India Unorganized Sector रिपोर्ट का ‘पंचनामा’: 50 जिलों में सिमटा देश, बाकी भारत में सूखा और पलायन?
प्रस्तावना- पत्र सूचना कार्यालय (PIB) द्वारा भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) को लेकर 10 सितंबर 2026 को सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की एक बेहद महत्वपूर्ण प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। ‘निर्भीक इंडिया’ (Nirbhik India) की ओर से सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक नवनीत मिश्रा द्वारा इस रिपोर्ट की गहन समीक्षा (पंचनामा) की गई है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी यह रिपोर्ट देश के भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) की जमीनी आर्थिक सेहत का अब तक का सबसे बड़ा और पहला जिला-स्तरीय कच्चा चिट्ठा है।
सरकारी फाइलें अक्सर ऐसे भारी और जटिल शब्दों से भरी होती हैं कि आम जनता उन्हें समझ ही नहीं पाती। लेकिन जब हम पत्रकारिता और जनसंचार के नियमों के तहत इन कागज़ों की चीर-फाड़ करते हैं, तो पता चलता है कि यह महज़ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि हमारे देश की भयानक आर्थिक असमानता, मजबूरी में होते पलायन और पूर्वोत्तर भारत की महिलाओं की एक मौन क्रांति की कहानी है। आइए, अत्यंत सरल भाषा और रोजमर्रा के उदाहरणों के साथ इस पूरे आंकड़े का पारदर्शी विश्लेषण करते हैं।
‘असली’ भारत की तस्वीर: भारी शब्दों के पीछे छिपा भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector)
रिपोर्ट में बार-बार “गैर-निगमित गैर-कृषि प्रतिष्ठान” (Unincorporated Non-Agricultural Establishments) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। एक आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है?
इसे ऐसे समझिए: यह रिपोर्ट रिलायंस, टाटा या अडानी जैसी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों (निगमित क्षेत्र) के बारे में नहीं है। न ही यह खेतों में काम करने वाले किसानों (कृषि क्षेत्र) के बारे में है। यह रिपोर्ट उन लोगों की है जो हमारे गली-मोहल्ले की अर्थव्यवस्था चलाते हैं। आपकी कॉलोनी के नुक्कड़ पर चाय की टपरी लगाने वाला रामू, चौराहे पर बाल काटने वाला नाई, फुटपाथ पर कपड़े बेचने वाला व्यापारी, छोटी सी सिलाई की दुकान चलाने वाली आंटी और मोटर मैकेनिक ये सभी मिलकर भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) बनाते हैं।
यह वही क्षेत्र है जो भारत में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करता है। इस रिपोर्ट (एएसयूएसई 2025) में पहली बार बड़े पैमाने पर इस सेक्टर का जिला-स्तरीय (District-level) डेटा सामने रखा गया है।
भयानक आर्थिक असमानता: सिर्फ 50 जिले पाल रहे हैं भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) का बड़ा हिस्सा
इस प्रेस विज्ञप्ति का सबसे डराने वाला सच यह है कि विकास देश के हर कोने में नहीं पहुंच रहा है, बल्कि कुछ गिने-चुने जिलों में ही सिमट कर रह गया है।
एनएसओ के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में सर्वेक्षण के लिए 757 जिलों को शामिल किया गया था। लेकिन पूरे भारत के कुल प्रतिष्ठानों (दुकानों/कारोबारों), कुल कार्यबल (मज़दूरों) और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान (सकल मूल्य वर्धित – GVA) का लगभग एक-तिहाई (33%) हिस्सा केवल शीर्ष 50 जिलों के पास है। इससे भी आगे बढ़ें, तो देश का 10 प्रतिशत व्यापार केवल टॉप 10 जिलों में सिमटा हुआ है, जो गुजरात, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में फैले हैं।
भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) से आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है? (पलायन का कड़वा सच)
कल्पना कीजिए कि एक थाली में 757 लोगों के लिए खाना रखा है, लेकिन उसमें से 33% खाना सिर्फ 50 ताकतवर लोग खा रहे हैं। बाकी बचे 707 लोगों को बची-खुची 67% थाली में ही गुजारा करना पड़ रहा है। यही भारत की आर्थिक असमानता का सबसे नंगा सच है।
रिपोर्ट की तालिका (Table 1) पर गौर करें तो पता चलता है कि महाराष्ट्र में अकेले पुणे ज़िला 9.14% व्यापार संभालता है, गुजरात में सूरत 19.43% हिस्सेदारी रखता है, और उत्तर प्रदेश में प्रयागराज का योगदान 5.77% है। जब बिहार, झारखंड या उत्तर प्रदेश के छोटे जिलों (जैसे बलिया, गोड्डा या सहरसा) में व्यापार और रोज़गार के अवसर ही नहीं होंगे, तो वहां का युवा क्या करेगा?
ज़ाहिर है, वह अपनी रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर-परिवार छोड़कर सूरत (गुजरात), पुणे (महाराष्ट्र) या बेंगलुरु जैसे इन्हीं टॉप 50 जिलों की ओर पलायन (Migration) करने को मजबूर होगा। यह रिपोर्ट साफ बताती है कि छोटे जिलों में भयानक ‘आर्थिक सूखा’ है।
महिला सशक्तिकरण का ‘पूर्वोत्तर’ मॉडल: भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) में महिलाओं का दबदबा
इस नीरस सरकारी डेटा में सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर पूर्वोत्तर भारत (North-East India) से उभर कर आती है, जो बड़े और विकसित राज्यों के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
जब हम भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) में महिला उद्यमिता (Women Entrepreneurship) की बात करते हैं, तो महिला स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों की सबसे अधिक हिस्सेदारी वाले टॉप 10 जिले तेलंगाना, मणिपुर और मेघालय के हैं। सबसे बड़ी बात मिजोरम की है, जहाँ राज्य के हर एक ज़िले में कम से कम 50 प्रतिशत दुकानें और कारोबार महिलाओं के स्वामित्व में हैं।
कार्यबल (Workforce) में भी यही स्थिति है। देश के 237 जिलों में, कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी एक-तिहाई है, और 25 जिलों में तो आधे से ज्यादा (50% से अधिक) कामगार महिलाएं हैं।
- जनता के लिए एक सीधा सवाल:
उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्य, जो खुद को विकास के इंजन बताते हैं, वे महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने में इतने पीछे क्यों हैं? मिजोरम और मेघालय जैसे छोटे पहाड़ी राज्यों की महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अगर समाज उन्हें मौका दे, तो वे अर्थव्यवस्था की बागडोर अपने हाथों में ले सकती हैं। बड़े राज्यों को इस ‘पूर्वोत्तर मॉडल’ से सीखना चाहिए।
सांख्यिकी तंत्र का मज़ाक: देश की राजधानी ‘दिल्ली’ का भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) डेटा ही गायब!
इस पूरी विज्ञप्ति का सबसे हास्यास्पद और सिस्टम की नाकामी को दर्शाने वाला हिस्सा यह है कि इस “जिला-स्तरीय” रिपोर्ट में देश की राजधानी दिल्ली का कोई जिला शामिल ही नहीं है!
रिपोर्ट में इसका बहाना यह दिया गया है कि दिल्ली में “ग्रामीण आबादी बहुत कम होने और गांवों की संख्या सीमित होने के कारण” सभी जिलों को एक ही स्तर में मिला दिया गया। इसलिए दिल्ली के लिए अलग-अलग जिला-स्तरीय अनुमान तैयार ही नहीं किए जा सके।
यह एक बड़ी व्यावहारिक खामी है। दिल्ली देश के सबसे बड़े बाज़ारों (जैसे सदर बाज़ार, चांदनी चौक, करोल बाग) और लाखों असंगठित मज़दूरों का घर है। अगर देश के नीति-निर्माता अपनी ही राजधानी के अलग-अलग जिलों (जैसे पूर्वी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली) का सटीक आर्थिक डेटा ही नहीं जुटा पा रहे हैं, तो वे उन इलाकों के लिए लक्षित नीतियां (Targeted Policies) कैसे बनाएंगे?
लोग यह भी पूछते हैं (People Also Ask – PAA): भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) के बारे में
प्रश्न 1: भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) क्या होता है?
विश्लेषण: सरल शब्दों में, जो व्यवसाय सरकार के पास पूरी तरह से पंजीकृत (Registered) नहीं हैं, और जहाँ कर्मचारियों को भविष्य निधि (PF), पेंशन या फिक्स सैलरी जैसी कॉरपोरेट सुविधाएं नहीं मिलतीं, उसे असंगठित या गैर-निगमित क्षेत्र कहते हैं। आपके घर के पास की किराने की दुकान, रेहड़ी-पटरी वाले, ठेले वाले, दर्जी और पंचर बनाने वाले मैकेनिक इसी क्षेत्र का हिस्सा हैं। भारत में लगभग 80% से ज्यादा रोजगार यही क्षेत्र देता है।
प्रश्न 2: ASUSE 2025 रिपोर्ट क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
विश्लेषण: ASUSE का मतलब है ‘असंगठित क्षेत्र के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण’ (Annual Survey of Unincorporated Sector Enterprises)। 2025 के इस सर्वेक्षण से पहली बार जिला-स्तर पर यह पता चला है कि भारत के किस ज़िले में कितने छोटे व्यापार हैं, कितने लोग उनमें काम कर रहे हैं और वे कितनी कमाई कर रहे हैं। इसी रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 280 जिलों में प्रति कामगार कमाई (GVA) अखिल भारतीय औसत (1,56,539 रुपये) से अधिक है।
प्रश्न 3: छोटे जिलों से बड़े शहरों की ओर पलायन (Migration) क्यों नहीं रुक रहा है?
विश्लेषण: क्योंकि छोटे जिलों में आर्थिक गतिविधियां मृतप्राय हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 9 प्रतिशत जिलों में प्रति ज़िला 10,000 से भी कम प्रतिष्ठान हैं। जब एक पूरे ज़िले में रोज़गार देने वाली दुकानें और छोटे कारखाने ही नहीं होंगे, तो वहां का युवा मजबूर होकर उन्हीं टॉप 50 जिलों की तरफ भागेगा जहाँ देश का 33% व्यापार केंद्रित है।
निष्कर्ष: चमकते इंडिया और जूझते भारत के बीच की गहरी खाई
एनएसओ की यह रिपोर्ट केवल कागज़ों पर छपे आंकड़े नहीं हैं; यह चमकते ‘इंडिया’ और रोज़ी-रोटी के लिए जूझते ‘भारत’ के बीच की गहरी खाई का डिजिटल दस्तावेज़ है। जब तक सरकार अपनी नीतियों को उन 700 पिछड़े जिलों तक नहीं पहुंचाती जो इस अर्थव्यवस्था में हाशिए पर पड़े हैं, तब तक भारत का असंगठित क्षेत्र (India Unorganized Sector) केवल पलायन का दर्द और गरीबी ही झेलेगा। वहीं दूसरी ओर, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों ने पूरे देश को यह सिखाया है कि असली विकास महिलाओं के हाथों से ही होकर गुज़रता है।
सरकारी विज्ञप्ति समीक्षक - नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

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Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
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नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

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