महिला मतदाता (Women Voters): आसान चुनावी शिकार?
प्रस्तावना- महिला सशक्तिकरण के नाम पर बांटी जा रही नकद रेवड़ियों ने भारतीय लोकतंत्र में एक ऐसा खतरनाक विमर्श खड़ा कर दिया है, जहाँ महिला मतदाता (Women Voters) राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हासिल करने का सबसे आसान, सस्ता और सुरक्षित ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन चुकी हैं। चंद रुपयों की तात्कालिक खैरात के बदले वोट का सौदा करने की यह प्रवृत्ति करदाताओं के पैसे से चलने वाले एक वैध और संस्थागत ‘वोट-फॉर-कैश’ मॉडल में बदल चुकी है।

महिला मतदाता (Women Voters) को तात्कालिक राहत या वोट का सौदा: नकदी का मनोविज्ञान
भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक के भीतर महिला मतदाताओं की लामबंदी अचानक किसी नैतिक जागरण का परिणाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा उनकी सामाजिक और आर्थिक लाचारी की सोची-समझी घेराबंदी है। देश में करोड़ों महिलाएं पूर्णकालिक गृहिणियां हैं, जो प्रतिदिन औसतन 297 मिनट अवैतनिक देखभाल कार्यों (Unpaid Care Work) में खपाती हैं, जबकि पुरुषों का यह योगदान मात्र 31 मिनट है। अपने श्रम के बदले कोई स्वतंत्र आय न होने के कारण वे नकदी की भारी किल्लत (Liquidity Constraints) और आर्थिक पराधीनता में जीती हैं। राजनीतिक रणनीतिकार इसी खाली जेब का फायदा उठाते हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता डेनियल काहमैन के ‘सिस्टम 1 और सिस्टम 2’ चिंतन सिद्धांत के अनुसार, जब कोई व्यक्ति गंभीर अभाव में होता है, तो उसका मस्तिष्क दीर्घकालिक नीतिगत विश्लेषण (सिस्टम 2) को छोड़कर त्वरित और तात्कालिक राहत (सिस्टम 1) के प्रति आकर्षित हो जाता है।
राजनीतिक दल जानते हैं कि लाखों बेरोजगार युवाओं के लिए उद्योग लगाना, पारदर्शी भर्ती परीक्षाएं कराना और आधारभूत ढांचा खड़ा करना बेहद कठिन, महंगा और समय लेने वाला काम है। इसके विपरीत, चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खाते में ₹1,000 या ₹1,500 डाल देना न्यूनतम राजकोषीय लागत पर अधिकतम चुनावी रिटर्न (High ROI) देने वाला नुस्खा है।
विडंबना यह है कि इसे बच्चों की शिक्षा और पोषण का आधार बताकर प्रचारित किया जाता है। आर्थिक अध्ययनों के अनुसार, महिलाओं में उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume) 0.90 है, यानी वे 90% पैसा तुरंत खर्च कर देती हैं।
लेकिन आज के दौर में जब किसी भी सामान्य स्कूल की मासिक फीस, किताबें और आवागमन का खर्च ₹3,000 से ₹5,000 प्रति बच्चा है, तब महीने के ₹1,200 या ₹1,500 से कौन सी पढ़ाई पूरी हो रही है? सच यह है कि यह पैसा केवल बेतहाशा बढ़ती महंगाई की मार पर लगाई गई एक कामचलाऊ पट्टी है। यह सहायता महिला को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उसे हर महीने सरकारी भत्ते के इंतजार में कतार में खड़ा रहने वाला स्थायी मोहताज बना देती है।
महिला मतदाता (Women Voters) नहीं समझ रही ‘अन्नदाता’ और ‘मसीहा’ का भ्रम
राजनीतिक दलों के लिए महिलाओं को बरगलाना इसलिए भी सरल साबित हुआ है क्योंकि वे सरकारी सहायता को नीतिगत अधिकार मानने के बजाय व्यक्तिगत एहसान समझ बैठती हैं। राजनीतिक मनोविज्ञान का ‘पारस्परिकता का सिद्धांत’ (Theory of Reciprocity) बताता है कि मुफ्त का लाभ मिलते ही व्यक्ति के भीतर एक अवचेतन बाध्यता पैदा होती है कि वह अहसान चुकाए। मनोवैज्ञानिक डैन एरियली का निष्कर्ष है कि ‘मुफ्त’ शब्द तार्किक विवेक को कुंद कर देता है। जब मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के नाम से बैंक खाते में पैसे का मैसेज आता है, तो महिलाएं उसे राज्य का कर्तव्य नहीं, बल्कि शासक का निजी परोपकार मान लेती हैं।
जन-प्रतिक्रियाओं के वायरल वीडियो इस राजनीतिक अंधानुराग की भयावह हकीकत बयान करते हैं। वीडियो में महिलाएं राजनीतिक दलों के नेताओं को केवल अपना प्रतिनिधि नहीं मानतीं, बल्कि कैमरे पर हाथ जोड़कर रोते हुए कहती हैं—”मोदी हमारा पति है, हमारा भाई है, हमारा बाप है, हमारा गुरु है” और “वह इंसान नहीं, लिविंग गॉड (साक्षात भगवान) हैं”। यहाँ तक कि कोई सवाल पूछे तो आक्रामक होकर जवाब दिया जाता है कि “जी लगा के बात करो”।
सवाल यह उठता है कि जिस नागरिक को अपनी बदहाली, टूटी सड़कों, बदहाल अस्पतालों और अपने ही घर के बेरोजगार मर्दों के भविष्य पर सवाल पूछना चाहिए था, वह ₹1,500 की खैरात पाकर नेताओं को भगवान और पिता के दर्जे पर क्यों बैठा रही है? जब सत्ता खुद को ‘लाडला भाई’ या ‘पिता’ के रूप में ब्रांड करके सरकारी खजाने से पैसा थमाती है, तो पितृसत्ता की शिकार महिला उस चेहरे को अपना अन्नदाता मानकर अपने लोकतांत्रिक विवेक का पूर्ण समर्पण कर देती है। यह भक्ति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भावनात्मक शोषण है।
‘वोट-फॉर-कैश’ के कानूनी तंत्र उलझी महिला मतदाता (Women Voters): राज्यों में खजाने की लूट के साक्ष्य
अतीत में चुनाव जीतने के लिए गुप्त रूप से शराब, कंबल या लिफाफे में नकदी बांटी जाती थी, जिसे कानूनन अपराध माना जाता था। आज उसी भ्रष्ट आचरण को सरकारी मुहर लगाकर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के नाम पर अंजाम दिया जा रहा है। चुनाव दर चुनाव आंकड़ों ने यह साबित किया है कि जिस दल ने महिलाओं के खाते में सबसे ज्यादा रकम डालने का दांव चला, उसी ने सत्ता हथिया ली:
- बिहार (2020 और 2025-26): वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में जब युवाओं में बेरोजगारी को लेकर भारी आक्रोश था, तब महिलाओं के 71.6% भारी मतदान ने सत्ताधारी गठबंधन को उबारा। जिन 130 सीटों पर महिला मतदान पुरुषों से अधिक था, उनमें से 114 (88%) सीटों पर सत्ता पक्ष ने जीत दर्ज की। इसके बाद, आगामी चुनावों को देखते हुए आचार संहिता लगने से मात्र दस दिन पहले ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ के तहत 75 लाख महिलाओं के खातों में सीधे ₹10,000 (कुल ₹7,500 करोड़) ट्रांसफर कर दिए गए। यह खुलेआम चुनाव से ठीक पहले जनता के पैसे से वोट खरीदने का प्रयास था, जिस पर संवैधानिक संस्थाएं चुप रहीं।
- पश्चिम बंगाल (2021): भीषण राजनीतिक हिंसा और सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मीर भंडार’ (₹500-₹1,000 प्रतिमाह) योजना ने महिलाओं का एकमुश्त वोट तृणमूल कांग्रेस की झोली में डाल दिया। इसके बाद विपक्ष ने भी सत्ता में आने पर ₹3,000 देने की बोली लगा दी।
- मध्य प्रदेश और कर्नाटक (2023): मध्य प्रदेश में चुनाव से ठीक पहले शिवराज सिंह चौहान की ‘लाडली बहना योजना’ (₹1,250 प्रतिमाह) ने हारी हुई बाजी पलट दी। कर्नाटक में कांग्रेस की ‘गृह लक्ष्मी’ (₹2,000 प्रतिमाह) ने सरकार बना दी।
- महाराष्ट्र और झारखंड (2024): महाराष्ट्र में लोकसभा के झटके के बाद महायुति सरकार ने ‘माझी लाडकी बहिण’ योजना शुरू की, जिसके तहत 2.46 करोड़ महिलाओं को ₹21,000 करोड़ बांटे गए और चुनाव आते ही इसे ₹2,100 करने का वादा किया गया। झारखंड में भी ‘मईयां सम्मान योजना’ को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹2,500 कर दिया गया और दोनों राज्यों में सत्ताधारी दलों ने महिला वोटों के दम पर वापसी की।
- असम: ‘ओरुनोदोई’ योजना के तहत 40 लाख महिलाओं को एक दिन में ₹3,600 करोड़ बांटे गए और मंच से यह साफ कहा गया कि बाकी 10% महिलाओं को लाभ तभी मिलेगा जब वर्तमान सरकार दोबारा चुनकर आएगी।
यह प्रतिस्पर्धी कल्याणवाद कुछ और नहीं, बल्कि टैक्सपेयर्स की गाढ़ी कमाई से खुलेआम वोट खरीदने की मंडी है।
राजकोषीय तबाही और पूंजीगत विकास की बलि (RBI की चेतावनी)
राजनीतिक दल अपनी निजी जेब या पार्टी फंड से यह नकद खैरात नहीं बांटते, बल्कि यह पैसा उन ईमानदार टैक्सपेयर्स और मध्यम वर्ग का है जो पसीना बहाकर सरकार को टैक्स देते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट “State Finances: A Study of Budgets of 2024-25” ने इस पर गंभीर खतरे का संकेत दिया है।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च और आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में केवल 12 राज्य महिलाओं के बिना शर्त नकद हस्तांतरण (UCT) पर ₹1,68,040 करोड़ खर्च कर रहे हैं। राज्यों का कर्ज उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के सुरक्षित 20% के मानक को तोड़कर 27.5% से 29.2% तक पहुंच चुका है। महाराष्ट्र पर अकेले इस योजना से सालाना ₹60,000 करोड़ और झारखंड पर ₹14,400 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ रहा है।
आरबीआई ने आगाह किया है कि यह अंधाधुंध राजस्व खर्च राज्यों के ‘पूंजीगत व्यय’ (Capital Expenditure) को पूरी तरह समाप्त (Crowd Out) कर रहा है। जिस पैसे से उच्च स्तर के सरकारी कॉलेज, आधुनिक कैंसर और हृदय रोग अस्पताल, सिंचाई की नहरें और बड़े उद्योग लगने चाहिए थे, उस पैसे को चुनाव जीतने के लिए रेवड़ियों की तरह उड़ाया जा रहा है। जो महिला आज ₹1,500 के लिए अपनी राजनीतिक निष्ठा बेच रही है, वह यह नहीं समझ पा रही कि उसी ₹1,500 के बदले उसके बेटे के रोजगार के अवसर, उसके परिवार की सस्ती चिकित्सा और बुनियादी शिक्षा की बलि चढ़ा दी गई है।
सशक्तिकरण का मुखौटा और राजनीतिक परजीवीकरण
सच्चा महिला सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएं कार्यबल में शामिल हों, उन्हें संपत्ति का अधिकार मिले, समान काम का समान वेतन मिले और वे स्वतंत्र नागरिक बनकर अपने पैरों पर खड़ी हों।
बिना शर्त नकद हस्तांतरण की यह नीति समाज की पितृसत्तात्मक संरचना को छूती तक नहीं। महिला आज भी उसी चारदीवारी में अवैतनिक घरेलू श्रम में कैद है, अंतर केवल इतना है कि अब उसे घर चलाने के लिए अपने पति के साथ-साथ सरकार की खैरात पर भी निर्भर कर दिया गया है।
ब्राजील के ‘बोल्सा फैमिलिया’ जैसे देशों में नकद सहायता बच्चों की 85% स्कूल उपस्थिति और टीकाकरण की कड़ी शर्तों से बंधी होती है, ताकि अगली पीढ़ी सशक्त बने। भारत में ऐसी कोई शर्त नहीं है, क्योंकि यहाँ सरकारों का मकसद मानव पूंजी का निर्माण करना नहीं, बल्कि वोटिंग मशीन का बटन दबवाना है।
जब तक महिला मतदाता इस बात को नहीं समझेंगी कि ₹1,500 की नकद रिश्वत उनके बच्चों के बेहतर भविष्य की कीमत पर दी जा रही है, तब तक वे लोकतंत्र की स्वतंत्र नागरिक नहीं, बल्कि सत्ता की भूख मिटाने वाली सबसे सस्ती राजनीतिक वस्तु बनी रहेंगी।
सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक – नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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