते, तब तक 2047 तक पूर्ण ऊर्जा स्वतंत्रता का दावा एक अत्यधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य बना रहेगा ।
वास्तविक और स्थायी ऊर्जा सुरक्षा केवल तभी संभव है जब भारत आयातित जीवाश्म ईंधन से अपनी अर्थव्यवस्था को संरचनात्मक रूप से अलग करे । ई-मोबिलिटी, उन्नत जैव-ईंधन प्रौद्योगिकियों और नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड एकीकरण में भारी निवेश ही भारत को भू-राजनीतिक झटकों से पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान कर सकेगा ।
वर्तमान संकट ने निर्विवाद रूप से स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं है, बल्कि यह एक सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यता है ।

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