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राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर राजनयिक समझौता?

प्रस्तावना- भाजपा सरकार और उसके तंत्र का एक तयशुदा एजेंडा अक्सर देखने को मिलता है कि जब भी कोई नागरिक, बुद्धिजीवी या विपक्ष उनकी नीतियों पर सवाल उठाए, तो उसे तुरंत राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर खतरा बता ‘एंटी-नेशनल’ (देशद्रोही) घोषित कर दिया जाता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) : मैथ्यू वैनडाइक (Matthew VanDyke) की गिरफ्तारी
राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर राजनयिक समझौता

दूसरी तरफ, जब वास्तविक नियंत्रण और संप्रभुता के मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जहाँ विपक्ष यह आरोप लगाता रहा है कि मोदी सरकार अमेरिका के सामने नतमस्तक हो रही है, तो सवाल उठता है कि क्या हम भी बिना सोचे-समझे इसे अमेरिका के प्रति समर्पित सरकार घोषित कर दें? बिल्कुल नहीं।

एक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया शोधार्थी के रूप में मेरा यह दायित्व है कि किसी भी राजनीतिक पूर्वाग्रह या नारेबाजी से परे हटकर, केवल और केवल पुख्ता तथ्यों, कानूनी दस्तावेज़ों और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के आईने में सच को परखा जाए।

देश के मुख्यधारा के मीडिया में इस विषय पर बहुत कम लोग लिख रहे हैं, क्योंकि इसके लिए जिस कूटनीतिक और रणनीतिक समझ (Geopolitics) की ज़रूरत है, उसका घोर अभाव है; और जो लिख भी रहे हैं, वे जानबूझकर इसके संवेदनशील पहलुओं पर पर्दा डाल रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) का तकाज़ा है कि हर उस पहलू को बेपर्दा किया जाए, जहाँ भारत की संप्रभुता दांव पर लगी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) : मैथ्यू वैनडाइक (Matthew VanDyke) की गिरफ्तारी

घटना की शुरुआत मार्च 2026 में होती है, जब देश की सर्वोच्च आतंकवाद-रोधी एजेंसी ‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’ (NIA) ने एक गोपनीय और समन्वित ऑपरेशन में दिल्ली, कोलकाता और लखनऊ के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से सात विदेशी नागरिकों को दबोचा। इनमें मुख्य नाम था

मैथ्यू वैनडाइक (Matthew VanDyke) एक अमेरिकी नागरिक, पूर्व वृत्तचित्र निर्माता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुख्यात अमेरिकी ‘मर्सिनरी’ (भाड़े का लड़ाका), जो सीरिया और लीबिया के संघर्ष क्षेत्रों में सक्रिय रह चुका है। वैनडाइक के साथ छह यूक्रेनी नागरिक भी पकड़े गए, जो सैन्य और सामरिक अभियानों के मंझे हुए विशेषज्ञ माने जाते हैं।

एनआईए (NIA) की शुरुआती जांच के अनुसार, ये सभी विदेशी टूरिस्ट वीजा पर भारत में दाखिल हुए। इसके बाद उन्होंने गृह मंत्रालय के कड़े नियमों का उल्लंघन करते हुए पूर्वोत्तर के प्रतिबंधित सीमावर्ती राज्य मिजोरम में अवैध प्रवेश किया। मिजोरम की दुर्गम पहाड़ियों का इस्तेमाल करते हुए इस गिरोह ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की और म्यांमार के गृहयुद्धग्रस्त क्षेत्रों में दस्तक दी।

आरोप यह था कि ये विदेशी म्यांमार के जातीय सशस्त्र विद्रोही समूहों (Ethnic Armed Groups) को अत्याधुनिक हथियार चलाने, कॉम्बैट रणनीति और विशेष रूप से घातक ड्रोन तकनीक (Drone Warfare) का प्रशिक्षण दे रहे थे।

म्यांमार सीमा पर चल रहा संघर्ष भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर मणिपुर और मिजोरम की आंतरिक सुरक्षा, हथियार तस्करी और मादक पदार्थों के सिंडिकेट से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे अत्यंत संवेदनशील ‘चिकन-नेक’ गलियारे के करीब विदेशी लड़ाकों की यह सक्रियता सीधे तौर पर भारत की अखंडता और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रहार थी।

यही वजह थी कि एनआईए ने शुरुआत में इन पर गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत आतंक और देश-विरोधी साजिश की संगीन धाराएं लगाईं।

राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर 180 दिन, ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ और एनआईए की कानूनी विफलता पर उठते सवाल

शुरुआत में इस मामले को अंतरराष्ट्रीय जासूसी और भाड़े के सैनिकों के बड़े नेटवर्क के रूप में पेश करने वाली जांच एजेंसी सितंबर 2026 तक आते-आते अचानक बैकफुट पर दिखाई देने लगी। नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट स्थित विशेष एनआईए अदालत (Special NIA Court) में जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो कानूनी पन्नों पर अभियोजन का पूरा ढांचा ही बदल चुका था।

कानून का बुनियादी सिद्धांत है कि यूएपीए (UAPA) के तहत आरोपी को बिना जमानत के 180 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है, बशर्ते जांच एजेंसी इस तय समय सीमा के भीतर अदालत में पुख्ता साक्ष्यों के साथ चार्जशीट पेश करे।

लेकिन एनआईए 180 दिन बीत जाने के बाद भी अमेरिकी मर्सिनरी और यूक्रेनी नागरिकों के खिलाफ आतंकी साजिश की कोई ठोस चार्जशीट अदालत में दाखिल नहीं कर पाई। जब समय सीमा समाप्त हो गई, तो अदालत के पास कानून के हाथ बंधे होने के कारण आरोपियों को ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ (वैधानिक जमानत) देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

अदालत का फैसला और भी चौंकाने वाला रहा। 24 सितंबर 2026 को विशेष अदालत ने न केवल इन्हें तिहाड़ जेल से रिहा किया, बल्कि इनके जब्त पासपोर्ट वापस लौटाते हुए इन्हें ‘पारिवारिक और मानवीय आधार’ पर एक महीने के लिए अपने-अपने देश (अमेरिका और यूक्रेन) जाने की खुली छूट दे दी।

इसके पीछे एनआईए का वह ढुलमुल रुख था, जिसमें उसने अपनी पहली चार्जशीट से यूएपीए की सभी कठोर धाराएं हटा लीं और मामले को महज विदेशी नागरिक अधिनियम (Foreigners Act) और साधारण वीजा उल्लंघन का रूप दे दिया।

विशेष अदालत (Special NIA Court) ने भले ही एक महीने बाद भारत लौटने का हलफनामा लेकर इन्हें जाने दिया हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून का सामान्य जानकार भी यह समझता है कि एक बार अमेरिकी धरती पर पहुँचने के बाद किसी पूर्व सैन्य कांट्रेक्टर को वापस भारतीय अदालत के कठघरे में खड़ा करना नामुमकिन जैसा है।

अमेरिका या यूक्रेन अपने नागरिकों को ऐसे मामलों में शायद ही कभी प्रत्यर्पित (Extradite) करते हैं। यदि वे नहीं लौटते हैं, तो भारत केवल इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने या अनुपस्थिति में मुकदमा (Trial in absentia) चलाने का कागजी खेल खेलता रह जाएगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) को राजनयिक दबाव (Diplomatic Pressure) के पीछे रखा ताक पर: मार्को रुबियो, सर्जियो गोर और परदे के पीछे का खेल

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मामले में भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता का खुला उल्लंघन हुआ, उसमें देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी इतनी लाचार और अक्षम कैसे साबित हो गई? क्या यह केवल प्रक्रियात्मक चूक थी या फिर साउथ ब्लॉक और वॉशिंगटन के बीच हुआ कोई कूटनीतिक सौदा?

राजनयिक गलियारों से छनकर आ रहे तथ्य बताते हैं कि इस पूरे मामले के पीछे जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव काम कर रहा था:

  • अमेरिकी विदेश मंत्री और राजदूत की सक्रियता: गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही अमेरिकी और यूक्रेनी दूतावासों ने इस मामले को लेकर असाधारण आक्रामकता दिखाई। अमेरिकी विदेश मंत्री (US Secretary of State) मार्को रुबियो की भारत यात्रा और भारत में नवनियुक्त अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री के साथ बैठकों में इस मामले को प्राथमिकता से उठाया गया।
  • यूक्रेन का आक्रामक रुख: यूक्रेनी दूतावास ने इस पूरी कानूनी कार्रवाई को “राजनीति से प्रेरित” बताते हुए नई दिल्ली पर लगातार राजनयिक दबाव बनाया और तुरंत काउंसलर एक्सेस की मांग की।
  • आर्थिक और टैरिफ की धमकियां: भू-राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं, संभावित टैरिफ के दबाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्राथमिकताओं को साधने के चक्कर में भारत सरकार ने विदेशी लड़ाकों के इस संवेदनशील मुद्दे पर समझौतावादी रुख अपनाया।

विपक्षी दलों ने गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि घरेलू मामलों में यूएपीए (UAPA) का इस्तेमाल कर अपने ही नागरिकों को वर्षों तक बिना ट्रायल जेल में रखने वाली सरकार विदेशी नागरिकों के सामने आते ही नरम पड़ गई और अमेरिकी दबाव में आकर एनआईए की धाराओं को जानबूझकर हल्का किया गया ताकि आरोपियों को बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता मिल सके।

1984 का वारेन एंडरसन कांड बनाम 2026: क्या इतिहास खुद दोहरा रहा है?

यह घटनाक्रम स्वतंत्र भारत के इतिहास के उस काले अध्याय की याद दिलाता है जब 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी और यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को भारत लाया तो गया, लेकिन तत्कालीन सरकार ने अमेरिकी प्रशासन के दबाव में आकर उसे सुरक्षित सरकारी विमान से देश से बाहर भेज दिया था। तब से लेकर आज तक एंडरसन कभी भारतीय अदालत में पेश नहीं हुआ और हजारों पीड़ितों को कभी न्याय नहीं मिला।

आज वर्ष 2026 में, जब मैथ्यू वैनडाइक दिल्ली की विशेष अदालत से आदेश लेकर तिहाड़ से सीधे अमेरिका के लिए उड़ान भरता है, तो वही ऐतिहासिक लाचारी दोबारा उभरती दिखती है।

एक तरफ देश की सीमांत जनता घुसपैठ और अस्थिरता का दंश झेल रही है, सुरक्षा बल सीमावर्ती इलाकों में जान जोखिम में डाल रहे हैं, और दूसरी तरफ एक विदेशी मर्सिनरी, जो प्रतिबंधित इलाकों में युद्ध की तकनीक सिखा रहा था, वह बड़े आराम से कानून की कमियों और कूटनीतिक सौदेबाजी के सहारे अपने मुल्क लौट जाता है।

निष्कर्ष और आगे की राह (Way Forward)

किसी भी संप्रभु राष्ट्र की राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) उसके कूटनीतिक और आर्थिक समझौतों से कहीं ऊपर होनी चाहिए। यदि विदेशी नागरिक भारतीय कानूनों को धता बताकर अशांत क्षेत्रों में समानांतर सैन्य गतिविधियां चलाएंगे और सरकारें राजनयिक तनाव के डर से उन पर कानूनी शिकंजा ढीला कर देंगी, तो यह देश की संप्रभुता के लिए बेहद खतरनाक मिसाल बन जाएगी। इस संकट से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने अनिवार्य हैं:

  • संसदीय निगरानी और स्पष्टीकरण: गृह मंत्रालय और एनआईए को संसद और देश की जनता के सामने इस बात का स्पष्ट जवाब देना चाहिए कि 180 दिनों के भीतर यूएपीए (UAPA) के तहत चार्जशीट क्यों नहीं दाखिल की जा सकी।
  • जांच एजेंसियों की स्वायत्तता: एनआईए जैसी शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों को किसी भी प्रकार के विदेश नीति या राजनयिक दबाव से पूरी तरह मुक्त रखा जाए ताकि गंभीर राष्ट्रीय अपराधों पर कूटनीतिक सौदेबाजी की छाया न पड़े।
  • सीमांत सुरक्षा और वीजा नियमों का पुनरावलोकन: पूर्वोत्तर के संवेदनशील राज्यों में आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) और प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट (PAP) के नियमों की कड़ी डिजिटल निगरानी की जाए ताकि कोई भी विदेशी सैलानी का चोला ओढ़कर भारत की सीमाओं को छद्म युद्ध का अखाड़ा न बना सके।

जब तक भारत अपने राष्ट्रीय हितों को वैश्विक शक्तियों के दबाव से अलग रखकर कड़े फैसले लेने का साहस नहीं दिखाएगा, तब तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की बातें घरेलू राजनीति के नारों तक सीमित रह जाएंगी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की साख को ठेस पहुंचती रहेगी।

नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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