Press Council new guidelines में पत्रकारों की सुरक्षा या ‘सरकारी भोंपू’ बनाने की तैयारी? एक्सक्लूसिव पंचनामा
यह प्रेस विज्ञप्ति भारतीय प्रेस परिषद (Press Council new guidelines of India – PCI) से 15 अक्टूबर 2026 को जारी हुई है, जिसकी ‘निर्भीक इंडिया’ के लिए सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक नवनीत मिश्रा द्वारा गहन समीक्षा (पंचनामा) की जा रही है। और हम प्रेस परिषद के नियमों का जनसंचार सिद्धांतों पर परीक्षण करेंगे।

विरोध प्रदर्शनों और रैलियों की कवरेज (Covering Protests) हमेशा से पत्रकारिता का सबसे चुनौतीपूर्ण और बुनियादी हिस्सा रही है। इसी संदर्भ में, भारतीय प्रेस परिषद ने 15 अक्टूबर 2026 को 6 पन्नों की एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, जिसमें “विरोध प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिए दिशा-निर्देश” (Guidelines for Journalists Covering Protests and Demonstrations) दिए गए हैं।
कागज़ों पर देखने में यह पत्रकारों की सुरक्षा (Safety of Media Personnel) और जिम्मेदार रिपोर्टिंग (Responsible Reporting) का एक आदर्श दस्तावेज़ लगता है। लेकिन जब जनसंचार (Mass Communication) के सिद्धांतों और ज़मीनी हकीकत की कसौटी पर इस विज्ञप्ति की ‘चीर-फाड़’ की जाती है, तो इसमें कई ऐसे पेंच नज़र आते हैं, जो पत्रकारों को ‘कवरेज’ से रोककर महज़ पुलिस प्रशासन का ‘दर्शक’ बनाने की ओर इशारा करते हैं।
आइए, इस 6-सूत्रीय दिशा-निर्देश (Guidelines) का एक-एक कर परीक्षण (Test) करते हैं और समझते हैं कि क्या प्रेस काउंसिल वास्तव में जनसंचार के मूल सिद्धांतों को समझती भी है, या यह केवल ‘सरकारी भोंपू’ (State Mouthpiece) बनकर रह गई है?
Press Council new guidelines 1. पहचान और व्यावसायिक आचरण : पत्रकारिता या पुलिस की आज्ञाकारिता?
दिशा-निर्देश क्या कहता है: प्रेस काउंसिल कहती है कि पत्रकारों को अपनी प्रेस आईडी हमेशा स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करनी चाहिए। सबसे विवादित बिंदु यह है कि “तनावपूर्ण स्थितियों के दौरान पुलिस के आदेशों का पालन करें और बहस से बचें… विशेष रूप से तात्कालिक सुरक्षा कारणों से दिए गए कानूनी निर्देशों का पालन करें।”
पंचनामा (विश्लेषण):
जनसंचार का सिद्धांत कहता है कि पत्रकार जनता की आँख और कान है। यदि किसी विरोध प्रदर्शन में पुलिस बल-प्रयोग (Lathi-Charge) कर रही है, तो पत्रकार का काम उस घटना को ज्यों का त्यों (As it is) दुनिया के सामने लाना है। लेकिन, अक्सर ‘सुरक्षा’ के नाम पर पुलिस पत्रकारों को घटना स्थल से दूर कर देती है या उनके कैमरे बंद करवा देती है।
अगर पत्रकार ‘पुलिस के आदेशों का पालन’ करते हुए घटनास्थल से दूर चला जाएगा, तो पुलिस की ज्यादतियों को कौन रिकॉर्ड करेगा? क्या प्रेस काउंसिल यह भूल गई है कि एक पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना और सच खोजना है, न कि ‘यस सर’ कहकर पुलिस के हर आदेश को मान लेना?
Press Council new guidelines 2. पोज़िशनिंग और क्राउड सेफ़्टी (Positioning and Crowd Safety)
दिशा-निर्देश क्या कहता है: “टकराव की स्थिति में उचित और सुरक्षित दूरी बनाए रखें, खासकर जब पुलिस कार्रवाई होने वाली हो… अपने कैमरे या उपकरण पुलिस बैरिकेड्स या वाहनों से न बांधें।”
पंचनामा (विश्लेषण):
एक पुरानी कहावत है, “यदि आपकी तस्वीर अच्छी नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप घटना के काफी करीब नहीं थे” (If your pictures aren’t good enough, you aren’t close enough – Robert Capa)।
जब पुलिस प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई (Action) करती है, तो सबसे महत्वपूर्ण विज़ुअल्स वहीं से मिलते हैं। यदि पत्रकार ‘सुरक्षित दूरी’ बनाकर किसी इमारत की छत से रिपोर्टिंग करेगा, तो क्या वह ज़मीन पर प्रदर्शनकारियों की आवाज़, पुलिस की ज्यादती या असली संघर्ष को महसूस कर पाएगा? एक पत्रकार कोई तमाशबीन नहीं होता। उसे घटना के बीच में जाना होता है। यह गाइडलाइन पत्रकारों को ‘दूर से तमाशा देखने वाला’ बनाने की एक कोशिश लगती है।
Press Council new guidelines 3. और 4. जागरूकता और फर्स्ट एड (Awareness and First Aid): क्या पत्रकार ‘मेडिकल स्टाफ’ हैं?
दिशा-निर्देश क्या कहता है: प्रेस काउंसिल पत्रकारों को आपातकालीन किट (Emergency Kit), पानी, स्नैक्स, फ्लैशलाइट और चश्मे (Goggles) साथ रखने की सलाह देती है। साथ ही, यह भी कहती है कि टियर गैस (Tear Gas) के कनस्तरों को न छुएं।
पंचनामा (विश्लेषण): यह एक व्यावहारिक और अच्छी सलाह है। संघर्ष वाले क्षेत्रों में पत्रकारों की सुरक्षा सर्वोपरि है। लेकिन, सवाल यह है कि क्या मीडिया संस्थान (Media Organizations) अपने फील्ड रिपोर्टर्स को यह सारा सुरक्षा उपकरण (Protective Gear) मुहैया कराते हैं? प्रेस काउंसिल ने संस्थानों के लिए इस किट को अनिवार्य करने के बजाय सिर्फ पत्रकारों को सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है।
PCI Guidelines 5. समन्वय और संचार (Coordination and Communication): पुलिस के साथ समन्वय या ‘सेंसरशिप’ की शुरुआत?
दिशा-निर्देश क्या कहता है: “योजनाबद्ध प्रदर्शनों के लिए, मीडिया संगठनों को पुलिस और पीआरओ (Press Liaisons) के साथ समन्वय (Coordinate) करना चाहिए… और मीडिया के लिए ‘निर्धारित क्षेत्रों’ (Designated Media Staging Areas) की पहचान करनी चाहिए।”
पंचनामा (विश्लेषण): यह सबसे खतरनाक बिंदु है। यदि पत्रकार केवल पुलिस द्वारा बनाए गए ‘निर्धारित मीडिया क्षेत्रों’ (Designated Areas) से ही कवरेज करेंगे, तो उन्हें सिर्फ वही दिखेगा जो पुलिस उन्हें दिखाना चाहती है। इसे जनसंचार की भाषा में ‘गेटकीपिंग’ (Gatekeeping) कहा जाता है।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य स्वतंत्र रूप से (Independently) रिपोर्ट करना है। अगर पत्रकार ‘पुलिस के साथ समन्वय’ करके चलेंगे, तो क्या वे पुलिस की किसी भी असंवैधानिक कार्रवाई को दुनिया के सामने ला पाएंगे? यह ‘कोऑर्डिनेशन’ (Coordination) के नाम पर ‘सेंसरशिप’ (Censorship) की एक बारीक शुरुआत है।
PCI Guidelines 6. नैतिक और ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग (Ethical and Responsible Reporting): सच दिखाना ‘अनैतिक’ कैसे हो गया?
दिशा-निर्देश क्या कहता है: “रियल-टाइम में पुलिस की पोज़िशन या रणनीतिक हरकतों (Tactical Movements) का प्रसारण न करें, जिससे उनकी सुरक्षा से समझौता हो।” “पुलिस, प्रदर्शनकारियों और सरकार के बयानों को समान ‘पत्रकारिता की जांच’ (Journalistic Scrutiny) से तौलें।”
पंचनामा (विश्लेषण):
यह बिंदु पूरी तरह से पुलिस (Police) के पक्ष में झुका हुआ लगता है। जनसंचार के ‘वाचडॉग मॉडल’ (Watchdog Model) के अनुसार, प्रेस का काम सत्ता की खामियों को उजागर करना है। यदि पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को घेरने की कोई गुप्त रणनीति बना रही है, तो उसे रियल-टाइम में दिखाना जनता के प्रति पत्रकार की जवाबदेही है।
इसके अलावा, क्या प्रेस काउंसिल यह मानती है कि एक पीड़ित प्रदर्शनकारी और हथियारबंद पुलिस के बयान का वज़न ‘समान’ (Equal) होता है? एक पीड़ित व्यक्ति के पास अपनी पीड़ा होती है, जबकि पुलिस के पास सत्ता की ताक़त। दोनों को एक ही तराजू में तौलना ‘ऑब्जेक्टिविटी’ (Objectivity) के नाम पर एक भ्रम फैलाना है।
प्रेस काउंसिल का स्ट्रक्चर और उसकी ‘दंतहीनता’ (Toothless Tiger)
इस 6-सूत्रीय ज्ञान के बाद, हमें यह देखना होगा कि यह ज्ञान दे कौन रहा है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council new guidelines of India) की स्थापना 1966 में एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) के रूप में हुई थी। इसके अध्यक्ष आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं और इसमें 28 अन्य सदस्य होते हैं।
लेकिन, इस पूरे स्ट्रक्चर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह एक ‘दंतहीन बाघ’ (Toothless Tiger) है।
- कोई दंडात्मक अधिकार नहीं (No Punitive Powers): प्रेस काउंसिल किसी भी पत्रकार, अख़बार या पुलिस अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगा सकती और न ही किसी को सज़ा दे सकती है। यह केवल चेतावनी दे सकती है या ‘परिनिंदा’ (Censure) पारित कर सकती है।
- पुलिस द्वारा पत्रकारों को पीटे जाने पर खामोशी: हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ दिल्ली सहित अन्य जगहों पर प्रदर्शन (जैसे किसान आंदोलन या छात्र प्रदर्शन) कवर कर रहे पत्रकारों को पुलिस ने डिटेन किया, पीटा या उनके कैमरे तोड़ दिए।
- क्या प्रेस काउंसिल ने कभी दिल्ली पुलिस कमिश्नर को इन हरकतों के लिए तलब किया? क्या पुलिस वालों के खिलाफ कोई ‘परिनिंदा’ डिक्लेरेशन (Censure Declaration) पास किया गया? जवाब है- नहीं। जब पत्रकारों के अधिकार छिनते हैं, तो परिषद खामोश रहती है, लेकिन पत्रकारों को ‘लाइन में चलने’ के लिए दिशा-निर्देश जारी करने में यह सबसे आगे है।
पत्रकारिता पर खतरा: क्या सच बोलने की अब मनाही है?
भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India) द्वारा विरोध प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए जारी 6 पन्नों की नई एडवाइजरी ने देश के मीडिया और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में भूचाल ला दिया है। इस विशेष विश्लेषण ‘प्रेस काउंसिल का पंचनामा’ में हम पड़ताल कर रहे हैं कि क्या ‘सुरक्षा’ के नाम पर पत्रकारों को ‘स्टेजिंग एरिया’ में सीमित करना स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधी सेंसरशिप है?
जब 90% फील्ड रिपोर्टर्स बिना हेल्थ इंश्योरेंस और सुरक्षा किट के काम करते हैं, तब नियम केवल रिपोर्टर्स पर क्यों, अरबपति मीडिया मालिकों पर क्यों नहीं? जानिए 1966 में बनी संस्था आज ‘दंतहीन बाघ’ क्यों साबित हो रही है।
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दिल्ली प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों पर क्यों हो रहा है लाठीचार्ज? क्या मीडिया सेंसरशिप के साए में काम कर रहा है?
दिल्ली प्रदर्शन की जमीनी हकीकत का विश्लेषण यहां प्रस्तुत है। जिस तरह से पुलिस ने पत्रकारों पर हमला किया, वह प्रेस की आजादी पर एक बड़ा सवाल उठाता है। क्या आज का मुख्यधारा का मीडिया सच दिखाने के बजाय सरकारी प्रोपेगेंडा का हिस्सा बन चुका है?
गेटकीपिंग की उस व्यवस्था को भी समझेंगे, जहां अधिकारी तय करते हैं कि जनता तक कौन सी खबर पहुंचेगी। मीडिया सेंसरशिप के इस दौर में, निर्भीक इंडिया का यह विश्लेषण आपको उन तथ्यों से रूबरू कराएगा जिन्हें पर्दे के पीछे छिपाने की कोशिश की जा रही है।
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00:00 – Intro: सड़क पर लाठियां और प्रेस काउंसिल का फरमान
00:30 – प्रेस काउंसिल का पंचनामा: 15 अक्टूबर का आदेश
01:40 – ग्राउंड रिपोर्टिंग बनाम पुलिसिया फरमान
03:07 – सुरक्षा का भ्रम: रिपोर्टर का सच और अरबपति मालिक
04:25 – मीडिया ज़ोन या खुली सेंसरशिप?
05:33 – प्रेस काउंसिल: एक दंतहीन बाघ का इतिहास
06:48 – जनता की अदालत: #PressCouncilJawabDo
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लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask – PAA): प्रेस काउंसिल गाइडलाइंस (Press Council new guidelines Guidelines)
प्रश्न: क्या प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council new guidelines of India) पत्रकारों को सज़ा दे सकती है?
विश्लेषण: नहीं, पीसीआई (PCI) के पास पत्रकारों या मीडिया संस्थानों को सज़ा देने या जुर्माना लगाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यह केवल ‘परिनिंदा’ (Censure) कर सकती है, जो एक प्रकार की चेतावनी होती है।
प्रश्न: प्रेस काउंसिल की इस नई गाइडलाइन (Guidelines for Journalists Covering Protests) का मुख्य उद्देश्य क्या है? विश्लेषण: आधिकारिक तौर पर इसका उद्देश्य पत्रकारों की सुरक्षा और ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है। लेकिन इसका विश्लेषणात्मक पहलू यह बताता है कि यह पत्रकारों को पुलिस के ‘निर्धारित क्षेत्रों’ (Designated Areas) तक सीमित करने और उन्हें घटनास्थल से दूर रखने का एक प्रयास है।
प्रश्न: क्या प्रदर्शन कवर करते समय पत्रकारों को पुलिस के हर आदेश का पालन करना अनिवार्य है? विश्लेषण: पीसीआई गाइडलाइंस (PCI Guidelines) सलाह देती है कि तनावपूर्ण स्थितियों में पुलिस के निर्देशों का पालन किया जाए। लेकिन जनसंचार के सिद्धांत कहते हैं कि यदि पुलिस का आदेश सच को छिपाने या पत्रकार को उसका काम करने से रोकने के लिए है, तो पत्रकार को अपनी सूझबूझ से वहां रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
निष्कर्ष: पत्रकारिता का काम ‘पीआरओ’ (PRO) बनना नहीं है
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (Press Council new guidelines of India) की यह प्रेस विज्ञप्ति पत्रकारों को ‘सुरक्षित’ रखने के नाम पर उन्हें पुलिस प्रशासन का आज्ञाकारी सिपाही बनाने की एक सोची-समझी कोशिश नज़र आती है।
एक पत्रकार का काम सिर्फ सरकारी विज्ञापनों को छापना या दूर खड़े होकर तमाशा देखना नहीं होता। उसका काम उस ‘प्रोपेगेंडा’ के पीछे के सच को खोजना और उसे दुनिया के सामने लाना होता है। यदि पुलिस किसी प्रदर्शनकारी को अकारण पीट रही है, तो पत्रकार का धर्म है कि वह पास जाकर उस ज्यादती को कैमरे में कैद करे।
प्रेस काउंसिल को यह समझना होगा कि पत्रकारिता (Journalism) कोई ‘सेफ डेस्क जॉब’ नहीं है। जिस दिन पत्रकार पुलिस के बनाए ‘निर्धारित क्षेत्रों’ (Staging Areas) से रिपोर्टिंग करने लगेंगे और पुलिस की रणनीतियों (Tactical Movements) को छिपाने लगेंगे, उस दिन वे पत्रकार नहीं, बल्कि सरकार के पीआरओ (Public Relations Officer) बन जाएंगे।
सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक – नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 246 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा का एक हिस्सा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।।
Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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