विवेचना स्तम्भ

जनसंचार (Mass Communication) पर अफ़सरशाही प्रवचन

प्रस्तावना- आईआईटी की कोडिंग और अर्थशास्त्र के सूखे समीकरणों से निकलकर जब कोई शीर्ष नौकरशाह जनसंचार (Mass Communication) के सिद्धांतों और ज़मीनी नैतिकता पर उपदेश देने लगे, तो समझ लीजिए कि भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब सचिवालय की वातानुकूलित फाइलों से संचालित होने की कगार पर है।

ज्ञान इंजीनियरिंग का और उपदेश जनसंचार (Mass Communication)
जनसंचार (Mass Communication) पर अफ़सरशाही प्रवचन

भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के दीक्षांत समारोह ने एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर किया है कि इस देश में पत्रकारिता की एबीसीडी जाने बिना भी मीडिया का सबसे बड़ा नीति-निर्माता और मार्गदर्शक बना जा सकता है।

ज्ञान इंजीनियरिंग का और उपदेश जनसंचार (Mass Communication)

भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में भारतीय सूचना सेवा (IIS) के ग्रुप ‘ए’ के 2009, 2023 और 2024 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों का पाठ्य समापन और दीक्षांत समारोह संपन्न हुआ। इस औपचारिक जलसे में मुख्य वक्ता के रूप में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण सचिव चंचल कुमार ने प्रशिक्षुओं को संबोधित किया।

उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि जनसंचार सुशासन का एक अपरिहार्य हिस्सा है, जिसे तकनीक और बदलते प्लेटफॉर्म्स के साथ कदमताल करना चाहिए। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डीपफेक, ऑडियो-विजुअल छेड़छाड़ और सिंथेटिक कंटेंट को संचार तंत्र के लिए नई चुनौती बताया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सूचना त्वरित होनी चाहिए, लेकिन उसकी कीमत सटीकता और विश्वसनीयता गंवाकर नहीं चुकाई जा सकती।

सचिव महोदय ने अपने संबोधन में यह भी जोड़ा कि जनसंचार को एकतरफा लाउडस्पीकर बनने के बजाय ‘दोतरफा संवाद’ होना चाहिए, जहाँ आम जनता की प्रतिक्रिया (Feedback) नीतियों के क्रियान्वयन को बेहतर बना सके। उन्होंने युवा अधिकारियों को प्रशासनिक सलाह दी कि वे हमेशा खुद से यह सवाल पूछें कि उनका काम समाज के सबसे निर्धन और वंचित व्यक्ति की मदद कर रहा है या नहीं।

अब यह सोचना पड़ेगा की क्या आईआईएमसी के दीक्षांत समारोह में सूचना अधिकारियों को जनसंचार का अदम ज्ञान लेकर समझ रहे थे, या पत्रकारों को जनसंचार पर लेक्चर देने से बेहतर होता की कहते भारत की प्रसारण मंत्रालय कैसे देश में पत्रकारिता को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे है। यह सूचना अधिकारी जो मानद उपाधि पा रहे है उनका काम क्या है? सूचना निर्देशक बनना तो यह जनता से कैसे जुड़ रहे है यह लेक्चर का ना तो सर है ना पैर और संचार वैज्ञानिक मार्शल मैकलुहान तो अपने कब्र में तड़प रहे होंगे और पुछ रहे होंगे आखिर कहना क्या चाहते हो?

यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो उन्हें अपनी रणनीति नए सिरे से तय करनी चाहिए। इस कार्यक्रम में आईआईएमसी की कुलपति डॉ. प्रज्ञा पालीवाल गौड़, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अपर सचिव श्री प्रभात, संयुक्त सचिव श्री के.के. निराला, प्रशिक्षण महानिदेशक श्री एल. मधु नाग सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

कोडिंग की स्क्रीन, अर्थशास्त्र की डिग्री और जनसंचार (Mass Communication) का मुफ़्त ज्ञान

समारोह के मंच पर जो दृश्य था, वह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे बड़े विरोधाभास का साक्षात उदाहरण था। जो व्यक्ति देश के भावी सूचना प्रबंधकों और संचार विशेषज्ञों को यह सिखा रहा था कि समाज की नब्ज़ कैसे पकड़ी जाती है, उनका अपना पूरा जीवन बाइनरी कोड्स और सरकारी दफ्तरों के घेरे में बीता है।

श्री चंचल कुमार 1992 बैच के बिहार कैडर के एक बेहद प्रभावशाली और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। उनके बायोडाटा की चमक किसी को भी चौंधिया सकती है आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में बी.टेक, वहीं से एम.टेक, और उसके बाद पटना यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र (Economics) में डॉक्टरेट (Ph.D)। इसके साथ ही वे अंग्रेजी, हिंदी और मैथिली पर भी प्रशासनिक पकड़ रखते हैं।

परंतु सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या सी++ (C++), जावा की कोडिंग, एल्गोरिद्म और अर्थशास्त्र के सूचकांकों को रट लेने से कोई व्यक्ति जनसंचार (Mass Communication) का मर्मज्ञ बन जाता है? जिस व्यक्ति ने अपने पूरे जीवन में न कभी किसी ज़मीनी रिपोर्टिंग की धूल फांकी हो, न कभी किसी सच को सामने लाने के लिए सत्ता की तरेरी हुई आँखें देखी हों, न प्रेस क्लब की बहसों में पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों पर संघर्ष किया हो, वह व्यक्ति उन लोगों को पत्रकारिता और जनसंचार की शुचिता सिखा रहा है जिन्होंने इस विधा में अपना करियर समर्पित किया है।

यह ठीक वैसा ही हास्यास्पद दृश्य है जैसे कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर किसी अनुभवी न्यूरोसर्जन के हाथ से छुरी लेकर उसे यह समझाने लगे कि मस्तिष्क का ऑपरेशन कैसे किया जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा का यह ‘सर्वज्ञानी सिंड्रोम’ सदियों पुराना है, जहाँ यह मान लिया जाता है कि लालबत्ती की गाड़ी में बैठते ही व्यक्ति दुनिया के हर हुनर का उस्ताद हो जाता है।

बाइनरी कोड्स (0 और 1) से मानवीय संवेदनाएं तलाशने की अफ़सरशाही ज़िद

सूचना एवं प्रसारण सचिव ने अपने भाषण में उभरती प्रौद्योगिकियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक पर लंबा आख्यान दिया। कंप्यूटर साइंस के इंजीनियर होने के नाते उनका यह तकनीकी मोह समझ आता है। उनके लिए जनसंचार शायद डेटा पैकेट्स, क्लाउड सर्वर, ट्रैफिक इनसाइट्स और सोशल मीडिया एनालिटिक्स से ज़्यादा कुछ नहीं है।

लेकिन वे यह बुनियादी बात भूल जाते हैं कि जनसंचार (Mass Communication) कोई सॉफ्टवेयर प्रोग्राम नहीं है जिसे कुछ कोड लिखकर ‘डीबग’ कर दिया जाए। यह रक्त-मांस के इंसानों, उनकी अनसुनी चीखों, सामाजिक विषमताओं और सत्ता के दमन के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों का आईना है।

जब एक इंजीनियर और अर्थशास्त्री की आँखें मीडिया को देखती हैं, तो उन्हें हर समस्या का समाधान किसी एल्गोरिद्म में या किसी नए सेंसरशिप नियम में नज़र आता है। फेक न्यूज़ और भ्रामक सूचनाओं की समस्या महज़ एक तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आम जनता के घटते भरोसे और गोदी चारण-संस्कृति की देन है।

क्या कभी किसी फ़ाइल-पुशिंग अफ़सर ने यह समझने की कोशिश की कि जब मुख्यधारा की मीडिया से आम जनता का भरोसा उठता है, तभी अफ़वाहें बाज़ार में सच बनकर बिकती हैं? जब तक आप पत्रकारिता को केवल ‘इंजीनियरिंग का आउटपुट’ और जनता को केवल ‘कंज्यूमर डेटा’ मानते रहेंगे, तब तक आपकी तमाम तकनीकी नसीहतें किसी काम की साबित नहीं होंगी।

‘अंतिम व्यक्ति’ का वातानुकूलित विमर्श: पीआर (PR) को संचार बताने का स्वांग

सचिव महोदय ने प्रशिक्षु अधिकारियों को महात्मा गांधी के ‘अंतिम व्यक्ति’ वाले ताबीज़ की याद दिलाई और कहा कि उनका काम सबसे गरीब आदमी के काम आना चाहिए। यह नसीहत शास्त्री भवन के चमचमाते गलियारों और लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से सुनने में जितनी कर्णप्रिय लगती है, धरातल पर उतनी ही पाखंडी नज़र आती है। सच्चाई यह है कि जिस मंत्रालय की कमान उनके हाथों में है, उसका समूचा तंत्र आज़ादी के बाद से आज तक केवल एकतरफा शासकीय प्रोपेगैंडा और प्रचार (PR) की मशीन बनकर रह गया है।

क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि जो व्यवस्था खुद जनता के विरोध-प्रदर्शनों, असहमति के स्वरों और कड़वे सवालों को दबाने के लिए जानी जाती है, उसके शीर्ष मुखिया मंच से “दोतरफा संचार और फीडबैक” की वकालत कर रहे हैं? सरकारी सूचना तंत्र में ‘दोतरफा संवाद’ का अर्थ केवल वही फीडबैक स्वीकार करना होता है जो सत्ता के माथे पर शिकन न लाए।

अगर कोई प्रशिक्षु अधिकारी ज़मीन से यह सच्ची रिपोर्ट भेज दे कि अमुक सरकारी योजना से ग़रीबों का कोई भला नहीं हो रहा, तो क्या यह नौकरशाही उस अधिकारी की पीठ थपथपाएगी? जवाब हम सभी जानते हैं उस अधिकारी की फाइल पर प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज कर दी जाएगी। जब आपका समूचा ढांचा ही चाटुकारिता और विज्ञापन बांटने के तंत्र पर खड़ा है, तो दीक्षांत समारोह के मंच से जनसेवा और पारदर्शिता की बातें करना केवल एक औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं है।

सूचना सेवा (IIS) की लाचारी: जनसंचार (Mass Communication) पर सामान्यज्ञों का स्थायी कब्ज़ा

इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय शासन व्यवस्था की उस गहरी सड़ांध को भी बेपर्दा किया है, जहाँ विषय विशेषज्ञ (Specialist) को हमेशा एक सामान्यज्ञ (Generalist) आईएएस के जूतों के नीचे दबाकर रखा जाता है। यूपीएससी की परीक्षा पास करके भारतीय सूचना सेवा (IIS) में आने वाले अधिकारी जनसंचार, मीडिया प्रबंधन और पत्रकारिता की तकनीक में पारंगत होते हैं।

वे ज़मीनी मीडिया की चुनौतियों से जूझते हैं, लेकिन उनके सिर पर लाद दिया जाता है एक ऐसा व्यक्ति जिसकी पूरी योग्यता यह है कि उसने तीन दशक पहले एक परीक्षा पास की थी और कुछ ज़िलों में कलेक्टरी की थी।

सवाल यह उठता है कि क्या किसी जनसंचार के विशेषज्ञ या वरिष्ठ पत्रकार को कभी इसरो (ISRO) का चेयरमैन या वित्त मंत्रालय का मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया जा सकता है? यदि नहीं, तो फिर कंप्यूटर साइंस और अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को देश के सूचना और प्रसारण मंत्रालय का सर्वेसर्वा क्यों बना दिया जाता है?

यह भारतीय जनसंचार (Mass Communication) का दुर्भाग्य है कि उसकी नीतियां वे लोग बना रहे हैं जिन्हें प्रेस की आज़ादी, संपादकीय स्वायत्तता और खोजी पत्रकारिता के जोखिमों का रत्ती भर भी अहसास नहीं है। उनके लिए सूचना केवल एक कमोडिटी है, जिसे सुबह प्रेस विज्ञप्ति के रूप में जारी करना है और शाम को टीवी चैनलों पर हेडलाइन के रूप में मैनेज करना है।

निष्कर्ष और आगे की राह (Way Forward)

यदि देश में सूचना तंत्र को सचमुच पारदर्शी, आधुनिक और जनहितैषी बनाना है, तो अफ़सरशाही के इस खोखले उपदेश-राज को तत्काल बंद करना होगा। जनसंचार कोई प्रशासनिक नियम-पुस्तिका नहीं है, जिसे दंड और आदेश के दम पर चलाया जाए। नीति-निर्माताओं को निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • विशेषज्ञता का सम्मान: सूचना और प्रसारण मंत्रालय के शीर्ष नीतिगत पदों पर प्रशासनिक सामान्यज्ञों (Generalist IAS) के एकाधिकार को समाप्त कर मीडिया, डिजिटल संचार और समाजशास्त्र के वास्तविक जानकारों को कमान सौंपी जाए।
  • सरकारी पीआर और पत्रकारिता की सीमा रेखा: शासन को यह स्वीकार करना होगा कि जनसंचार का उद्देश्य सत्ता की छवि चमकाना नहीं, बल्कि जनता और तंत्र के बीच बिना लाग-लपेट के सत्य का आदान-प्रदान करना है।
  • आईआईएमसी की शैक्षणिक स्वायत्तता: जनसंचार के शीर्ष संस्थानों को नौकरशाही के भाषणों का लाउडस्पीकर बनाने के बजाय स्वतंत्र, निर्भीक और आलोचनात्मक सोच की नर्सरी के रूप में काम करने की पूरी आज़ादी दी जानी चाहिए।

जब तक गैर-पत्रकार और सत्ता के गलियारों में पले-बढ़े टेक्नोक्रेट्स जनसंचार (Mass Communication) की आत्मा को डिक्टेट करते रहेंगे, तब तक विश्वसनीयता का संकट कभी हल नहीं होगा। अफ़सरों को चाहिए कि वे कोडिंग और फाइलों का प्रबंधन अपने पास रखें, और पत्रकारिता को उन लोगों के विवेक पर छोड़ दें जो इसके लिए धूप, धूल और जोखिम उठाने का साहस रखते हैं।

लेखक – नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics. A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on "the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown". Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days. ---------------------------------------------------------------------------------- नवनीत मिश्रा वर्तमान में 'निर्भीक इंडिया' मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। 'आदर्श जीवन' दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और 'अमर उजाला' गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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