Ghamasaan movie review : बीहड़ की खूनी सियासत

- फिल्म का नाम: घमासान (Ghamasaan)
- श्रेणी: पॉलिटिकल क्राइम थ्रिलर / बायोग्राफिकल ड्रामा
- निर्देशक: तिग्मांशु धूलिया (Tigmanshu Dhulia)
- निर्माता: पीयूष सिंह और संदीप बंसल (गोल्डन रेशियो फिल्म्स)
- रिलीज़ की तारीख: 11 सितम्बर 2026 (ZEE5 प्रीमियर)
- रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5 स्टार)
- कलाकार (मुख्य भूमिका): प्रतीक गांधी, अरशद वारसी, इशिता दत्ता, सतीश कौशिक (मरणोपरांत)
घमासान (Ghamasaan movie review) में फिल्म की कहानी
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर फैले चंबल के बीहड़ केवल डकैतों की पनाहगाह नहीं रहे, बल्कि वे सत्ता और अपराध के खूनी गठजोड़ की जीवित गवाही देते रहे हैं। निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म इसी क्रूर यथार्थ को अपनी कहानी के केंद्र में रखती है।
कथानक के केंद्र में बीहड़ का सबसे खूंखार, शातिर और बेरहम डकैत घमंडी सिंह (अरशद वारसी) है, जिसका आतंक जंगलों से लेकर लखनऊ और भोपाल के सियासी गलियारों तक फैला हुआ है। घमंडी सिंह केवल एक बंदूकधारी बागी नहीं है, बल्कि वह स्थानीय राजनेताओं की सत्ता की सीढ़ियों को मजबूत करने वाला एक ऐसा मोहरा है जो वक्त आने पर वजीर को भी मात देने की कुव्वत रखता है।
इस आतंक और समानांतर सरकार के खात्मे के लिए स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के एक बेहद ईमानदार, सिद्धांतवादी और दृढ़निश्चयी अधिकारी (प्रतीक गांधी) को बीहड़ में उतारा जाता है। घमासान मूवी रिव्यू (Ghamasaan Movie Review) में चूहे-बिल्ली का यह खेल केवल जंगलों में गोलियों की बौछार तक सीमित नहीं रहता।
यह कहानी खाकी (पुलिस), खादी (राजनीति) और बीहड़ (अपराध) के उस त्रिकोण को बेनकाब करती है, जहां हर कोई दूसरे का इस्तेमाल कर रहा है। एसटीएफ अधिकारी को जल्द ही यह अहसास होता है कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन जंगलों में राइफल ताने खड़ा घमंडी सिंह नहीं, बल्कि वे सफेदपोश नेता और भ्रष्ट अफसर हैं जो अपनी कुर्सी बचाने के लिए पुलिसकर्मियों को बलि का बकरा बनाने से भी नहीं हिचकते।
जब कानून के हाथ बांध दिए जाते हैं और व्यवस्था ही अपराधी को संरक्षण देने लगती है, तब उस जांबाज पुलिस अफसर के सामने आत्मसम्मान, कर्तव्य और अस्तित्व का गहरा संकट खड़ा हो जाता है। क्या वह बीहड़ के इस चक्रव्यूह को भेदकर घमंडी सिंह का अंत कर पाता है, या फिर सियासी दलदल उसे ही निगल जाता है? यही इस थ्रिलर का मुख्य सार है जो दर्शकों को अंत तक अपनी सीट से बांधे रखता है।
घमासान (Ghamasaan movie review): फिल्म समीक्षा
‘हासिल’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी कालजयी कृतियां रचने वाले तिग्मांशु धूलिया ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बीहड़ और ग्रामीण अपराध के मनोविज्ञान पर उनसे बेहतर पकड़ किसी की नहीं है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और घरेलू समीक्षा पोर्टल्स पर घमासान मूवी रिव्यू (Ghamasaan Movie Review) को दर्शकों और क्रिटिक्स की जबरदस्त सराहना मिल रही है।
आईएमडीबी (IMDb) पर फिल्म ने 8.1/10 की प्रभावशाली रेटिंग दर्ज की है, जबकि रॉटेन टोमेटोज़ (Rotten Tomatoes) पर आलोचकों ने इसे 82% का फ्रेश स्कोर दिया है। वहीं, गूगल रिव्यूज़ (Google Reviews) में लगभग 85% दर्शकों ने इसे एक बेहद कसी हुई, प्रामाणिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली क्राइम थ्रिलर बताया है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका यथार्थवादी स्क्रीनप्ले और किरदारों का चित्रण है। अरशद वारसी ने ‘सर्किट’ जैसे कॉमिक किरदारों की अपनी छवि को पूरी तरह तोड़ते हुए घमंडी सिंह के रूप में करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय पेश किया है। उनके चेहरे की खामोशी, आंखों का खालीपन और अचानक भड़कने वाला गुस्सा स्क्रीन पर सिहरन पैदा करता है। वहीं, प्रतीक गांधी ने एसटीएफ अधिकारी के संयम, लाचारी और अंदरूनी आक्रोश को बहुत ही परिपक्वता से जिया है। दिवंगत अभिनेता सतीश कौशिक को एक चालाक राजनेता के रूप में देखना भावुक करता है; उनके संवाद व्यवस्था के दोगलेपन पर करारा तमाचा जड़ते हैं। इशिता दत्ता ने भी अपनी सीमित भूमिका में छाप छोड़ी है।
फिल्म का संपादन बेहद क्रिस्प है, जिससे दो घंटे से अधिक का समय पलक झपकते बीत जाता है। जंगल की मुठभेड़ों के दौरान शार्प कट्स तनाव को चरम पर ले जाते हैं। हालांकि, फिल्म का मिजाज काफी गंभीर और डार्क है, जो पारंपरिक मसाला और नाच-गाने वाले बॉलीवुड दर्शकों को थोड़ा भारी लग सकता है। कुछ दृश्यों में अत्यधिक खून-खराबा और क्रूरता दिखाई गई है, लेकिन कहानी की मांग के अनुसार यह बिल्कुल सटीक बैठती है। कुल मिलाकर, यह ओटीटी के दौर की एक ऐसी बेमिसाल थ्रिलर है जो लंबे समय तक दर्शकों के जेहन में जिंदा रहेगी।
घमासान मूवी रिव्यू (Ghamasaan Movie Review): छायांकन, निर्देशन और उपकरण
तिग्मांशु धूलिया का निर्देशन इस फिल्म की रीढ़ है; उन्होंने मेलोड्रामा से बचते हुए किरदारों को ग्रे-शेड्स में पेश किया है। सिनेमैटोग्राफर ने चंबल की मिट्टी, बीहड़ों की खाइयों और जंगलों को बेहद जीवंत और क्रूर अंदाज में फिल्माया है। शूटिंग के दौरान नेचुरल लाइट (प्राकृतिक रोशनी) और हैंडहेल्ड कैमरा तकनीकों का व्यापक उपयोग किया गया है, जो दृश्यों को एक वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) जैसा वास्तविक अहसास देता है।
उन्नत लेंस और आधुनिक स्टेडीकैम उपकरणों के जरिए लिए गए चेज़ सीन्स और एनकाउंटर दृश्य दर्शकों को सीधे गोलियों की गूंज के बीच खड़ा कर देते हैं। बुंदेलखंडी भाषा के तीखे संवाद और रस्टिक बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तकनीकी पक्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाते हैं।
घमासान मूवी रिव्यू (Ghamasaan Movie Review): इसे क्यों देखें / न देखें
क्यों देखें:
- अरशद वारसी का खूंखार अवतार: कॉमेडी से हटकर एक गंभीर, बेरहम और खतरनाक डकैत के रूप में अरशद वारसी का यादगार अभिनय।
- तिग्मांशु धूलिया का असली सिनेमा: ‘पान सिंह तोमर’ जैसी मिट्टी की खुशबू, राजनीति की गंदगी और बीहड़ की बेबाक सच्चाई।
- प्रतीक गांधी की सशक्त परफॉर्मेंस: खाकी वर्दी में एक ईमानदार और मजबूर एसटीएफ अफसर का बेहद सधा हुआ काम।
- दिवंगत सतीश कौशिक का अभिनय: एक धूर्त राजनेता के रूप में उनकी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और तीखे व्यंग्य।
क्यों न देखें:
- मसाला और गानों का अभाव: यदि आप नाच-गाने, हल्की-फुल्की कॉमेडी और कमर्शियल तड़क-भड़क के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है।
- अत्यधिक हिंसा और डार्क टोन: बीहड़ की क्रूरता, रक्तपात और खौफनाक एनकाउंटर कमजोर दिल वालों को विचलित कर सकते हैं।
- गंभीर और संजीदा रफ्तार: कहानी बिना किसी जबरन ड्रामे के एक गंभीर गति से आगे बढ़ती है जो हल्के मनोरंजन की तलाश करने वालों को भारी लग सकती है।
फिल्म समीक्षक - नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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