भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्म निर्माता कहानियाँ गढ़ते हैं, और कुछ निर्देशक 'फाइलें' खोलते हैं। विवेक रंजन अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) इसी दूसरी श्रेणी में आते हैं, और उनकी हर नई फिल्म, एक नई 'फाइल' होती है 'द कश्मीर फाइल्स' (The Kashmir Files), 'द बंगाल फाइल्स' (The Bengal Files) और न जाने कौन-कौन सी 'फाइलें' भविष्य में खुलेंगी।

विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) सिनेमाई सफर सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट वैचारिक और राजनीतिक एजेंडा लेकर चलता है, जहाँ इतिहास और वर्तमान को एक ख़ास नज़रिए से पेश किया जाता है। उनका सिनेमाई दृष्टिकोण, जो खुद को ‘सिनेमाई न्याय’ (cinematic justice) कहता है, अक्सर विवादों और तीखी बहस का विषय रहा है।
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विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) का इतिहास का ‘सिनेमाई’ पुनर्लेखन
विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) की फिल्मों की सबसे ख़ास बात यह है कि वे ‘इतिहास’ को एक नए और अक्सर विवादास्पद दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) में कश्मीरी पंडितों के पलायन को एक खास राजनीतिक और धार्मिक रंग दिया गया, और अब ‘द बंगाल फाइल्स’ (The Bengal Files) भी 1940 के दशक की सांप्रदायिक हिंसा को उसी तरह के लेंस से देखती है। ये फ़िल्में केवल ऐतिहासिक घटनाओं को दर्शाती नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक खास विचारधारा के खांचे में फिट करती हैं।
उनकी फिल्मों में नायक हमेशा एक होता है—अक्सर एक ऐसा व्यक्ति या समूह जो एक विशेष वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है—और खलनायक भी। यह खलनायक, हमेशा एक ही समुदाय से आता है। इस तरह के सिनेमा में, हर सामाजिक बुराई के पीछे, हर ऐतिहासिक दुख के पीछे एक ही तरह के चेहरे दिखते हैं।
यह ‘कलात्मक स्वतंत्रता’ (artistic freedom) नहीं है, बल्कि एक सटीक राजनीतिक गणित है, जहाँ दर्शकों को एक ही तरह का संदेश बार-बार दिया जाता है: समस्या एक है और उसका कारण भी। यह दृष्टिकोण समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है और दर्शकों के मन में एक विशेष समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह पैदा करता है।

विवेक अग्निहोत्री (Vivek Agnihotri) की फिल्मों से बॉलीवुड (Bollywood) की विचारधारा की जंग
जॉन अब्राहम (John Abraham) जैसे कलाकारों के हालिया बयान, जिनमें उन्होंने ‘हाइपर-पॉलिटिकल’ (hyper-political) फिल्मों से दूरी बनाने की बात कही, इस विचारधारा की जंग को और भी स्पष्ट करते हैं। जब एक तरफ जॉन ‘अराजनीतिक’ होने का दावा करते हैं, तो दूसरी तरफ अग्निहोत्री जैसे निर्देशक ‘सच्चाई’ और ‘न्याय’ की लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि जब आप सिनेमा जैसे शक्तिशाली माध्यम का उपयोग करते हैं, तो ‘अराजनीतिक’ रहना असंभव है। हर कहानी, हर किरदार और हर संवाद किसी न किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है।
अग्निहोत्री की फ़िल्में सिर्फ इतिहास को नहीं दिखातीं, बल्कि इतिहास को एक नई रोशनी में रंग देती हैं, जहाँ हर काला बादल एक ही दिशा से आता है। इस तरह का सिनेमाई दृष्टिकोण सिर्फ मनोरंजन नहीं करता, बल्कि एक खास तरह की सोच को बढ़ावा देता है। यह भारतीय समाज के एक संवेदनशील मुद्दे पर एकतरफा कहानी पेश करता है, और इसे ‘सही’ और ‘अकाट्य तथ्यों’ का नाम देता है। उनकी फ़िल्में अक्सर विवादों को जन्म देती हैं, और खुद अग्निहोत्री ने स्वीकार किया है कि वे एजेंडा वाली फिल्में बनाते हैं, जिसका उद्देश्य हिंदू सभ्यता पर फिल्में बनाना है।
अंत में, यह सब दर्शकों के लिए एक ‘फाइल’ और ‘फाइट’ का खेल बन जाता है, जहाँ ‘सच्चाई’ बस एक मार्केटिंग टूल बनकर रह जाती है, और सिनेमा एक वैचारिक अस्त्र। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कला और राजनीति का मेल हमेशा से रहा है, लेकिन जब कला को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तो उसकी आत्मा खो जाती है। विवेक अग्निहोत्री का सिनेमा ‘न्याय’ की बात करता है, लेकिन यह कौन-सा न्याय है, यह दर्शकों को खुद तय करना होगा। यह लेख दर्शाता है कि कैसे उनका काम इतिहास को एक हथियार के रूप में उपयोग करता है, जिससे समाज में दरार और विभाजन पैदा होता है।
यह वीडियो विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द बंगाल फाइल्स पर हो रहे विवादों के बारे में है, जिसमें उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है।
लेख- नवनीत मिश्र
(पत्रकार व मीडिया शोधार्थी एम0ए0जे0एम0सी0)

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