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खुदरा महंगाई (Retail Inflation): रसोई का सच

प्रस्तावना- सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) के अनुसार अगस्त 2026 में देश की खुदरा महंगाई (Retail Inflation) बढ़कर 4.82 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

खुदरा महंगाई (Retail Inflation) की पृष्ठभूमि और आंकड़े (Research Data & Background)
खुदरा महंगाई (Retail Inflation) रसोई का सच

पहली नजर में यह आंकड़ा सामान्य सांख्यिकी लग सकता है, लेकिन जब आप बाजार में थैला लेकर निकलते हैं, तो समझ आता है कि 4.82 प्रतिशत का यह गणित आम परिवार के मासिक बजट और गृहणियों की रसोई की थाली को भीतर से कितना प्रभावित कर रहा है।

खुदरा महंगाई (Retail Inflation) की पृष्ठभूमि और आंकड़े (Research Data & Background)

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा 14 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में महंगाई का दबाव लगातार तीसरे महीने बढ़ा है। मई 2026 में जहां वार्षिक खुदरा महंगाई दर 3.93 प्रतिशत पर थी, वहीं जून में यह 4.38 प्रतिशत, जुलाई में 4.45 प्रतिशत और अब अगस्त 2026 में उछलकर 4.82 प्रतिशत (अनंतिम) पर दर्ज की गई है।

इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा हाथ खाने-पीने की चीजों का है। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (Consumer Food Price Index – CFPI) पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) अगस्त 2026 में सालाना आधार पर 5.95 प्रतिशत रही, जो जुलाई 2026 के 5.52 प्रतिशत से उल्लेखनीय रूप से अधिक है

सूचकांक एवं घटक (CPI Component)जुलाई 2026 (अंतिम)अगस्त 2026 (अनंतिम)महीने-दर-महीने बदलाव
अखिल भारतीय संयुक्त महंगाई (Combined CPI)4.45%4.82%+0.37% (तेजी)
ग्रामीण खुदरा महंगाई (Rural Inflation)4.84%5.23%+0.39% (तेजी)
शहरी खुदरा महंगाई (Urban Inflation)3.96%4.31%+0.35% (तेजी)
अखिल भारतीय खाद्य महंगाई (Food Inflation – CFPI)5.52%5.95%+0.43% (तेजी)
ग्रामीण खाद्य महंगाई (Rural Food Inflation)5.79%6.13%+0.34% (तेजी)
शहरी खाद्य महंगाई (Urban Food Inflation)5.05%5.64%+0.59% (तेजी)

खुदरा महंगाई (Retail Inflation) : नया आधार वर्ष 2024=100 क्या है?

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह सूचकांक अब आधार वर्ष 2024=100 (Base Year 2024) के आधार पर संकलित किया गया है

साधारण उदाहरण से समझें:

मान लीजिए सरकार ने 2024 में एक काल्पनिक ‘राशन का झोला’ तैयार किया, जिसमें देश के औसत परिवार द्वारा इस्तेमाल होने वाले 300 से अधिक जरूरी सामान (आलू, आटा, दाल, दूध, मोबाइल रिचार्ज, बस किराया आदि) रखे गए और उसकी कुल कीमत ₹100 मान ली गई

अगस्त 2025 में उसी झोले की कीमत बढ़कर ₹103.74 हुई थी। आज अगस्त 2026 में उसी झोले का राष्ट्रीय संयुक्त सूचकांक बढ़कर 108.74 हो गया है। यानी जो सामान 2024 में ₹100 का था, उसी टोकरी को खरीदने के लिए आज देश के औसत नागरिक को ₹108 और 74 पैसे चुकाने पड़ रहे हैं

वर्ष 2026 के शुरुआती आठ महीनों की यात्रा देखें तो सूचकांक लगातार ऊपर चढ़ा है:

  • जनवरी 2026: 2.74%
  • फरवरी 2026: 3.21%
  • मार्च 2026: 3.40%
  • अप्रैल 2026: 3.48%
  • मई 2026: 3.93%
  • जून 2026: 4.38%
  • जुलाई 2026: 4.45%
  • अगस्त 2026: 4.82%

खुदरा महंगाई (Retail Inflation) से सब्जी सस्ती पर तड़का महंगा: थाली का सबसे बड़ा विरोधाभास (The Kitchen Irony)

सरकारी प्रेस नोट में एक बहुत ही आकर्षक तालिका दी गई है, जिसे देखकर कोई भी कह सकता है कि सब्जियां तो बहुत सस्ती हो गई हैं। आंकड़ों के मुताबिक:

  • टमाटर (Tomato): -31.09% (31% से ज्यादा सस्ता हुआ)
  • आलू (Potato): -13.14% (13% से ज्यादा सस्ता हुआ)
  • भिंडी (Ladyfinger): -5.41% सस्ती
  • परवल और कुंदरू (Parwal & Kundru): -3.60% सस्ते

लेकिन इसी प्रेस विज्ञप्ति की दूसरी तालिका को देखिए, जिसे मुख्यधारा की सुर्खियां अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं:

  • अदरक (Ginger): +73.82% महंगा
  • प्याज (Onion): +48.27% महंगा (जुलाई में यह 22.54% था, यानी एक महीने में दोगुना उछाल)
  • लहसुन (Garlic): +43.60% महंगा
रसोई का सामान (Kitchen Item)अगस्त 2026 वार्षिक दर (%)प्रभाव और आम जीवन की स्थिति
टमाटर (Tomato)-31.09%पिछले साल के मुकाबले भाव जमीन पर, आवक बेहतर।
आलू (Potato)-13.14%कोल्ड स्टोरेज से पर्याप्त आपूर्ति, आधार स्थिर।
प्याज (Onion)+48.27%मंडियों में पुरानी फसल खत्म, नई खरीफ आवक में देरी।
लहसुन (Garlic)+43.60%मध्य भारत में उत्पादन प्रभावित, भाव आसमान पर।
अदरक (Ginger)+73.82%सीमित स्टॉक और भारी परिवहन लागत का असर।

रसोई का व्यावहारिक गणित: आलू सस्ता होने पर भी सब्जी महंगी क्यों?

इसे समझने के लिए अर्थशास्त्र की डिग्री की जरूरत नहीं है, बस घर की कड़ाही पर ध्यान दीजिए:

एक व्यावहारिक रसोई का उदाहरण:

मान लीजिए किसी घर में आज आलू-टमाटर की साधारण सब्जी बननी है। गृहिणी ने बाजार से 1 किलो आलू और आधा किलो टमाटर खरीदे। आलू-टमाटर के दाम में पिछले साल के मुकाबले ₹15 की बचत हो गई।

लेकिन उस सब्जी को स्वादिष्ट बनाने के लिए जो ‘तड़का’ चाहिए—यानी 250 ग्राम प्याज, 50 ग्राम लहसुन और 25 ग्राम अदरक—उसके लिए दुकानदार ने पिछले साल के मुकाबले ₹22 अतिरिक्त वसूल लिए

परिणाम: सब्जी की मुख्य सामग्री (आलू-टमाटर) पर ₹15 बचे, लेकिन तड़के पर ₹22 ज्यादा खर्च हो गए। यानी कुल मिलाकर थाली पर ₹7 की सीधी चपत लगी।

यही कारण है कि जब सरकारी बुलेटिन कहता है कि “सब्जियां सस्ती हैं”, तो आम गृहिणी हैरान रह जाती है, क्योंकि बिना प्याज, लहसुन और अदरक के भारतीय रसोई में चूल्हा जलना मुमकिन नहीं है।

गाँव बनाम शहर: गाँव का चूल्हा आखिर ज्यादा क्यों तप रहा है? (Rural vs Urban Divide)

प्रेस विज्ञप्ति का सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू भारत के ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच बढ़ता अंतर है

आंकड़ों के अनुसार:

  • शहरी खुदरा महंगाई (Urban Retail Inflation): 4.31% (खाद्य महंगाई: 5.64%)
  • ग्रामीण खुदरा महंगाई (Rural Retail Inflation): 5.23% (खाद्य महंगाई: 6.13%)

गाँव में महंगाई शहर की तुलना में लगभग एक प्रतिशत (0.92%) अधिक है। यह स्थिति तब है जब खाद्यान्न और सब्जियां गाँव के खेतों में ही पैदा होती हैं।

गाँव पर यह मार इतनी भारी क्यों है?

  • कमाई और खर्च का अनुपात (Engel’s Law):शहर में रहने वाले किसी मध्यमवर्गीय कर्मचारी की महीने की तनख्वाह यदि ₹40,000 है, तो वह अपने खाने-पीने पर अमूमन ₹10,000 से ₹12,000 (लगभग 25-30%) खर्च करता है। बाकी पैसा मकान किराया, बच्चों की स्कूल फीस और बचत में जाता है।इसके विपरीत, गाँव के एक दिहाड़ी मजदूर या सीमांत किसान की यदि महीने की कमाई ₹8,000 है, तो उसका ₹5,000 से ₹5,500 (लगभग 65-70%) केवल पेट भरने और राशन जुटाने में खर्च हो जाता है। जब खाने-पीने की चीजें 6.13% की दर से महंगी होती हैं, तो गाँव के मजदूर के पास दवा या बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे ही नहीं बचते।
  • माल ढुलाई की कमरतोड़ लागत (Freight Transport Shock):प्रेस रिलीज के समूहवार आंकड़ों (Annexure-II) में दर्ज है कि देश में माल परिवहन सेवाओं (Freight Transport Services) की महंगाई दर 14.64 प्रतिशत पर पहुंच गई है! जब फैक्ट्रियों से साबुन, तेल, दवाइयां, कपड़े या पैकेज्ड फूड ट्रकों के जरिए सुदूर देहात तक पहुंचते हैं, तो 14.64% महंगी माल ढुलाई का पूरा बोझ गाँव के छोटे दुकानदार अंतिम उपभोक्ता पर डाल देते हैं। इसलिए गाँव के चौराहे वाली दुकान पर वही सामान शहर के सुपरमार्केट से ज्यादा महंगा बिक रहा है।
  • बिजली और ईंधन का ग्रामीण झटका:ग्रामीण इलाकों में ‘बिजली, गैस और अन्य ईंधन’ (Group 04.5) की महंगाई दर 3.59% रही, जबकि शहरों में यह मात्र 2.31% थी। ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक ईंधन और एलपीजी रिफिलिंग की बढ़ती लागत ने ग्रामीणों का चूल्हा अधिक तपा दिया है।

राज्यों का नक्शा: कहाँ सबसे ज्यादा सुलग रही है महंगाई?

देश के अलग-अलग राज्यों में महंगाई की स्थिति एक जैसी नहीं है। 50 लाख से अधिक आबादी वाले राज्यों में दक्षिण और मध्य भारत पर दबाव सबसे अधिक है:

  • शीर्ष 5 उच्च महंगाई वाले राज्य:
    1. तेलंगाना: 6.27%
    2. तमिलनाडु: 5.92%
    3. मध्य प्रदेश: 5.55%
    4. आंध्र प्रदेश: 5.53%
    5. ओडिशा: 5.52%
  • शीर्ष खाद्य महंगाई वाले राज्य:महाराष्ट्र (8.10%), आंध्र प्रदेश (8.07%), तमिलनाडु (7.96%), कर्नाटक (7.58%) और तेलंगाना (7.33%) में खाने-पीने की चीजों की महंगाई 7 से 8 प्रतिशत के बीच झुलसा रही है।
  • हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों की स्थिति:
    • उत्तर प्रदेश: समग्र महंगाई 5.09% रही (ग्रामीण यूपी में 5.58%, जबकि शहरी यूपी में 4.04%)।
    • बिहार: समग्र महंगाई 4.22% (ग्रामीण 4.28%, शहरी 3.86%)।
    • दिल्ली: देश की राजधानी में खुदरा महंगाई देश में सबसे कम 2.61% दर्ज की गई।

त्योहारों से पहले तिजोरी और पर्स पर दोहरी मार (Festival Budget & Gold-Silver Shock)

अगस्त का महीना बीत चुका है और सितंबर-अक्टूबर के साथ ही देश में गणेशोत्सव, नवरात्रि, करवाचौथ, धनतेरस, दिवाली और उसके बाद शादियों का बड़ा साया शुरू होने वाला है। इस त्योहारी सीजन में हर भारतीय परिवार नए कपड़े, घर का सामान, सोने-चांदी के सिक्के या जेवर खरीदता है और परिवार के साथ बाहर खाना खाने जाता है।

सरकारी रिपोर्ट के दो आंकड़े इस त्योहारी उमंग पर भारी पड़ते दिख रहे हैं:

  • आभूषणों में ऐतिहासिक आग: चांदी 107% और सोना 35% महंगा

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार देश में सबसे ज्यादा महंगाई किसी सब्जी या अनाज में नहीं, बल्कि आभूषणों में दर्ज की गई है:

  • चांदी के आभूषण (Silver Jewellery): 107.11% की वार्षिक वृद्धि! यानी पिछले साल अगस्त में जो चांदी का पायल, बर्तन या सिक्का ₹1,000 का मिल रहा था, आज उसके लिए सीधे ₹2,071 चुकाने पड़ रहे हैं।
  • सोने, हीरे और प्लैटिनम के आभूषण: 35.53% की वार्षिक तेजी।
  • अन्य व्यक्तिगत सामान (Other Personal Effects – Code 13.2): इसमें समग्र रूप से 44.56% की महंगाई दर्ज की गई है।

आम परिवार के बजट पर असर:

धनतेरस पर ₹5,000 का शगुन का चांदी का बर्तन या सिक्का लेने वाले परिवार को अब उसी वजन के लिए ₹10,000 से अधिक खर्च करने पड़ेंगे। मध्यमवर्गीय शादियों में वर-वधू पक्ष के लिए सोने-चांदी के जेवर बनवाना इस बार बजट से 35% से 50% बाहर चला गया है

  • बाहर खाना (Dining Out) और होटल सेवाएं: 8.38% की तेजी

त्योहारों पर लोग बाहर खाना खाने या छुट्टियों में घूमने निकलते हैं।

  • रेस्तरां और आवास सेवाएं (Restaurants and accommodation services): इसमें सालाना 8.38% की वृद्धि हुई है (ग्रामीण 8.55%, शहरी 8.23%)।
  • खाद्य एवं पेय पदार्थ सेवाएं (Code 11.1): 8.41% महंगी हुई हैं।

फैक्ट्री-गेट और थोक स्तर पर वाणिज्यिक रसोई गैस, खाद्य तेल और मसालों की बढ़ती लागत के चलते ढाबों, हलवाई की दुकानों और बड़े रेस्तरांओं ने अपनी थाली के दाम 8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ा दिए हैं

आम आदमी और बाज़ार पर सीधा असर (Policy to Pocket Impact & PAA Insights)

गूगल पर लोग अक्सर यह खोजते हैं कि महंगाई के इन दशमलव वाले आंकड़ों का उनकी बचत, लोन और दिनचर्या पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा। आइए इन सवालों को सीधे वित्तीय विश्लेषक के नजरिए से समझें।

PAA 1: क्या खुदरा महंगाई बढ़ने से भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) लोन ईएमआई (EMI) में कटौती करेगा?

उत्तर: बिल्कुल नहीं, बल्कि सस्ते कर्ज की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया है।

  • आरबीआई का दायरा: भारतीय संसद ने भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) को 4 प्रतिशत की आदर्श खुदरा महंगाई बनाए रखने का लक्ष्य दिया है (जिसमें 2% ऊपर या नीचे की सहनशीलता सीमा है)।
  • मई 2026 में खुदरा महंगाई 3.93% थी, जो 4% के लक्ष्य से नीचे थी। तब बाजार को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट (Repo Rate) में कम से कम 0.25% की कटौती करेगा, जिससे होम लोन और कार लोन की ईएमआई सस्ती हो जाती।
  • लेकिन अगस्त में महंगाई का 4.82% पर पहुंचना और खाद्य महंगाई का 5.95% हो जाना यह सुनिश्चित करता है कि शक्तिकांत दास की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) ब्याज दरों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगी।

जेब पर असर: यदि आपका ₹30 लाख का होम लोन चल रहा है और आप हर महीने ₹26,000 की ईएमआई दे रहे हैं, तो मान कर चलिए कि अगले 6 से 8 महीनों तक आपकी किस्त एक रुपया भी कम नहीं होने वाली। कर्जदारों को ऊंची ब्याज दरों का दर्द अभी और सहना पड़ेगा।

PAA 2: ₹100 के नोट की वास्तविक क्रय शक्ति (Purchasing Power) कितनी घटी?

उत्तर: महंगाई को समझने का सबसे सीधा पैमाना आपकी जेब में रखे नोट की घटती ताकत है।

  • यदि एक साल में खुदरा महंगाई 4.82% बढ़ी है, तो इसका अर्थ है कि पिछले साल के ₹100 का मूल्य घटकर आज लगभग ₹95.40 रह गया है।
  • और यदि इसे केवल खाने-पीने के सामान (खाद्य महंगाई 5.95%) के संदर्भ में देखें, तो भोजन के मामले में आपके ₹100 के नोट की क्रय शक्ति घटकर ₹94.38 रह गई है।
  • इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपकी मासिक आय पिछले एक साल में कम से कम 5 से 6 प्रतिशत नहीं बढ़ी है, तो आप वास्तव में पहले से गरीब हुए हैं, भले ही आपके बैंक खाते में उतना ही वेतन आ रहा हो।

PAA 3: क्या बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ा है?

उत्तर: जी हाँ, हालांकि यहाँ स्थिति खाद्य पदार्थों जितनी विकराल नहीं है।

  • शिक्षा सेवाएं (Education Services): राष्ट्रीय स्तर पर 3.73% महंगी हुई हैं (शहरी क्षेत्रों में यह दर 4.29% और प्राथमिक शिक्षा में 4.39% दर्ज की गई)। निजी स्कूलों की फीस और कॉपी-किताबों के खर्च में सालाना लगभग 4-5% की वृद्धि स्थिर बनी हुई है।
  • स्वास्थ्य सेवाएं (Health): इस मोर्चे पर जनता को मामूली राहत है। स्वास्थ्य क्षेत्र की मुद्रास्फीति मात्र 1.34% रही है (दवाइयां और उत्पाद 1.19% की दर से बढ़े हैं)।
भविष्य की दिशा और चुनौतियाँ (Outlook & Challenges)

अगस्त 2026 के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने विकास के साथ-साथ कीमतों को थामने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। आने वाले महीनों के लिए तीन प्रमुख चुनौतियां स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं:

  • खरीफ फसलों की आवक और प्याज-लहसुन का संकट:मंडियों में प्याज की 48.27% और लहसुन की 43.60% महंगाई को तभी रोका जा सकता है जब अक्टूबर-नवंबर में आने वाली खरीफ की नई फसल बिना किसी बेमौसम बारिश के सुरक्षित मंडियों तक पहुंचे। सरकार को बफर स्टॉक से खुले बाजार में रियायती प्याज की बिक्री तुरंत तेज करनी होगी।
  • माल ढुलाई और डीजल की निगरानी:माल परिवहन में 14.64% की भारी वृद्धि देश के आंतरिक व्यापार के लिए खतरे की घंटी है। यदि लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट की लागत कम नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में पैकेज्ड गुड्स, एफएमसीजी और रेडीमेड कपड़ों के दाम भी तेजी से ऊपर चढ़ेंगे।
  • ग्रामीण मांग पर दबाव:ग्रामीण इलाकों में 5.23% की महंगाई और 6.13% की खाद्य महंगाई ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति को सोख रही है। दोपहिया वाहनों और दैनिक उपभोग की वस्तुओं (FMCG) की ग्रामीण बिक्री पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

अगस्त 2026 के महंगाई के आंकड़े केवल संख्याओं का खेल नहीं हैं, बल्कि यह आम जनता के मासिक बजट की वास्तविक परीक्षा हैं। जब तक तड़के के बुनियादी सामान, परिवहन और त्योहारी खरीदारी की लागत सामान्य नहीं होती, तब तक 4.82% की यह महंगाई हर भारतीय रसोई में अपनी गर्माहट का अहसास कराती रहेगी

⚠️ वित्तीय अस्वीकरण (Financial Disclaimer): यह लेख केवल वित्तीय साक्षरता, आर्थिक विश्लेषण और सामान्य सूचना के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत निवेश, शेयर बाज़ार या कर सलाह के रूप में न लें। कोई भी वित्तीय निर्णय लेने से पहले प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।

सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक - नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर
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निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 245 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।
Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics. A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on "the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown". Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days. ---------------------------------------------------------------------------------- नवनीत मिश्रा वर्तमान में 'निर्भीक इंडिया' मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। 'आदर्श जीवन' दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और 'अमर उजाला' गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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