पंचनामा

प्रसार भारती और BIND योजना का सच | विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

भारत के सार्वजनिक प्रसारक प्रसार भारती (Prasar Bharati) और इसके बुनियादी ढांचे को उन्नत करने वाली BIND योजना (Broadcasting Infrastructure and Network Development) पर सरकार द्वारा जारी हालिया प्रेस विज्ञप्ति और संसद में दिए गए जवाब ने लोकतांत्रिक हल्कों में एक नई बहस छेड़ दी है।

प्रसार भारती की BIND योजना का विस्तार और अरबों का बजट: बुनियादी ढांचे का विकास या सूचनाओं पर एकाधिकार?
प्रसार भारती और BIND योजना का सच

हाल ही में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने लोकसभा में यह दावा किया है कि पिछले एक वर्ष में इस सार्वजनिक प्रसारक की कार्यप्रणाली या संपादकीय स्वायत्तता को लेकर पत्रकारों या मीडिया निकायों की ओर से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली है। लेकिन जब हम अरबों रुपये के बजट वाले इस विशाल नेटवर्क के प्रशासनिक ढांचे, BIND योजना के निहितार्थों और इसके ‘स्वतंत्र’ संपादकीय पैनल की पृष्ठभूमि का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, तो निष्पक्ष पत्रकारिता बनाम सरकारी प्रचार तंत्र (Propaganda) के बीच की धुंधली तस्वीर पूरी तरह से साफ होने लगती है।

यह विश्लेषण सरकारी दावों की परतों को खोलकर इस बात का तार्किक मूल्यांकन करेगा कि क्या प्रसार भारती वास्तव में जनता की आवाज़ है, या फिर यह पूरी तरह से सत्ता के वफादार नौकरशाहों द्वारा संचालित एक विशाल जनसंपर्क (PR) मशीनरी में तब्दील हो चुका है।

प्रसार भारती की BIND योजना का विस्तार और अरबों का बजट: बुनियादी ढांचे का विकास या सूचनाओं पर एकाधिकार?

सरकार ने प्रसार भारती के प्रसारण अवसंरचना के विकास के लिए वर्ष 2021-26 के लिए लागू की गई BIND योजना को 31 मार्च 2027 तक के लिए बढ़ा दिया है। यह योजना पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित है, जिसका मुख्य उद्देश्य आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन (Doordarshan) के नेटवर्क का व्यापक डिजिटलीकरण, एफएम-करण (FMisation) और आधुनिकीकरण करना है।

सरकारी दावों और आंकड़ों के अनुसार, आकाशवाणी आज देश की लगभग 98 प्रतिशत आबादी और भौगोलिक क्षेत्रफल के हिसाब से 90 प्रतिशत हिस्से को कवर करती है। इसके अतिरिक्त, डीडी फ्री डिश (DD Free Dish) देश भर के करोड़ों ग्रामीण और दूरदराज के घरों में बिना किसी मासिक सब्सक्रिप्शन शुल्क के उपलब्ध है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सुदूर और सीमांत क्षेत्रों तक सूचनाओं को पहुँचाने के लिए बुनियादी ढांचे का उन्नयन एक राष्ट्र की रणनीतिक आवश्यकता है। लेकिन असली सवाल हार्डवेयर या ट्रांसमीटर टावरों का नहीं है; सवाल उस ‘सामग्री’ (Content) का है जो इस विशाल बुनियादी ढांचे के माध्यम से प्रसारित की जा रही है। जब किसी मीडिया संस्थान का पूरा वित्तपोषण (Funding) सरकार की दया पर निर्भर हो, तो क्या वह संस्थान कभी उस सरकार की नीतियों की निष्पक्ष आलोचना कर सकता है?

प्रसार भारती की ‘संपादकीय स्वायत्तता’ (Editorial Autonomy) का सरकारी दावा

लोकसभा में अधिवक्ता प्रिया सरोज और श्री पुष्पेंद्र सरोज द्वारा पूछे गए सवालों का लिखित उत्तर देते हुए मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने यह रेखांकित किया कि प्रसार भारती में संपादकीय मामलों की नियमित समीक्षा मुख्य संपादक और वरिष्ठ संपादकीय टीम द्वारा की जाती है। सरकार ने दावा किया कि दर्शकों की प्रतिक्रियाओं, टीआरपी (TRP) और सोशल मीडिया एनालिटिक्स का उपयोग समाचारों की सटीकता, संतुलन और प्रस्तुति में सुधार के लिए किया जाता है।

सरकार ने बड़ी ही चतुराई से सदन को यह बताकर अपनी पीठ थपथपाई है कि पिछले एक वर्ष में स्वायत्तता में हस्तक्षेप को लेकर कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है, बल्कि सिर्फ नियुक्ति संबंधी 7 शिकायतें ही मिली हैं। लेकिन खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से, ‘शिकायतों का न आना’ इस बात का प्रमाण नहीं है कि संस्थान स्वतंत्र है; बल्कि यह इस बात का संकेत है कि वहां ‘सेल्फ़-सेंसरशिप’ (Self-Censorship) की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि किसी भी विरोध या असहमति को पनपने से पहले ही कुचल दिया जाता है।

प्रसार भारती की जमीनी हकीकत: नौकरशाहों के हाथों में प्रसार भारती की कमान

प्रेस विज्ञप्ति में जिस “वरिष्ठ संपादकीय टीम” और “मुख्य संपादक” का हवाला देकर निष्पक्षता का दावा किया गया है, उसकी जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। जब हम प्रसार भारती के शीर्ष नेतृत्व का विश्लेषण करते हैं, तो वहां पत्रकारिता के दिग्गजों के बजाय भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों और सत्ता-समर्थक चेहरों का दबदबा नज़र आता है:

  • सीईओ (प्रसार भारती): श्री गौरव द्विवेदी, जो स्वयं एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। एक नौकरशाह का मूल प्रशिक्षण सरकार की नीतियों को लागू करना होता है, उन पर सवाल उठाना नहीं।
  • अध्यक्ष (प्रसार भारती बोर्ड): श्री प्रसून जोशी, जो पूर्व सेंसर बोर्ड प्रमुख हैं। उनकी नियुक्ति से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि बोर्ड का वैचारिक झुकाव किस ओर है।
  • महानिदेशक (समाचार) / आकाशवाणी: श्री राजीव कुमार जैन, जो पूरी संपादकीय अनुमति और समाचारों के प्रसारण के शीर्ष प्राधिकारी हैं।

इसके अतिरिक्त, संपूर्ण ‘संपादकीय’ निगरानी तंत्र में शुभाश्री महापात्र (विदेश सेवा), मनीष शिव जोले (आईटी व सोशल मीडिया सेल) और करीना बी. थेंगामनी (प्रशासन व नीति) जैसे अधिकारी शामिल हैं। निचले स्तर पर समाचार संपादकों जैसे प्रज्ञा देवड़ा (फैक्ट चेक), मो. नसीम नकवी (निर्वाचन सेल), दुर्गेश कटोरिया आदि की एक पूरी टीम तैनात है।

तार्किक विश्लेषण: जिस मीडिया संस्थान की कमान पूरी तरह से सरकारी तंत्र द्वारा नियुक्त आईएएस अफसरों और वफादार नौकरशाहों के हाथों में हो, वहाँ संपादकीय स्वतंत्रता की उम्मीद करना एक मृगतृष्णा (Mirage) के समान है। क्या कोई वरिष्ठ नौकरशाह, जिसकी पदस्थापना और करियर ग्राफ सीधे तौर पर सरकार के हाथों में है, कभी किसी ऐसे समाचार या रिपोर्ट को प्रसारित होने देगा जो सत्ता के लिए असुविधाजनक हो? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। यही कारण है कि प्रसार भारती के प्लेटफॉर्म्स पर आपको सत्ता का ‘गुलाबी प्रचार’ (Pink Propaganda) तो प्रचुर मात्रा में मिलेगा, लेकिन जमीनी जन-सरोकार और तीखे तीखे सवालों का पूरी तरह से अभाव होगा।

लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask – PAA): प्रसार भारती और BIND योजना से जुड़े अहम सवाल

प्रश्न: BIND योजना (BIND Scheme) क्या है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?

विश्लेषण: BIND योजना का पूर्ण रूप ‘ब्रॉडकास्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड नेटवर्क डेवलपमेंट’ है। इसका प्राथमिक उद्देश्य 2021-2026 (अब 2027 तक विस्तारित) के दौरान दूरदर्शन और आकाशवाणी के तकनीकी बुनियादी ढांचे, स्टूडियो और ट्रांसमीटरों का आधुनिकीकरण करना है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि हार्डवेयर के इस उन्नयन का असल मकसद सरकारी पहुंच (Reach) को उन सुदूर ग्रामीण और सीमांत इलाकों तक ले जाना है, जहां तक स्वतंत्र डिजिटल या प्रिंट मीडिया की पहुंच अभी भी सीमित है।

प्रश्न: क्या प्रसार भारती (Prasar Bharati) सच में एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय है?

विश्लेषण: कागज़ों पर प्रसार भारती अधिनियम 1990 के तहत यह एक स्वायत्त (Autonomous) वैधानिक निकाय है, जिसे ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (BBC) की तर्ज पर स्थापित करने का सपना देखा गया था। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। इसके बोर्ड सदस्यों, सीईओ और वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति सीधे तौर पर सरकार के प्रभाव वाली समितियों द्वारा की जाती है। वित्तीय रूप से भी यह संस्थान पूरी तरह से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के बजट पर निर्भर है। जहां वित्तीय निर्भरता होती है, वहां संपादकीय स्वायत्तता स्वतः ही समाप्त हो जाती है।

प्रश्न: डीडी फ्री डिश (DD Free Dish) के पीछे सरकार की क्या रणनीति है?

विश्लेषण: डीडी फ्री डिश दर्शकों के लिए बिल्कुल मुफ्त है, लेकिन यह एक बेहद शक्तिशाली ‘नैरेटिव-बिल्डिंग टूल’ (Narrative Building Tool) है। चूंकि देश के सबसे गरीब और ग्रामीण तबके के पास डिश टीवी का सब्सक्रिप्शन देने के पैसे नहीं होते, इसलिए वे पूरी तरह से डीडी फ्री डिश पर निर्भर हैं। इस एकाधिकार का उपयोग करके सरकार अपनी राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा को बिना किसी प्रतिरोध के करोड़ों घरों तक सीधे पहुंचाती है। यह जनमत निर्माण (Manufacturing Consent) का सबसे बड़ा सरकारी हथियार है।

निष्कर्ष: क्या बुनियादी ढांचे के विस्तार से स्वतंत्र पत्रकारिता संभव है?

सरकार द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति और लोकसभा में दिए गए उत्तर तथ्यों के स्तर पर गलत नहीं हैं, लेकिन वे “आधा सच” (Half-truth) प्रस्तुत करते हैं। यह सच है कि BIND योजना के तहत बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण हो रहा है, और यह भी सच है कि प्रसार भारती की पहुंच देश की 98 प्रतिशत आबादी तक हो चुकी है।

लेकिन इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जब किसी मीडिया संस्थान का न्यूज़रूम पत्रकारों के बजाय नौकरशाहों (Bureaucrats) के नियंत्रण में चला जाता है, तो वह संस्थान जनता की आवाज़ न रहकर केवल सरकार का ‘माउथपीस’ (Mouthpiece) बन जाता है। शिकायतों का न आना यह साबित नहीं करता कि संपादकीय नीतियां निष्पक्ष हैं; बल्कि यह साबित करता है कि तंत्र इतना सख्त है कि उसमें विरोध का कोई स्वर ही नहीं पनप सकता। जब तक प्रसार भारती को वित्तीय और प्रशासनिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता (True Autonomy) नहीं दी जाती, तब तक इसके द्वारा प्रसारित की जाने वाली सामग्री को ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’ के बजाय ‘सरकारी विज्ञापन’ के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

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Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics. A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on "the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown". Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days. ---------------------------------------------------------------------------------- नवनीत मिश्रा वर्तमान में 'निर्भीक इंडिया' मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। 'आदर्श जीवन' दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और 'अमर उजाला' गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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