कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) व लक्ष्य 2030 : विश्लेषण
हाल ही में कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) द्वारा आयोजित एक उच्च-स्तरीय ब्रिक्स (BRICS) साइड इवेंट ने कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के तारणहार के रूप में प्रस्तुत किया है। शुरुआती बयानों और सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, स्वच्छ कोयला तकनीक (Clean Coal Technologies) के माध्यम से भारत अपनी आयात निर्भरता को खत्म कर सकता है।

लेकिन जब हम इन दावों की परतों को खोलते हैं, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या सच में 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने का लक्ष्य ज़मीनी हक़ीक़त है, या फिर यह महज़ एक महत्वाकांक्षी पीआर (PR) अभियान और सरकारी प्रोपेगेंडा है? इस लेख में हम इस नीतिगत घोषणा का तकनीकी, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से गहरा विश्लेषण करेंगे।
कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) और ब्रिक्स (BRICS) देशों का हित: कूटनीतिक मंशा क्या है?
इस आयोजन में रूस (Russia), इथियोपिया (Ethiopia) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों का शामिल होना महज़ एक औपचारिकता नहीं है। भू-राजनीतिक (Geopolitical) दृष्टिकोण से देखा जाए, तो स्वच्छ कोयला तकनीक (Clean Coal Technologies) के बहाने भारत ब्रिक्स (BRICS) समूह के भीतर एक नया ऊर्जा ब्लॉक (Energy Block) तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
वर्तमान में पूरी दुनिया नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में पश्चिमी देशों द्वारा कोयले के उपयोग पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। भारत और रूस जैसे देश, जिनके पास कोयले के विशाल भंडार हैं, वे इस दबाव को दरकिनार करने के लिए कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) को एक ‘स्वच्छ’ विकल्प (Clean Alternative) के रूप में ब्रांड कर रहे हैं। इस सम्मेलन में कोयले को जलाकर बिजली बनाने के बजाय, उसे गैसीकृत करके सिनगैस (Syngas), अमोनिया (Ammonia), और मेथनॉल (Methanol) जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने पर ज़ोर दिया गया है।
हालांकि, यह कूटनीतिक मंच जितना आकर्षक दिखता है, इसके पीछे का तकनीकी सत्य उतना ही जटिल है। भारत ब्रिक्स (BRICS) देशों को यह जताना चाहता है कि वह ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है, लेकिन क्या हमारे पास इसके लिए आवश्यक स्वदेशी तकनीक पूरी तरह से परिपक्व है?
100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) का 2030 का लक्ष्य: ज़मीनी हक़ीक़त बनाम सरकारी दावे
भारत सरकार ने राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन (National Coal Gasification Mission) के तहत 2030 तक 100 मिलियन टन (100 MT) कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने 8,500 करोड़ रुपये और हाल ही में 37,500 करोड़ रुपये की विशाल वित्तीय प्रोत्साहन योजनाओं (Financial Incentive Schemes) की घोषणा की है।
लेकिन क्या यह लक्ष्य व्यावहारिक है? आइए आंकड़ों पर गौर करें:
- वर्तमान क्षमता: वर्तमान में केवल जिंदल स्टील लिमिटेड (Jindal Steel Limited – JSL) का लगभग 8 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) का प्लांट ही पूरी तरह से चालू स्थिति में है। इसके अलावा तालचर फर्टिलाइज़र्स लिमिटेड (Talcher Fertilisers Limited) का 2.6 MTPA का प्रोजेक्ट अभी भी निर्माणाधीन है।
- लक्ष्य और वास्तविकता के बीच की खाई: 2030 तक 100 मिलियन टन का लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 4-5 वर्षों में हमें अपनी क्षमता को 10 गुना से अधिक बढ़ाना होगा। गैसीकरण संयंत्रों (Gasification Plants) की स्थापना अत्यधिक पूंजी-गहन (Capital-intensive) होती है और इनकी जेस्टेशन अवधि (Gestation Period) बहुत लंबी होती है।
- वित्तीय रियायतें: सरकार ने कोयले की राजस्व हिस्सेदारी में 50% की छूट (50% Rebate) और कोयला लिंकेज (Coal Linkage) की सुविधा दी है, लेकिन इसके बावजूद निजी क्षेत्र का उत्साह उतना आक्रामक नहीं है जितना सरकार दिखा रही है।
विश्लेषणात्मक दृष्टि से, यह 100 मिलियन टन का आंकड़ा एक ‘एस्पिरेशनल टारगेट’ (Aspirational Target) अधिक प्रतीत होता है, जो निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय मंचों को लुभाने के लिए गढ़ा गया है, न कि एक कठोर यथार्थ।
उच्च राख वाला भारतीय कोयला (High Ash Indian Coal) और भेल (BHEL) की तकनीकी चुनौतियां
प्रेस विज्ञप्ति में “भारतीय कोयले की चुनौतियों” का हल्का सा ज़िक्र किया गया है, लेकिन यहीं इस पूरी योजना का सबसे बड़ा पेंच फंसा है। भारतीय कोयले में राख की मात्रा (Ash Content) बहुत अधिक होती है—लगभग 35% से 45% तक।
दुनिया भर में उपलब्ध अधिकांश व्यावसायिक कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) तकनीकें (जैसे Lurgi या अन्य विदेशी डिज़ाइन) कम राख वाले कोयले (Low Ash Coal) के लिए डिज़ाइन की गई हैं। जब इन विदेशी तकनीकों में भारतीय कोयले का उपयोग किया जाता है, तो गैसीफायर (Gasifier) के भीतर स्लैगिंग (Slagging – राख का पिघलकर चिपक जाना) की भारी समस्या उत्पन्न होती है, जिससे प्लांट बार-बार बंद हो जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) ने एक विशेष प्रेशराइज़्ड फ्लुइडाइज़्ड-बेड गैसीफायर (Pressurised Fluidised-bed Gasifier) तकनीक विकसित की है, जो उच्च राख वाले कोयले (High Ash Indian Coal) को संभाल सकती है। लेकिन एक स्वदेशी तकनीक (Indigenous Technology) को लैब से निकालकर व्यावसायिक स्तर (Commercial Scale) पर सफलता के साथ स्थापित करने में अभी भी कई तकनीकी और परिचालन संबंधी अड़चनें बाकी हैं, जिन्हें सरकार आसानी से छुपा रही है।
अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (Underground Coal Gasification – UCG): कास्ता (Kasta) प्रोजेक्ट की वास्तविकता
ब्रिक्स (BRICS) इवेंट में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) द्वारा कास्ता अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (Kasta UCG) पायलट प्रोजेक्ट की प्रगति भी प्रस्तुत की गई। UCG एक ऐसी उन्नत तकनीक है जिसमें कोयले को खदान से बाहर निकाले बिना ही ज़मीन के भीतर ही जलाकर (गैसीकृत करके) गैस निकाली जाती है।
- प्रोपेगेंडा का हिस्सा: सरकार इसे एक गेम-चेंजर (Game Changer) बता रही है।
- ज़मीनी सच्चाई: UCG अत्यधिक जोखिम भरी तकनीक है। ज़मीन के नीचे गैस को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल होता है, और इससे भूजल प्रदूषण (Groundwater Contamination) और ज़मीन धंसने (Subsidence) का गंभीर खतरा रहता है। कास्ता (Kasta) प्रोजेक्ट अभी महज़ एक पायलट चरण में है। इसे व्यावसायिक स्तर पर लागू करने में कम से कम एक दशक का समय और कड़े पर्यावरण क्लीयरेंस (Environmental Clearances) की आवश्यकता होगी। इसलिए, इसे वर्तमान ऊर्जा संकट के तत्काल समाधान के रूप में बेचना स्पष्ट रूप से अतिशयोक्ति (Exaggeration) है।
लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask – PAA): कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) से जुड़े ज्वलंत सवाल
प्रश्न: कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) क्या है और यह कैसे काम करता है?
विश्लेषण: कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) एक थर्मो-केमिकल (Thermo-chemical) प्रक्रिया है। इसमें कोयले को हवा (या ऑक्सीजन) और भाप (Steam) की नियंत्रित मात्रा के साथ उच्च तापमान और दबाव पर प्रतिक्रिया कराई जाती है। कोयला जलने के बजाय विखंडित होकर एक ज्वलनशील गैस बनाता है, जिसे सिनगैस (Syngas) कहते हैं। इस गैस में मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोजन (H2) होते हैं। इस सिनगैस (Syngas) का उपयोग डीआरआई (DRI – Direct Reduced Iron), यूरिया (Urea), अमोनिया (Ammonia) और सिंथेटिक ईंधन (Synthetic Fuels) बनाने के लिए किया जा सकता है।
प्रश्न: क्या स्वच्छ कोयला तकनीक (Clean Coal Technology) सच में पर्यावरण के अनुकूल है?
विश्लेषण: यह एक बहुत बड़ा मिथक (Myth) है। स्वच्छ कोयला तकनीक (Clean Coal Technology) का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह 100% प्रदूषण मुक्त है। हां, पारंपरिक कोयला आधारित पावर प्लांट (Thermal Power Plants) की तुलना में इसमें सल्फर डाइऑक्साइड (SOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) का उत्सर्जन कम होता है। लेकिन इस गैसीकरण प्रक्रिया (Gasification Process) में भी भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) निकलती है। जब तक इसके साथ कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (Carbon Capture and Storage – CCS) तकनीक को अनिवार्य रूप से नहीं जोड़ा जाता, तब तक इसे ‘स्वच्छ’ कहना पर्यावरणविदों की आंखों में धूल झोंकने के समान है।
प्रश्न: भारत में कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
विश्लेषण: सबसे बड़ी बाधा भारत के उच्च राख वाले कोयले (High Ash Indian Coal) की रासायनिक प्रकृति है, जो गैसीकरण (Gasification) की दक्षता (Efficiency) को कम कर देती है। इसके अलावा, इस पूरी प्रक्रिया के लिए भारी मात्रा में ताजे पानी (Fresh Water) की आवश्यकता होती है। भारत के कई कोयला बहुल राज्य पहले से ही जल संकट (Water Crisis) से जूझ रहे हैं। तीसरा बड़ा कारक है अत्यधिक पूंजीगत व्यय (High Capex), जिसके कारण निजी कंपनियां (Private Sector) इसमें निवेश करने से हिचकिचा रही हैं।
निष्कर्ष: क्या कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चाबी है?
सरकार की प्रेस विज्ञप्ति और ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन में दिए गए वक्तव्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत अपनी आयातित एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल (Crude Oil) पर निर्भरता कम करने के लिए बेताब है। कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) निसंदेह एक सामरिक और आवश्यक कदम है, विशेषकर स्टील (Steel) और फर्टिलाइज़र (Fertilizer) उद्योगों के लिए।
हालाँकि, इसे पूरी तरह से “सफलता की कहानी” (Success Story) के रूप में पेश करना एक पीआर (PR) प्रोपेगेंडा का हिस्सा है। सच्चाई यह है कि 2030 तक 100 मिलियन टन का लक्ष्य वर्तमान बुनियादी ढांचे, भेल (BHEL) की तकनीकी सीमाओं और भारी निवेश आवश्यकताओं को देखते हुए लगभग असंभव प्रतीत होता है। जब तक सरकार उच्च राख वाले भारतीय कोयले (High Ash Indian Coal) के गैसीकरण की स्वदेशी तकनीक को पूरी तरह से व्यावसायिक (Commercial) नहीं बना लेती और पर्यावरणीय चिंताओं का पारदर्शी समाधान नहीं खोज लेती, तब तक स्वच्छ कोयला तकनीक (Clean Coal Technology) का यह सपना धरातल पर कम और फाइलों में ज़्यादा नज़र आएगा।
सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक - नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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