आर्थिक लेखविवेचना स्तम्भ

भारी टैक्स कलेक्शन : जनता खाली, खजाना भरा

10 नवंबर 2025 तक के प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) संग्रह के अनंतिम आंकड़े सामने आ चुके हैं। वित्त मंत्रालय और आयकर विभाग अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि चालू वित्त वर्ष (2025-26) में नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹12.92 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के ₹12.08 लाख करोड़ की तुलना में 7.00 प्रतिशत अधिक है। सरकार इसे ‘मजबूत कॉर्पोरेट कमाई’, ‘बेहतर अनुपालन’ और ‘भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती’ का प्रमाण बता रही है।

भारी टैक्स कलेक्शन में आंकड़ों का खेल: रिफंड में कटौती से चमका खजाना
भारी टैक्स कलेक्शन जनता खाली, खजाना भरा

लेकिन अगर इन आंकड़ों के भीतर छिपी आर्थिक और सामाजिक सच्चाइयों की परतों को उघाड़ा जाए, तो एक खौफनाक और तकलीफदेह तस्वीर उभरती है। देश की कर प्रणाली एक ऐसे ‘संगठित दबाव तंत्र’ का रूप ले चुकी है, जहां नागरिक से पैसे वसूलने के लिए तो हर डिजिटल हथियार और कानूनी चाबुक का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जब बदले में उसे बुनियादी नागरिक सुविधाएं देने की बात आती है, तो सरकारें हाथ खड़े कर देती हैं।

आज भारत का आम करदाता खुद को उस नागरिक की तरह महसूस कर रहा है, जिससे डरा-धमकाकर या कानूनी चाबुक दिखाकर भारी कर तो वसूल लिया जाता है, लेकिन बदले में उसे जीने के लिए जहरीली हवा, पीने के लिए प्रदूषित नदियां, जानलेवा ट्रैफिक और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं ही मिलती हैं।

भारी टैक्स कलेक्शन में आंकड़ों का खेल: रिफंड में कटौती से चमका खजाना

सरकार जिस 7.00 प्रतिशत की नेट ग्रोथ का जश्न मना रही है, उसका सच आंकड़ों के गणित में छिपा है।

ग्रॉस बनाम नेट का फर्क: वित्त वर्ष 2025-26 में 10 नवंबर 2025 तक ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹15.35 लाख करोड़ रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के ₹15.03 लाख करोड़ के मुकाबले महज 2.15 प्रतिशत की मामूली वृद्धि दर्शाता है। यानी सरकार के राजस्व संग्रह की वास्तविक रफ्तार केवल 2.15% है।

रिफंड में भारी गिरावट: नेट कलेक्शन को 7.00% की ऊंचाई पर दिखाने का असली श्रेय टैक्सपेयर्स के रिफंड रोकने या उसमें देरी करने को जाता है। इस अवधि में कुल ₹2.43 लाख करोड़ के रिफंड जारी किए गए, जो पिछले साल के ₹2.95 लाख करोड़ की तुलना में 17.72 प्रतिशत कम हैं। रिफंड में यह भारी कटौती ही सरकारी खजाने में कृत्रिम चमक पैदा कर रही है।

कॉर्पोरेट टैक्स बनाम गैर-कॉर्पोरेट (व्यक्तिगत) टैक्स: आंकड़ों का सबसे दुखद पहलू यह है कि देश का आम मध्यमवर्ग बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों से ज्यादा टैक्स का बोझ उठा रहा है।

कर का प्रकार (Tax Head)ग्रॉस संग्रह (Gross Collection)नेट संग्रह (Net Collection)
कॉर्पोरेट टैक्स (Corporate Tax)₹6.91 लाख करोड़₹5.37 लाख करोड़
गैर-कॉर्पोरेट टैक्स (Non-Corporate/Individual Tax)₹8.08 लाख करोड़₹7.19 लाख करोड़
प्रतिभूति लेन-देन कर (STT)₹35,682 करोड़————
अन्य कर (Other Taxes)₹335 करोड़————–

आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि नेट कॉर्पोरेट टैक्स जहां ₹5.37 लाख करोड़ है, वहीं आम नागरिकों, वेतनभोगी वर्ग, एचयूएफ (HUF) और छोटी फर्मों से वसूला गया नेट नॉन-कॉर्पोरेट टैक्स ₹7.19 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। अरबों का मुनाफा कमाने वाले उद्योगपतियों को टैक्स छूट और प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं, जबकि पाई-पाई का हिसाब रखने वाले मध्यमवर्ग की जेब से ₹8.08 लाख करोड़ का ग्रॉस टैक्स खींच लिया गया।

भारी टैक्स कलेक्शन केवल भय और दमन पर टिकी टैक्स प्रणाली

आज भारत में आयकर विभाग की कार्यप्रणाली किसी कल्याणकारी राज्य की प्रतिनिधि न लगकर एक निर्मम कर-वसूली मशीन जैसी नजर आती है। ‘फेसलेस एसेसमेंट’, एआई-संचालित नोटिस और टीडीएस (TDS) के मकड़जाल ने आम वेतनभोगी और छोटे व्यापारी को लगातार खौफ के साए में जीने पर मजबूर कर दिया है।

बैंक खातों से लेकर क्रेडिट कार्ड के खर्चों और छोटी-बड़ी खरीदारी तक, सरकार की पैनी नजर नागरिक के हर एक रुपये पर है। अगर किसी मामूली लिपिकीय गलती के कारण नोटिस आ जाए, तो अपनी ही गाढ़ी कमाई के रिफंड के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। करदाता को एक ऐसे अपराधी के रूप में देखा जाता है जिसे जब तक साबित न हो जाए, दोषी ही माना जाएगा।

यह रवैया किसी लोकतांत्रिक सरकार का नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘बुली’ (Bully) का है जो सत्ता और कानून के पावर का इस्तेमाल सिर्फ अपने नागरिकों को निचोड़ने के लिए करता है।

भारी टैक्स कलेक्शन बदले क्या मिल रहा है? जहरीली हवा और मैली नदियां

सवाल यह है कि ₹12.92 लाख करोड़ का यह नेट डायरेक्ट टैक्स, इसके अलावा लाखों करोड़ रुपये का जीएसटी (GST) और पेट्रोल-डीजल पर लिया जाने वाला भारी उत्पाद शुल्क कहां जा रहा है? क्या टैक्स देने वाले नागरिक को इसके बदले एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन मिल रहा है?

  • सांसों पर संकट और जहरीले शहर : देश की राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर भारत और देश के बड़े-बड़े मेट्रो शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 से 500 के ‘गंभीर’ स्तर को पार कर जाता है। देश का ईमानदार टैक्सपेयर अपनी मेहनत की कमाई का 30% हिस्सा सरकार को देने के बाद एयर प्यूरीफायर (Air Purifier) और एन-95 मास्क खरीदने पर मजबूर है। सरकारें हर साल करोड़ों के विज्ञापन देती हैं, लेकिन नागरिक अपनी और अपने बच्चों की फेफड़ों की बीमारी का इलाज कराने के लिए अस्पताल के चक्कर काटते हैं।
  • नदियों और भूजल की तबाही : गंगा, यमुना, साबरमती जैसी नदियों की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये बहा दिए गए, लेकिन नदियां आज भी जहरीले झाग और सीवेज के नालों में तब्दील हैं। शहरों में भूमिगत जल का स्तर लगातार गिर रहा है और जो पानी उपलब्ध है, वह भारी धातुओं व कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) तत्वों से दूषित है। स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी मानवीय आवश्यकता के लिए भी जनता को आरओ (RO) और वॉटर प्यूरीफायर कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया गया है।
  • खस्ताहाल सड़कें और जानलेवा ट्रैफिक : टैक्स के साथ-साथ रोड टैक्स, टोल टैक्स और भारी-भरकम चालान भरने के बावजूद नागरिक घंटों ट्रैफिक जाम में फंसने को मजबूर हैं। गड्ढों से भरी सड़कें, जलभराव और असुरक्षित परिवहन व्यवस्था हर साल हजारों निर्दोष लोगों की जान ले लेती है।
  • वेंटिलेटर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था : सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। बिना स्ट्रेचर के तड़पते मरीज, डॉक्टरों की भारी कमी और वेंटिलेटर व दवाओं का अभाव सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की पोल खोलता है। मध्यमवर्ग मजबूरन अपनी बचत का बड़ा हिस्सा महंगे निजी अस्पतालों में लुटाने पर विवश है।

दो भारत का निर्माण: वीआईपी बनाम आम करदाता

भारत में टैक्स के इस विशाल खेल ने दो अलग-अलग दुनिया खड़ी कर दी हैं। एक दुनिया उन नेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों और उनके परिवारों की है, जिनकी ऐशो-आराम की जिंदगी का पूरा खर्च इसी करदाता के पैसे से चलता है।

नेताओं और अफसरों के लिए सब मुफ्त: लुटियंस दिल्ली और राज्यों की राजधानियों के हरे-भरे, प्रदूषण-मुक्त वीआईपी इलाकों में रहने वाले नेताओं और अफ़सरशाहों को कभी ट्रैफिक जाम का सामना नहीं करना पड़ता। उनके लिए सड़कें खाली करा दी जाती हैं। उनके बंगलों में हवा साफ करने वाले महंगे प्यूरीफायर लगे हैं, पीने के लिए मिनरल वॉटर है और बीमार पड़ने पर देश-विदेश के सबसे महंगे अस्पतालों (जैसे एम्स का वीआईपी वार्ड) में मुफ्त इलाज की सुविधा है।

आम नागरिक के लिए केवल मार: दूसरी तरफ वह आम टैक्सपेयर है जो सुबह लोकल ट्रेन, खचाखच भरी बसों या जाम में फंसकर दफ्तर पहुंचता है, अपनी सैलरी से पहले ही कट चुका टैक्स देता है और शाम को जहरीली हवा में सांस लेते हुए अपने घर लौटता है।

यह विषमता अब बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है। जब राजनेताओं और सरकारी तंत्र को नागरिक के जीवन की गुणवत्ता सुधारने की कोई फिक्र ही नहीं है, तो फिर हर साल कर संग्रह का रिकॉर्ड टूटने का ढोल क्यों पीटा जाता है?

टैक्सजस्टिस के बिना खोखला है ‘आर्थिक महाशक्ति’ का दावा

यदि सरकार वास्तव में भारत को एक विकसित राष्ट्र और आर्थिक महाशक्ति बनाना चाहती है, तो उसे यह समझना होगा कि आर्थिक प्रगति का मतलब सिर्फ टैक्स कलेक्शन के आंकड़ों को बढ़ाना नहीं होता। दुनिया के जिन विकसित देशों (जैसे नॉर्डिक देश या यूरोपीय संघ) में नागरिक 30 से 40 प्रतिशत टैक्स देते हैं, वहां सरकारें उन्हें मुफ्त विश्वस्तरीय शिक्षा, मुफ्त इलाज, सामाजिक सुरक्षा, स्वच्छ हवा और बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन की गारंटी देती हैं।

भारत में स्थिति इसके ठीक उलट है यहाँ नागरिक ‘यूरोपीय स्तर का टैक्स’ भरता है और बदले में उसे ‘तृतीय विश्व जैसी बुनियादी सुविधाएं’ मिलती हैं।

यदि सरकार ने अपनी दमनकारी कर-वसूली नीति पर लगाम नहीं लगाई और करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल जनता के जीवन स्तर को सुधारने में नहीं किया, तो यह केवल आर्थिक अन्याय ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ एक बड़ा विश्वासघात होगा। करदाता कोई दुधारू गाय या अपराधी नहीं है; वह इस देश का असली निर्माता है। उसे डराने-धमकाने के बजाय सम्मान और बुनियादी नागरिक सुविधाएं देना सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।

nirbhik india WhatsApp channel for update and newspaper cutting
NIRBHIK-INDIA-WHATSAPP-CHANNEL (2)
निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु लगभग 250 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।
nirbhik india portal logo

निर्भीक इंडिया केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उन मूल्यों का पुनर्जन्म है जो सदियों पुराने हैं। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) द्वारा पंजीकृत, हमारे सफर की औपचारिक शुरुआत जून 2023 में हुई। तकनीकी रूप से हम अभी नए हैं, लेकिन हमारी वैचारिक जड़ें अत्यंत गहरी और समृद्ध हैं।

हम उस पत्रकारिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं जिसका लिखित इतिहास 244 साल पुराना है। हम उस निर्भीकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के माध्यम से सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। हमारा उद्देश्य आज के दौर में उसी स्पष्टवादिता और साहस को जीवित रखना है। हम सिर्फ खबरें नहीं पहुँचाते, बल्कि समाज के सामने सच का आईना रखते हैं।

आइए, निर्भीक पत्रकारिता के इस अभियान में हमारे साथ जुड़ें और एक जागरूक भारत के निर्माण में सहभागी बनें।
———————————————————————————————————————–
Nirbhik India is a registered newspaper with the Registrar of Newspapers for India (RNI), officially embarking on its journey in June 2023. While we may be “young” in terms of our registration date, the spirit of journalism we represent is centuries old.

We carry forward a 244-year-old legacy of fearless reporting—a tradition that empowered visionaries like Raja Ram Mohan Roy to challenge deep-rooted social evils like Sati and child marriage. Even as a new entrant in the digital and print space, our commitment remains rooted in that same historic courage.

We don’t just report the news; we uphold the truth without fear or favor. Join us in this mission to revive authentic journalism. Be a part of our journey as we strive to keep the flame of truth burning bright in modern India.

Connect with us and support the voice of integrity.

NirbhikIndia9527

निर्भीक इंडिया केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उन मूल्यों का पुनर्जन्म है जो सदियों पुराने हैं। भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) द्वारा पंजीकृत, हमारे सफर की औपचारिक शुरुआत जून 2023 में हुई। तकनीकी रूप से हम अभी नए हैं, लेकिन हमारी वैचारिक जड़ें अत्यंत गहरी और समृद्ध हैं। हम उस पत्रकारिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं जिसका लिखित इतिहास 244 साल पुराना है। हम उस निर्भीकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के माध्यम से सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। हमारा उद्देश्य आज के दौर में उसी स्पष्टवादिता और साहस को जीवित रखना है। हम सिर्फ खबरें नहीं पहुँचाते, बल्कि समाज के सामने सच का आईना रखते हैं। आइए, निर्भीक पत्रकारिता के इस अभियान में हमारे साथ जुड़ें और एक जागरूक भारत के निर्माण में सहभागी बनें। ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- Nirbhik India is a registered newspaper with the Registrar of Newspapers for India (RNI), officially embarking on its journey in June 2023. While we may be "young" in terms of our registration date, the spirit of journalism we represent is centuries old. We carry forward a 244-year-old legacy of fearless reporting—a tradition that empowered visionaries like Raja Ram Mohan Roy to challenge deep-rooted social evils like Sati and child marriage. Even as a new entrant in the digital and print space, our commitment remains rooted in that same historic courage. We don't just report the news; we uphold the truth without fear or favor. Join us in this mission to revive authentic journalism. Be a part of our journey as we strive to keep the flame of truth burning bright in modern India. Connect with us and support the voice of integrity.

Discover more from NIRBHIK INDIA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading