रवि किशन (Ravi Kishan) की टॉप 12 फिल्म
प्रस्तावना- “ज़िंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा!” रवि किशन (Ravi Kishan) का यह सिर्फ एक वायरल मीम या डायलॉग नहीं है; यह उस इंसान की असल ज़िंदगी का फलसफा है, जिसने फर्श से उठकर अर्श तक का सफर अपनी शर्तों पर तय किया है। आज डिजिटल युग में बहुमुखी अभिनेता रवि किशन (Ravi Kishan) सोशल मीडिया रील्स से लेकर बड़े पर्दे तक अपनी सशक्त अदाकारी के लिए जाने जाते हैं। नई पीढ़ी उन्हें एक संजीदा और मंझे हुए कैरेक्टर एक्टर के तौर पर पसंद कर रही है।

रवि किशन का संघर्ष (Ravi Kishan Struggle Story): 500 रुपये से शुरू हुआ सफर
जो लोग सिनेमा को करीब से फॉलो करते हैं, वो जानते हैं कि जौनपुर के एक छोटे से गांव बिषुईं से निकले रविंद्र श्यामनारायण शुक्ला का सफर इतना आसान नहीं था। संसदीय अभिलेख के अनुसार रवि किशन उर्फ रविंद्र श्यामनारायण शुक्ला का जन्म मुंबई के बांद्रा में हुआ था। इनके पैतृक घर जौनपुर के केराकत से जुड़ता है।
उनके पिता एक पुजारी थे और चाहते थे कि बेटा या तो पंडिताई करे या दूध का व्यापार। जब रवि ने एक्टिंग की बात की, तो पिता से बेल्ट से मार पड़ी थी। उस रात उनकी मां ने उन्हें 500 रुपये दिए और कहा, “तू भाग जा मुंबई, वरना तेरे पिता तुझे मार डालेंगे।”
उन्हीं 500 रुपयों और आंखों में करोड़ों के सपनों के साथ शुरू हुआ था एक ऐसे कलाकार का सफर, जिसे आज हम रवि किशन (Ravi Kishan) के नाम से जानते हैं। अगर आप खुद को सिनेमा का पक्का फैन मानते हैं, तो आपको उनकी ये फिल्में जरूर देखनी चाहिए:
रवि किशन की बेहतरीन फिल्में: जब अभिनय से जीता दिल (Ravi Kishan Best Movies)
- गंगा (Ganga – 2006)
क्यों देखें? यह भोजपुरी सिनेमा का इतिहास बदलने वाली फिल्म है। जब पर्दे पर सामने अमिताभ बच्चन (ठाकुर विजय सिंह) खड़े हों, तो बड़े-बड़े कलाकार सहम जाते हैं। लेकिन रवि किशन ने शंकर के किरदार में बिग बी की आँखों में आँखें डालकर जो बेखौफ और पावरफुल अभिनय किया, उसने साबित कर दिया कि वो सिर्फ क्षेत्रीय कलाकार नहीं बल्कि पैन-इंडिया क्षमता वाले एक्टर हैं। एक बागी और बेबस इंसान का गुस्सा और दर्द उन्होंने बहुत गहराई से निभाया है।
यादगार संवाद: “शरीर से अपाहिज हो गइल बानी, लेकिन हमार जमीर और हमार गुस्सा आज भी ओतने मजबूत बा!”
सीन की झलक: फिल्म की कहानी में, जब भोली-भाली और पढ़ी-लिखी लड़की ‘गंगा’ पर गांव के ताकतवर गुंडे लड़के की बुरी नज़र पड़ती है, तो गांव का सच्चे दिल वाला लड़का ‘शंकर’ (रवि किशन) उसे बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। गंगा की इज्जत और जान बचाने के लिए शंकर अकेले ही बहुत भयानक तरीके से भिड़ जाता है। इस जानलेवा लड़ाई में शंकर बहुत बुरी तरह से घायल होकर अपना पैर खो बैठता है। यानी वह जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाता है।
- 1971 (2007)
क्यों देखें? रवि किशन की सबसे अंडररेटेड और संजीदा फिल्मों में से एक। 1971 के युद्ध के वीरों (प्रिज़नर्स ऑफ वॉर – “युद्धबंदी”) पर बनी इस नेशनल अवार्ड विनिंग फिल्म में उन्होंने ‘कैप्टन जैकब’ का रोल निभाया है। इस फिल्म में कोई चीख-पुकार या लाउड डायलॉग्स नहीं हैं; उनकी खामोश आँखें और उनका ठहराव दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। यह फिल्म उनकी बारीक एक्टिंग क्षमता को दर्शाती है।
यादगार संवाद: “यार ये पाकिस्तान में पंजाबी रहते हैं? तो वो बोला के हाँ, रहते है इसने कहा कि सिंधी? वो बोला हाँ, सिंधी भी रहते हैं। तो ये बोला कि यार अपने मुसलमान भाई… तो बोला के हाँ, वो भी रहते हैं, पर पूछना क्या चाह रहा है? तो इसने कहा यार ये लोग तो हिंदुस्तान में भी रहते हैं। तो फिर पाकिस्तान क्यों बनाया था? तो जानते हैं सर वो क्या बोला? वो बोला कि गलती हो गई सर, गलती हो गई सर ये बनाके।”
सीन की झलक: यह सीन दर्शकों को अंदर तक झकझोर देता है। जब दीपक डोबरियाल रोते और कांपते हुए यह संवाद कहते हैं, तो यह सिर्फ एक किरदार की आवाज़ नहीं लगती, बल्कि उन लाखों लोगों की चीख लगती है जिन्होंने बंटवारे और उसके बाद हुए युद्धों में अपना सब कुछ खो दिया।
- वेलकम टू सज्जनपुर (Welcome to Sajjanpur – 2008)
क्यों देखें? श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित इस मास्टरपीस में रवि किशन ने ‘राम कुमार’ का किरदार निभाया है। जो लोग सोचते हैं कि रवि किशन सिर्फ लाउड एक्टिंग कर सकते हैं, उनके लिए यह फिल्म एक जवाब है। गांव के एक साधारण, सीधे-सादे लड़के के रोल में उनकी सहजता इतनी कमाल की है कि आप भूल जाएंगे कि यह वही इंसान है जो एक्शन फिल्मों में दस गुंडों को हवा में उड़ाता है।
यादगार संवाद: “तुम्हारी गर्दन तो एकदम सुराही जैसी है, पानी पीती होगी तो बिल्कुल ट्रांसपेरेंट दिखाई देता होगा।”
सीन की झलक: गांव के सीधे-सादे राम कुमार जब शोभा रानी का चेकअप करता है, तो यह संवाद इस मजेदार सीक्वेंस का हिस्सा है, जहाँ राम कुमार अपनी प्रेमिका शोभा रानी को इम्प्रेस करने के लिए उल्टी-सुल्टी बातें करता है।
- हमार देवदास (Hamar Devdas – 2011)
क्यों देखें? भोजपुरी में रवि किशन को हमेशा एक एग्रेसिव और ‘लार्जर-देन-लाइफ’ एक्शन स्टार माना जाता था। लेकिन क्लासिक नॉवेल ‘देवदास’ के इस अडैप्टेशन में उन्होंने अपने उस एक्शन-हीरो वाले अवतार को उतार फेंका। प्यार में टूटे, शराब में डूबे और खुद को मिटाते हुए आशिक के रूप में उनकी आँखों का खालीपन और ठहराव यह दिखाता है कि वो एक बेहतरीन इमोशनल एक्टर भी हैं।
यादगार संवाद: “बाउजी कहिले घर छोर द, माई कहिलस जिद छोर द, पारो कहिलस शराब छोर द, तु कहतारु शराब छोर द, केहु हमरा से ई काहे नाईखे कहत की ई दुनिया ही छोर द।”
सीन की झलक: एक टूटा हुआ आशिक, जिसके हाथ में शराब का ग्लास है और आंखों में एक अजीब सा खालीपन। रवि किशन इस डायलॉग को बिना किसी लाउड मेलोड्रामा के, बहुत ही ठहरे हुए और दर्द भरे अंदाज़ में बोलते हैं, जिससे पारो को खोने की उनकी तड़प सीधे आपके दिल तक पहुंचती है।
- देवरा बड़ा सतावेला (Devra Bada Satavela – 2010)
क्यों देखें? अगर आपको यह समझना है कि असल मायनों में भोजपुरी फिल्मों में ‘मास अपील’ क्या होती है, तो यह फिल्म परफेक्ट उदाहरण है। रोमांस, जबरदस्त पारिवारिक ड्रामा, मार-धाड़ और वो ठेठ भोजपुरिया कॉमेडी जिसके लिए थिएटर्स में सीटियां बजती हैं और पेपर के कट फेंके जाते हैं। यह फिल्म उनके रीजनल स्टारडम के सबसे सुनहरे दौर को दर्शाती है।
यादगार संवाद: “भोज खाए वाला भागेला रे, दुल्हिन लेके आवे वाला ना।”
सीन की झलक: फिल्म के इस सीन में रवि किशन का किरदार शादी के माहौल में खलनायक और उसके साथ खड़े उसके भाई के सामने होता है। खलनायक के सामने बेखौफ अंदाज़ में खड़े होकर वह अपनी देसी शैली में उसे ताना मारते हुए ये बात कहता है।
- मुक्काबाज़ (Mukkabaaz – 2017)
क्यों देखें? अनुराग कश्यप की इस फिल्म में रवि किशन ने एक दलित बॉक्सिंग कोच (संजय कुमार) का किरदार निभाया है। एक ऐसा सीन जहाँ वो अपनी बेबसी और सामाजिक व्यवस्था की कड़वी हकीकत बयां करते हैं, वो पूरी फिल्म का सबसे इमोशनल और झकझोर देने वाला पल है। यह रोल दिखाता है कि सही डायरेक्टर मिलने पर रवि किशन स्क्रीन पर कैसा जादू कर सकते हैं।
यादगार संवाद: “अपने टैलेंट का प्रमाण पत्र लेकर सोसाइटी में झंडा गाड़ने निकले हो? ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट है तुम किसको जानते हो, किसको पहचानते हो, कौन तुमको जानता है, कौन तुमको मानता है। और बड़े घर की कन्या पाने वाला फंडा तो हैये है। इसको कहते हैं पैंतरा।”
सीन की झलक: एक दलित बॉक्सिंग कोच, जो सिस्टम से लड़ते-लड़ते हार चुका है, अपनी लाचारी और गुस्से को एक साथ बाहर निकालता है। इस सीन में रवि किशन विनीत सिंह को सिखाते हुए कहते हैं’पैंतरा!’ रिंग के अंदर लड़े जाने वाले दांव-पेंच तो फिर भी आसान हैं, लेकिन रिंग के बाहर समाज, राजनीति, और दबंगई के दलदल में खुद को बचाए रखने और आगे बढ़ने के लिए जो दिमागी खेल खेलना पड़ता है, असल में वही ज़िंदगी का सबसे बड़ा ‘पैंतरा’ है।
- लक (Luck – 2009)
क्यों देखें? संजय दत्त और इमरान खान जैसे सितारों के बीच रवि किशन ने ‘राघवन’ नाम के एक साइकोपैथ सीरियल किलर का निगेटिव किरदार निभाया। जब वो स्क्रीन पर बिना किसी शिकन के मुस्कुराते हुए लोगों की जान लेते हैं, तो डर महसूस होता है। यह उनके करियर का सबसे डार्क और खतरनाक अवतार था, जो उनकी एक्टिंग की डाइवर्सिटी को दिखाता है।
यादगार संवाद: “ना 20 रुपये की रस्सी राघवन को तोड़ सकती है, ना 20 हज़ार की गड्डी राघवन को खरीद सकती है।”
सीन की झलक: इस एक डायलॉग से रवि किशन का किरदार यह साफ कर देता है कि वह पैसों के लिए नहीं, बल्कि खून बहाने के शौक और मौत से खेलने के ‘थ्रिल’ के लिए जीता है। राघवन का पागलपन पूरी फिल्म में बाकी सभी खिलाड़ियों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बना रहता है।
- ना घर के ना घाट के (Na Ghar Ke Na Ghaat Ke – 2010)
क्यों देखें? बिना किसी ओवर-द-टॉप या स्लैपस्टिक कॉमेडी के, सिर्फ अपनी परफेक्ट टाइमिंग, बॉडी लैंग्वेज और एक्सप्रेशंस के दम पर हंसाने की कला का नाम है यह फिल्म। इसमें उनका कॉमिक अवतार इतना नेचुरल है कि वो पूरी फिल्म की महफिल लूट ले जाते हैं।
यादगार संवाद: “भाई ने यूनिवर्सिटी में टॉप किएला है समझे ना।”
सीन की झलक: फिल्म में रवि किशन अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग और बॉडी लैंग्वेज के साथ इतने प्यारे तरीके से बोलते हैं कि आपके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान आ जाती है। इस सीन में रवि किशन का किरदार मदन खाचक सामने वाले को अपनी पढ़ाई का हवाला देकर अपनी धाक जमाने की कोशिश करता है।
- लापता लेडीज (Laapataa Ladies – 2024)
क्यों देखें? किरण राव द्वारा निर्देशित इस फिल्म में रवि किशन ने इंस्पेक्टर श्याम मनोहर का किरदार निभाया है। एक ऐसा पान चबाने वाला पुलिसवाला जो शुरू में रिश्वतखोर और शातिर लगता है, लेकिन अंदर से बेहद समझदार और भला इंसान है। इस रोल के लिए उन्हें काफी सराहना और फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। यह फिल्म दर्शाती है कि बिना किसी मेलोड्रामा के कैसे एक एक्टर सिर्फ अपने एक्सप्रेशंस से पूरे देश का दिल जीत सकता है।
यादगार संवाद: “कैसे बे, हम इतने साल से ट्राई कर रहे, ससुरी खोए नहीं रही है।”
सीन की झलक: फिल्म के इस मज़ेदार सीन में, पान चबाते हुए इंस्पेक्टर श्याम मनोहर पुलिस स्टेशन में दो आदमियों के साथ बेफिक्र अंदाज़ में बातचीत करता है। गुम हुई दुल्हनों के मामले की गंभीरता के बीच श्याम मनोहर अपनी शादीशुदा ज़िंदगी का मज़ाकिया किस्सा सुनाते हुए कहता है कि वह इतने सालों से कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी पत्नी कभी गुम ही नहीं होती।
रवि किशन के बेस्ट ओटीटी रोल्स: डिजिटल स्पेस में दमदार दस्तक (Ravi Kishan OTT Web Series)
- मामला लीगल है (Maamla Legal Hai – 2024)
क्यों देखें? पटपड़गंज डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के ‘जुगाड़ू’ वकील वी.डी. त्यागी के रूप में रवि किशन की परफॉर्मेंस ओटीटी स्पेस का एक बहुत बड़ा मास्टरक्लास है। भारतीय न्याय व्यवस्था के सिस्टम और वकीलों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर बनी इस कॉमेडी सीरीज़ में उनका देसी अंदाज़, बॉडी लैंग्वेज और कॉमिक टाइमिंग देखने लायक है। यह शो उनके करियर का एक नया आयाम खोलता है।
यादगार संवाद: “पटपड़गंज कोर्ट में कानून से ज़्यादा जुगाड़ चलता है, और जुगाड़ का दूसरा नाम वी.डी. त्यागी है!”
सीन की झलक: काला कोट पहने, वकील वी.डी. त्यागी पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कोर्ट के गलियारे में चलते हुए अपने देसी स्वैग में यह बात कहता है। उसकी चाल में एक अजीब सा एटीट्यूड है और चेहरे पर वो ‘सब संभाल लूंगा’ वाली चालाक मुस्कान है, जो दर्शकों को खूब भाती है।
- खाकी: द बिहार चैप्टर (Khakee: The Bihar Chapter – 2022)
क्यों देखें? नीरज पांडे की इस सीरीज़ में उन्होंने बाहुबली नेता ‘अभय सिंह’ का रोल निभाया है। बिहार के क्राइम, गैंगवार और राजनीति के गठजोड़ को उन्होंने इतनी जीवंतता और खौफनाक तरीके से पर्दे पर उतारा है कि आप स्क्रीन से नज़रें नहीं हटा पाते। उनका यह गंभीर और दबंग अवतार दिखाता है कि विलेन या ग्रे शेड के रोल्स में वो कितने असरदार हैं।
यादगार संवाद: “बिहार की सियासत और सत्ता का रास्ता हमारे यहाँ से होकर गुज़रता है!”
सीन की झलक: बाहुबली नेता अभय सिंह अपने रुतबे और घमंड में चूर होकर यह बात कहता है। उसके इर्द-गिर्द का खौफनाक माहौल और उसकी भारी आवाज़ में छिपी हुई धमकी, इस सीन को इतना इंटेंस बना देती है कि आप बिना पलक झपकाए बस स्क्रीन को घूरते रह जाते हैं।
- मत्स्य कांड (Matsya Kaand – 2021)
क्यों देखें? एसीपी तेजराज सिंह के किरदार में रवि किशन ने एक ऐसे सनकी, सख्त और अड़ियल पुलिस अफसर का रोल किया है जो क्रिमिनल को पकड़ने के लिए किसी भी नियम को तोड़ने से नहीं कतराता। रवि किशन का यह आक्रामक और पुलिसिया स्वैग इस थ्रिलर सीरीज़ को एक अलग ही लेवल पर ले जाता है।
यादगार संवाद: “अपराधी चाहे जितना भी शातिर हो, जब तेजराज सिंह पीछे पड़ता है तो रास्ता सीधे जेल का ही बचता है!”
सीन की झलक: एसीपी तेजराज सिंह अपनी वर्दी में, एक सनकी और सख्त पुलिस वाले के अंदाज़ में क्रिमिनल को चेतावनी देता है। उसकी आंखों में एक ऐसा जुनून है जो बताता है कि वह अपने शिकार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा। यह पूरा सीन उसके स्वैग और पुलिसिया रौब से भरा हुआ है।
सांस्कृतिक प्रभाव और सिनेमाई विरासत (Ravi Kishan Acting Legacy)
रवि किशन का फिल्मी सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अगर आपमें टैलेंट है, तो आप हर दौर में खुद को नया बना सकते हैं। 90 के दशक में संघर्ष, 2000 के दशक में भोजपुरी का बेताज बादशाह, और अब 2020 के दशक में अपनी मैच्योर एक्टिंग से ओटीटी और बॉलीवुड दोनों की जान बन चुके हैं।
तो अगली बार जब आप पर्दे पर रवि किशन को कोई नया किरदार निभाते हुए देखें, तो याद रखिएगा आप सिर्फ एक एक्टर को नहीं देख रहे हैं, आप उस 500 रुपये लेकर घर से भागे लड़के के सच हो चुके सपने को जी रहे हैं।

नाम- वैभव मिश्र
माध्यम व जनसंचार अध्ययन में स्नातक
डीडीयू से माध्यम व जनसंचार अध्ययन में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त करते हुए
स्वतंत्र लेखक व स्तंभकार (फिल्म पत्रकारिता विशेषज्ञ)

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