प्रस्तावना – वर्ष 1948 में जब स्वतंत्र भारत का संविधान अपने अंतिम स्वरूप की ओर अग्रसर था, तब संविधान सभा के केंद्रीय कक्ष और बंद कमरों में स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक संरचना पर ऐतिहासिक बहस चल रही थी। इस गहन चिंतन का एक अत्यंत संवेदनशील विषय यह था कि लोकतांत्रिक भारत में ‘प्रेस’ की भूमिका और उसके अधिकार क्या होंगे।

क्या भारतीय पत्रकारिता को अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन की भांति कोई पृथक और अभेद्य सुरक्षा चक्र दिया जाना चाहिए? इसी गंभीर विमर्श के मध्य संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एक ऐसा तर्क प्रस्तुत किया, जिसने आने वाले दशकों के लिए भारतीय पत्रकारिता की नियति और सीमाओं का निर्धारण कर दिया।
संविधान सभा व बी आर अंबेडकर की दूरदर्शिता की कमी कैसे थी समझिए
‘निर्भीक इंडिया’ का यह सुदृढ़ मत है कि डॉ. आंबेडकर का वह निर्णय सिद्धांत रूप में समानता के आदर्श पर आधारित था, किंतु व्यावहारिक धरातल पर उसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बिना किसी संवैधानिक सुरक्षा कवच के छोड़ दिया और इस आधार पर संविधान सभा और बी आर अंबेडकर दूरदर्शिता की कमी और कदाचार और भष्ट्राचार का ना सिर्फ मार्ग छोड़ा गया भारत को लोकतान्त्रिक तौर पर भी कमजोर बनाया गया जिसमे जनता पिसती रहे और प्रेस मुकदर्शक बनकर रह जाए।
“प्रेस के पास ऐसा कोई विशेष अधिकार नहीं है जो किसी आम नागरिक को न दिया गया हो। संपादक या पत्रकार भी इस देश का एक नागरिक ही है, और जब वह अपने समाचार पत्र के माध्यम से लिखता है, तो वह केवल अपनी अभिव्यक्ति के सामान्य अधिकार का प्रयोग कर रहा होता है।” — डॉ. भीमराव आंबेडकर (संविधान सभा विमर्श, 1948)
अगर आज भारत में प्रेस को सुरक्षा होती और प्रेस अपने जरूरत की जानकारी पाने का अधिकार रखता और इसके लिए उसको विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अड़ंगा नहीं रहता तो यह सभी जवाबदेह होते है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने के लिए अनशन नहीं करना पड़ता। दिल्ली पुलिस की गुंडागर्दी नहीं चलती यह सब जवाब देह होते प्रेस परिषद को दंड देने का अधिकार होता। प्रधानमंत्री से लेकर सीजेआई तक को यह डर रहता की प्रेस हमे खा जाएगी। यह सब चीज की समझ बी आर अंबेडकर को नहीं थी। साथ ही साथ यह नही जानकारी नहीं थी की लोकतन्त्र का तीन नहीं चार स्तम्भ होते है।
संविधान सभा का गठन, संविधान सभा व बी आर अंबेडकर एतिहासिक भूल
जिस संविधान सभा में प्रेस के अधिकारों का यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया, उसका अपना एक व्यवस्थित ऐतिहासिक और संवैधानिक घटनाक्रम रहा है। भारतीय नागरिक प्रायः गूगल और विभिन्न शोध माध्यमों में संविधान सभा की स्थापना, बैठकों और सदस्य संख्या से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजते हैं। इन ऐतिहासिक तथ्यों का निष्पक्ष अवलोकन निम्नवत् है:
इन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बैठकों के माध्यम से जिस महान संविधान का निर्माण हुआ, उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तो स्थान मिला, परंतु प्रेस की संस्थागत विशिष्टता को अस्वीकार कर दिया गया।
- [कैबिनेट मिशन (1946)] ➔ [पहली बैठक (9 दिसं 1946, 207 सदस्य)] ➔ [प्रेस विमर्श (1948, डॉ. आंबेडकर तर्क)] ➔ [अनुच्छेद 19(1)(क) में सीमित अधिकार]
| संवैधानिक चरण / घटना | तिथि / विवरण | मुख्य ऐतिहासिक संदर्भ |
| संविधान सभा का गठन | जुलाई-नवंबर 1946 | कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत अप्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा गठन। |
| संविधान सभा की औपचारिक स्थापना | 6 दिसंबर 1946 | संविधान निर्माण हेतु प्रांतीय सभाओं द्वारा प्रतिनिधियों का चयन। |
| संविधान सभा में कुल सदस्य | 389 (प्रारंभिक संख्या) | भारत के विभाजन के पश्चात यह संख्या घटकर 299 रह गई। |
| संविधान सभा की पहली बैठक | 9 दिसंबर 1946 | नई दिल्ली स्थित काउंसिल चैंबर के पुस्तकालय भवन में आयोजित। |
| पहली बैठक में उपस्थित सदस्य | 207 सदस्य | मुस्लिम लीग द्वारा बहिष्कार के कारण केवल 207 सदस्यों ने भाग लिया। |
| संविधान सभा की तीसरी बैठक | 13 दिसंबर 1946 | पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा ऐतिहासिक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ प्रस्तुत। |
| संविधान सभा की अंतिम बैठक | 24 जनवरी 1950 | सदस्यों द्वारा संविधान पर हस्ताक्षर एवं राष्ट्रगान/राष्ट्रगीत की स्वीकृति। |
संविधान सभा व बी आर अंबेडकर प्रेस को ‘सामान्य नागरिक’ मानने की ना समझी
संविधान सभा ने पृथक प्रेस स्वतंत्रता के स्थान पर इसे संविधान के भाग-3 के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(क) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) की सामान्य परिधि में समाहित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, और मानहानि के नाम पर लगाए जाने वाले सभी ‘युक्तियुक्त निर्बंधन’ (Reasonable Restrictions) स्वतः ही प्रेस पर भी लागू हो गए।
बाबासाहेब का दृष्टिकोण एक समान नागरिक अधिकारों की समतावादी अवधारणा से प्रेरित था। वे किसी भी संस्था को नागरिक से ऊपर विशेषाधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। परंतु इस सैद्धांतिक समरूपता ने प्रेस के उस विशिष्ट दायित्व की उपेक्षा कर दी, जो सामान्य नागरिक के अधिकारों से सर्वथा भिन्न है।
उदाहरण से समझे, जब आप के इलाके में सड़क बनती है या यह मान लीजिये, कि पुणे गोवा राष्ट्रीय राजमार्ग बना और ऐसे ही कई राजमार्ग बने जो हाल में ही मानसूनी बारिश को बर्दाश्त नहीं कर पाये। अब तो जनता काही रही है कि एनएचएआई और सड़क एवं परिवहन मंत्रालय चोर है। जनता के गाढ़ी कमाई के कर के पैसे से ऐसे रोड बना रहे जो ठिक भी नहीं रहा है। सोशल मीडिया भरी परी है गालियों और आरोपो से वो आज जनता है जो कुछ भी लिख रही है
जब प्रेस लिखेगा तो वो टेंडर के कागज माँगेगा जो अभी के समय में पीएम मोदी द्वारा आरटीआई को कमजोर करने के बाद संभवत नही मिलेगा। वो खोजी पत्रकारिता करने जाएगा। जिस पर पहले से बैठे पुलिस रूपी गुंडे काम नहीं करने देंगे तब जाकर एक रिपोर्ट पब्लिश होगा।
यह है प्रेस और आम जनता के बोलने और लिखने में अंतर। जो बी आर अंबेडकर नहीं समझ पाये। ऐसा नहीं था कि पूरी संविधान सभा भ्रष्ट थी। निर्भीक इंडिया आप को उन लोगो के नाम आगामी संपादकीय में बताएँगे जिन्होंने बी आर अंबेडकर को समझने कि कोशिस कि थी लेकिन जब काल देश पर छाता पहले विवेक मर जाता है।
प्रेस की संस्थागत विवशता और सत्ता का प्रशासनिक नियंत्रण
एक आम नागरिक की अभिव्यक्ति और संस्थागत पत्रकारिता के कार्य-चरित्र में मौलिक अंतर होता है। इसे एक प्रत्यक्ष व्यावहारिक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
मान लीजिए कि राज्य सरकार प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार और संगठित अपराध को उजागर करने हेतु एक विशेष जांच आयोग का गठन करती है। परंतु जब उस आयोग को अधिकार और शक्तियां देने की बात आती है, तो सरकार यह तर्क दे कि “आपको अलग से कोई विशेष सुरक्षा, समन भेजने या तलाशी लेने का अधिकार नहीं मिलेगा; जो अधिकार सड़क पर चलते एक आम नागरिक को प्राप्त हैं, आप भी उन्हीं के परिधि में रहकर कार्य कीजिए।” ऐसी स्थिति में क्या वह जांच आयोग कभी किसी शक्तिशाली मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी या भू-माफिया पर हाथ डाल पाएगा? बिल्कुल नहीं।
ठीक यही विवशता और लाचारी भारतीय प्रेस के साथ खड़ी कर दी गई। एक साधारण नागरिक अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त करता है, जिससे सत्ता प्रतिष्ठान की चूलें नहीं हिलतीं। इसके विपरीत, पत्रकारिता का मूल धर्म ही सत्ता की निगरानी करना और व्यवस्था की खामियों को सार्वजनिक करना है।

समाज और लोकतंत्र पर संवैधानिक अभाव के प्रभाव
- प्रेस को ‘सामान्य नागरिक’ की श्रेणी में रखने के कारण भारतीय पत्रकारिता को कई दूरगामी और गंभीर दुष्परिणामों का सामना करना पड़ा है:
- स्रोतों की गोपनीयता का संकट (Source Confidentiality): विशेष संवैधानिक संरक्षण न होने के कारण खोजी पत्रकारों को अपने गुप्त सूत्रों की पहचान उजागर करने के लिए प्रशासनिक व कानूनी रूप से विवश किया जाता रहा है।
- मानहानि कानूनों का दंडात्मक अस्त्र: आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग करके कॉरपोरेट घरानों और राजनेताओं ने निर्भीक पत्रकारों को न्यायालयों के चक्कर में उलझाया है।
- आपातकाल (1975) का काला अध्याय: आपातकाल के दौरान जब मीडिया पर सेंसरशिप थोपी गई, तब किसी विशिष्ट संवैधानिक सुरक्षा कवच के अभाव में समाचार पत्र घुटने टेकने पर मजबूर हो गए।
- आर्थिक और प्रशासनिक उत्पीड़न: स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता करने वाले संस्थानों पर मानहानि के मुकदमों, पुलिस पूछताछ और प्रशासनिक कड़ाई के माध्यम से निरंतर दबाव बनाया जाता है।
प्रेस की स्वतंत्रता की बहाली हेतु व्यावहारिक सुझाव
- ‘निर्भीक इंडिया’ का यह सुदृढ़ दृष्टिकोण है कि यदि भारत में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता को पुनर्जीवित करना है, तो निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने अत्यंत आवश्यक हैं:
- स्पष्ट संवैधानिक संशोधन: संविधान के अनुच्छेद 19 में संशोधन करके प्रेस की स्वतंत्रता को एक पृथक और विशिष्ट संस्थागत अधिकार के रूप में स्पष्ट स्थान दिया जाना चाहिए।
- पत्रकारिता स्रोत संरक्षण अधिनियम: पत्रकारों को उनके सूचना स्रोतों की गोपनीयता बनाए रखने का अभेद्य कानूनी अधिकार प्रदान किया जाए, ताकि खोजी पत्रकारिता को बल मिल सके।
- अपराधिक मानहानि का विलोपन: पत्रकारों के विरुद्ध प्रयुक्त होने वाली आपराधिक मानहानि को समाप्त कर इसे केवल दीवानी (Civil) मामलों तक सीमित किया जाए।
- स्वतंत्र नियामक संस्था का गठन: मीडिया पर पुलिस और कार्यपालिका के अनुचित हस्तक्षेप को रोकने के लिए एक न्यायिक शक्तियों से युक्त स्वतंत्र निकाय की स्थापना की जाए।
निष्कर्ष
संविधान सभा के उस बंद कमरे में डॉ. आंबेडकर का तर्क एक आदर्शवादी और समतावादी समाज की संकल्पना पर आधारित था। किंतु वे सत्ता के उस दमनकारी चरित्र का पूर्ण आकलन करने में चूक गए जो सदैव आलोचना से भयभीत रहती है। प्रेस को विशेष संवैधानिक दर्जा न देना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बिना छत के खुले आकाश के नीचे छोड़ देने जैसा था।
आज जब कॉरपोरेट और राजनीतिक दबावों के कारण पत्रकारिता का दम घुट रहा है, तब 1948 का वह निर्णय एक ऐसी ऐतिहासिक चूक की भांति खटकता है जिसने ‘आज़ादी के सिपाही’ को कानून की बेड़ियों में जकड़ा हुआ एक लाचार नागरिक बना दिया। लोकतंत्र की रक्षा हेतु समय की मांग है कि हम इस संवैधानिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करें और प्रेस को वह सुरक्षा कवच प्रदान करें जिसके बिना एक पारदर्शी समाज की कल्पना असंभव है।
निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 245 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।

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