संविधान सभा का विमर्श व प्रेस की संवैधानिक विवशता
प्रस्तावना- वर्ष 1948 में जब स्वतंत्र भारत का संविधान अपने अंतिम स्वरूप की ओर अग्रसर था, तब संविधान सभा के
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Read Moreप्रस्तावना- भारत में डिजिटल क्रांति ने सूचना के लोकतंत्रीकरण के द्वार तो खोले हैं, परंतु इसके साथ ही पत्रकारिता के
Read Moreप्रस्तवाना- वर्तमान डिजिटल युग में एक अत्यंत भ्रामक और घातक धारणा ने हमारे समाज में गहरी जड़ें जमा ली हैं।
Read Moreप्रस्तावना- लोकतांत्रिक विमर्श में मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका सदैव एक प्रकाश-स्तंभ के समान रही है। यह वह महत्वपूर्ण स्तंभ
Read Moreप्रस्तावना- पत्रकारिता केवल सूचनाओं का द्रुत गति से प्रसारण नहीं, अपितु समाज का दर्पण और लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ है।
Read Moreप्रस्तावना- भारतीय टेलीविज़न पत्रकारिता आज एक ऐसे अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ी है, जहाँ उसके समक्ष दो स्पष्ट
Read Moreप्रस्तावना- विगत कुछ समय पूर्व तक भारतीय पत्रकारिता के विमर्श में खोजी पत्रकारिता को लोकतंत्र और राष्ट्र के एक अत्यंत
Read Moreप्रस्तावना- पत्रकारिता के अनेक रूपों और विधाओं में यदि कोई एक विधा ऐसी है जो केवल सूचनाओं का संप्रेषण नहीं
Read Moreप्रस्तावना- लोकतंत्र की सुदृढ़ इमारत की नींव ईमानदारी और शुचिता पर टिकी होती है, परंतु वर्तमान समय में भ्रष्टाचार एक
Read Moreप्रस्तावना- जब भी हम ‘मीडिया’ या ‘पत्रकारिता’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मानस पटल पर स्वतः ही देश की राजधानी
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