विवेचना स्तम्भ

Press Freedom पर पुलिसिया दादागिरी थोड़ा जनसंचार का ज्ञान

प्रस्तावना – लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को औपनिवेशिक डंडे से हांकने का मुगालता पाले बैठी दिल्ली पुलिस (delhi police) जब अपनी कानूनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए ‘सदाचार’ का लबादा ओढ़ ले, तो समझ लीजिए कि सत्ता का अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा है।

प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) का ढोंग और जंतर-मंतर पर दुर्व्यवहार, एनएचआरसी (NHRC) का डंडा और आरोपी की पदोन्नति
प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) पर पुलिसिया दादागिरी

देश की राजधानी में प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) आज उस दोराहे पर खड़ी है जहाँ वर्दीधारी अफ़सर ज़मीनी रिपोर्टिंग कर रहीं महिला पत्रकारों के साथ सरेआम अभद्रता करते हैं, और फिर खाकी की साख बचाने के लिए सोशल मीडिया पर बचकाने एआई (AI) कार्टून चिपकाकर मीडिया को पत्रकारिता (media ethics) सिखाने की धृष्टता की जाती है।

प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) का ढोंग और जंतर-मंतर पर दुर्व्यवहार, एनएचआरसी (NHRC notice) का डंडा और आरोपी की पदोन्नति

राष्ट्रीय राजधानी में कानून-व्यवस्था की धज्जियां तब उड़ती दिखीं जब बीते दिनों नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर जन-आंदोलन को कवर कर रहीं तीन महिला पत्रकारों के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा खुलेआम बदसलूकी और यौन उत्पीड़न की शर्मनाक वारदात को अंजाम दिया गया।

यह किसी भीड़भाड़ का सामान्य धक्का-मुक्की वाला मामला नहीं था, बल्कि कार्यस्थल पर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहीं पेशेवर पत्रकारों की गरिमा पर सीधा पुलिसिया हमला था। मामले की विभीषिका इतनी गहरी थी कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC notice) को मीडिया रिपोर्ट्स का स्वतः संज्ञान लेना पड़ा।

एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को सीधा और कड़ा नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की और साफ चेताया कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों और प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) का खुला उल्लंघन है।

प्रशासनिक बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए कि जिस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच का ढोंग रचते हुए फाइल दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा (Crime Branch) को सौंपी गई, उसी विभाग के आरोपी अधिकारी को दंडित करने के बजाय पदोन्नति (Promotion) और सुरक्षित तैनाती का तोहफा थमा दिया गया। जब इस पर मीडिया हलकों में सवाल उठे, तो पुलिस मुख्यालय के जनसंपर्क अधिकारियों ने इसे “प्रशासनिक रूटीन ट्रांसफर” का खोखला नाम देकर पल्ला झाड़ लिया।

दिल्ली पुलिस के आलाकमान को यह बात अपने ज़हन में उतार लेनी चाहिए कि घटनास्थल पर रिपोर्टिंग कर रही महिला कोई मूकदर्शक या लाचार फरियादी नहीं होती। वह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत देश के 140 करोड़ नागरिकों की आंख, कान और आवाज़ बनकर वहाँ खड़ी होती है।

एक निर्भीक पत्रकार का रुतबा सत्ता की चौखट पर सलामी ठोकने वाले किसी भी वर्दीधारी बाबू से कहीं ऊंचा है। पुलिस सत्ता के राजनीतिक आकाओं की चाटुकारिता करने के लिए स्वतंत्र हो सकती है, लेकिन एक पत्रकार केवल और केवल जनता और सत्य के प्रति जवाबदेह होता है।

महिला पत्रकारों से छेड़छाड़ और बदसलूकी के गंभीर आरोपों से घिरे अफसरों को मलाईदार पोस्टिंग देकर दिल्ली पुलिस ने यह साबित कर दिया है कि उसके लिए कानून केवल आम जनता को डराने का औजार है, अपनों को बचाने की ढाल है।

प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) : एआई (AI) पोस्टर की नौटंकी और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) का धर्म

अपनी काली करतूतों पर मिट्टी डालने और एनएचआरसी की फटकार से ध्यान भटकाने के लिए दिल्ली पुलिस के फेसबुक हैंडल से एक एआई-जनरेटेड (AI-generated) ज्ञानवर्धक पोस्टर जारी किया गया। इस पोस्टर की बनावट ही पुलिस की कुंठित मानसिकता को दर्शाती है।

एक तरफ एक ‘सभ्य और आज्ञाकारी’ महिला पत्रकार का एआई चित्र बनाकर उसे दूर खड़े दिखाया गया है, और दूसरी तरफ एक महिला पत्रकार को पुलिस अधिकारी के मुंह में माइक ठूंसते हुए दिखाकर यह स्थापित करने की कोशिश की गई है कि सवाल पूछने वाले पत्रकार ‘उपद्रवी’ होते हैं। इसके बाद चार सूत्रीय फरमान जारी किए गए मान्य पहचान पत्र साथ रखें, उसे गले में लटकाकर प्रदर्शित करें, पुलिस ऑपरेशन में बाधा न डालें और प्रदर्शनों के दौरान ‘सुरक्षित दूरी’ बनाकर रखें।

दिल्ली पुलिस को यह अधिकार किसने दिया कि वह देश के चौथे स्तंभ को यह सिखाए कि पत्रकारिता कैसे की जाती है? सोशल मीडिया पर चंद आईटी सेल कर्मियों को बैठाकर पत्रकारों के ट्वीट्स की निगरानी करने से कोई महकमा ‘मीडिया लिटरेट’ (Media Literate) नहीं हो जाता।

दिल्ली पुलिस के पूरे महकमे में क्या कोई ऐसा अफ़सर है जिसने जनसंचार (Mass Communication) की किसी बुनियादी किताब को हाथ भी लगाया हो? क्या इन्हें मीडिया लॉ, प्रेस काउंसिल के कोड ऑफ एथिक्स या मास कम्युनिकेशन मॉडल्स की एबीसीडी भी पता है?

जिस दिन किसी वरिष्ठ संपादक ने इनके कमिश्नर को सामने बैठाकर ‘वॉचडॉग थियॉरी’ और ‘एजेंडा सेटिंग’ पर जिरह कर ली, उस दिन खाकी की बौद्धिक कंगाली पूरे देश के सामने बेपर्दा हो जाएगी।

दिल्ली पुलिस शायद यह गलतफहमी पाले बैठी है कि पत्रकारिता का मतलब उनके पीआरओ (PRO) द्वारा भेजी गई चाशनी में डूबी प्रेस विज्ञप्तियों (Press Releases) को जस का तस छाप देना और पुलिस की वाहवाही करना है। पुलिस कान खोलकर सुन ले पत्रकारिता का मूल धर्म सरकारी बयानों की री-राइटिंग नहीं, बल्कि खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) है।

हम जनता को सरकार से मिली आधिकारिक जानकारी का सीधा प्रसारण करते हैं, लेकिन वह जानकारी कितनी तथ्यात्मक है और प्रोपेगैंडा से कितनी मुक्त है, इसकी सच्चाई जांचने के लिए हम इन्वेस्टिगेशन जर्नलिज्म करते हैं। एक खोजी पत्रकार का काम ही यह है कि वह घटना स्थल पर जाए, बैरिकेड्स के उस पार झांके, पीड़ितों की सिसकियों को दर्ज करे और सत्ता-प्रायोजित कहानी की धज्जियां उड़ा दे।

जब सच को सामने लाने की बात आती है, तो भारतीय प्रेस को न कोई पुलिस रोक सकती है और न ही खाकी की कोई मनगढ़ंत गाइडलाइन। सवाल पूछने के लिए यदि हमें माइक आगे बढ़ाना आता है, तो सत्ता के प्रोपेगैंडा को तार-तार करने के लिए हमें पेन की धार तेज़ करना भी बखूबी आता है।

प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) पर 2010 से 2026: औपनिवेशिक मानसिकता और खाकी की चाटुकारिता

बतौर पत्रकार और मीडिया शोधार्थी, जब मैं दिल्ली पुलिस के इस पतन को देखता हूँ, तो यह कोई अचानक उपजी बीमारी नहीं लगती। वर्ष 2010 के उस दौर से, जब मैं दसवीं कक्षा का एक सामान्य छात्र था और मीडिया विमर्शों को कौतूहल से देखता था, मेरी पत्रकारिता में रुचि गहरी होने लगी थी। इसके बाद 2015 से 2018 के दौरान जब मैंने राजधानी के मीडिया संस्थानों में रहकर पत्रकारिता की ज़मीनी बारीकियों और व्यावहारिक रिपोर्टिंग का ककहरा सीखा, तब से लेकर वर्ष 2026 तक मैंने दिल्ली में कई सरकारें बदलते और खाकी का नैतिक पतन होते देखा है।

इस पूरे सफर के दौरान दिल्ली पुलिस कभी भी एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक फोर्स की तरह व्यवहार करती नहीं दिखी; वह हमेशा केंद्र की सत्ता में बैठी राजनीतिक ताकतों के एक आज्ञाकारी टूल (औजार) की तरह इस्तेमाल होती रही। ऐतिहासिक किसान आंदोलन का दौर रहा हो, जेएनयू-जामिया के छात्र आंदोलन रहे हों, या विभिन्न नागरिक विरोध प्रदर्शन दिल्ली पुलिस का एकमात्र एजेंडा जनता और मीडिया की आवाज़ को लाठियों, आंसुओं और बैरिकेड्स से कुचलना रहा है। यह रवैया किसी आज़ाद मुल्क की पुलिस का नहीं, बल्कि 1861 के पुलिस एक्ट वाली ब्रिटिश औपनिवेशिक मानसिकता का बदबूदार अवशेष है।

पूर्व में माननीय उच्च न्यायालय ने भी पुलिस तंत्र की इस चाटुकारिता पर कड़ा प्रहार करते हुए टिप्पणी की थी कि पुलिस बल कानून की सेवा करने के बजाय सत्ता की दलाली और जी-हुजूरी में लीन हो चुका है। इस संस्थागत सड़ांध पर ‘निर्भीक इंडिया’ डिजिटल पोर्टल पर मेरे नाम (नवनीत मिश्रा) से प्रकाशित विस्तृत संपादकीय विश्लेषण में मैंने इस मुद्दे को प्रमुखता से रेखांकित किया था।

दिल्ली पुलिस पत्रकारों को अपनी हद में रहने की हिदायत देने से पहले अपने गिरेबान में झांके और आत्ममंथन करे कि राजधानी में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को रोकने में वह कितनी बार विफल रही है।

निष्कर्ष और आगे की राह (Way Forward)

प्रेस स्वतंत्रता (Press Freedom) किसी पुलिस कमिश्नर के विवेक या गृह मंत्रालय की दया पर निर्भर नहीं है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) द्वारा प्रदत्त वह मौलिक अधिकार है जिसे कुचलने की कोशिश करने वाले कई तनाशाह इतिहास के कूड़ेदान में समा चुके हैं। जंतर-मंतर की घटना और उसके बाद जारी किया गया यह एआई पोस्टर दिल्ली पुलिस के दामन पर लगा वह दाग है जो मिटने वाला नहीं है। इस व्यवस्थागत अराजकता को सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

  • आरोपी अफसरों पर आपराधिक मुकदमा: एनएचआरसी की जांच को औपचारिकता न बनने दिया जाए। महिला पत्रकारों से यौन दुर्व्यवहार करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों और उन्हें पदोन्नति की ढाल देने वाले अफसरों पर तत्काल प्रभाव से बीएनएस की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें बर्खास्त किया जाए।
  • पुलिस अकादमी में मीडिया अध्ययन का अनिवार्य प्रशिक्षण: डंडा भांजने से पहले दिल्ली पुलिस के जवानों और वरिष्ठ अधिकारियों को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी और ग्राउंड मीडिया के संवैधानिक अधिकारों का पाठ पढ़ाया जाए।
  • एआई प्रोपेगैंडा बंद कर मूल काम पर लौटे पुलिस: दिल्ली पुलिस आधिकारिक हैंडल्स से मीडिया को बदनाम करने वाले हास्यास्पद एआई पोस्टर बनाना बंद करे और राजधानी में बेखौफ घूम रहे अपराधियों पर नकेल कसने में अपनी ऊर्जा लगाए।

पत्रकारिता किसी हुक्मरान की पालतू दासी नहीं है। जब-जब सत्ता जनता की आवाज़ दबाने के लिए खाकी का इस्तेमाल करेगी, तब-तब निर्भीक पत्रकार अपनी कलम और माइक को हथियार बनाकर सच को सत्ता की आंखों में झोंकते रहेंगे। खाकी अपनी सीमाएं याद रखे, क्योंकि लोकतंत्र पत्रकारों के सवालों से ज़िंदा है, पुलिस की लाठियों से नहीं। — नवनीत मिश्रा

आलोचक व लेखक – नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

जरूर से जरूर पढे और समझे इस देश में आपातकाल जैसा परिस्थिति है
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Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

Navneet Mishra

Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics. A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on "the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown". Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days. ---------------------------------------------------------------------------------- नवनीत मिश्रा वर्तमान में 'निर्भीक इंडिया' मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। 'आदर्श जीवन' दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और 'अमर उजाला' गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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