कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) से भारतीय कार्टून क्रांति
कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) ने जब 1960 के दशक में भारतीय चित्रकला के पटल पर स्याही बिखेरनी शुरू की, तो किसी ने नहीं सोचा था कि अमेरिका से पत्राचार (Distance Learning) के जरिए कार्टूनिंग सीखने वाला एक शरणार्थी नौजवान, पश्चिमी ‘सिक्स-पैक’ सुपरहीरो संस्कृति को एक लाल पगड़ी और लकड़ी की छड़ी से हमेशा के लिए ध्वस्त कर देगा।

15 अगस्त 1938 को अविभाजित भारत के कसूर (अब पाकिस्तान) में जन्मे प्राण कुमार शर्मा ने जिस दौर में अपनी तूलिका उठाई, उस दौर में भारतीय मानस विदेशी सिंडिकेटेड कॉमिक्स फैंटम, मैंड्रेक और सुपरमैन का मानसिक गुलाम बना हुआ था। उन्होंने न केवल इस औपनिवेशिक तिलस्म को तोड़ा, बल्कि चाचा चौधरी (Chacha Chaudhary) जैसे अमर चरित्र गढ़कर भारतीय लोकमानस को उसकी अपनी माटी का नायक सौंप दिया।
कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) का सफर कसूर से ग्वालियर तक: विभाजन का दंश और ‘दाबू’ का पहला रेखाचित्र
प्राण कुमार शर्मा का बचपन उस त्रासदी की नींव पर टिका था जिसने उपमहाद्वीप का भूगोल और इतिहास बदल दिया। 1947 के खूनी विभाजन के समय उनका परिवार कसूर से सब कुछ छोड़कर भारत आया और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में शरण ली। विभाजन के उस भयानक मानवीय संत्रास ने युवा प्राण के भीतर एक गहरी कसक छोड़ दी थी। उन्होंने तय किया कि वे दुनिया को उस खौफ और आंसुओं से बाहर निकालने के लिए ‘हास्य और व्यंग्य’ को अपना हथियार बनाएंगे।
ग्वालियर से राजनीति विज्ञान (Political Science) में एम.ए. करने के बाद वे बंबई (मुंबई) पहुंचे और विख्यात सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया। लेकिन उस दौर में भारत में आधुनिक कार्टून स्ट्रिप्स और कॉमिक बुक ले-आउट सिखाने वाला कोई औपचारिक संस्थान नहीं था। यहीं प्राण के जीवन का वह अनसुना अध्याय शुरू होता है, जिसे मुख्यधारा का इतिहास अक्सर नजरअंदाज कर देता है:
- न्यूयॉर्क से पत्राचार का गुप्त प्रशिक्षण: प्राण ने अमेरिका के कनेक्टिकट स्थित ‘फेमस आर्टिस्ट्स स्कूल’ (Famous Artists School) से पांच साल का कार्टूनिंग और इलस्ट्रेशन का कॉरेस्पोंडेंस कोर्स पूरा किया। वे डाक के जरिए असाइनमेंट भेजते और अमेरिकी उस्तादों से पेन-एंड-इंक, पैनल डिवीजन और विजुअल पेसिंग की तकनीक सीखते थे।
- ‘दैनिक मिलाप’ और दाबू का जन्म (1960): 1960 में दिल्ली के उर्दू/हिंदी अखबार ‘दैनिक मिलाप’ में प्राण ने अपना पहला पेशेवर कॉमिक स्ट्रिप शुरू किया, जिसका नाम था ‘दाबू’ (Daabu)। दाबू एक किशोर लड़के और उसके साथ रहने वाले एक विलक्षण वैज्ञानिक ‘चाचा चक्रम’ की कहानी थी।
- भविष्य की प्रयोगशाला: यही ‘दाबू’ स्ट्रिप असल में वह प्रयोगशाला थी जहां प्राण ने यह परखा कि भारतीय पाठक केवल पश्चिमी अनुकरण नहीं चाहते, बल्कि वे शुद्ध देसी संवाद, घर-आंगन की भाषा और मोहल्ले के किस्से देखना चाहते हैं।
फैंटम को चुनौती: चाचा चौधरी (Chacha Chaudhary) की अवधारणा कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) से कैसे जन्मी?
1960 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय कॉमिक्स बाजार पर इंद्रजाल कॉमिक्स का एकाधिकार था, जो अमेरिकी ‘फैंटम’ (The Phantom) और ‘मैंड्रेक द मैजिशियन’ का हिंदी अनुवाद छापते थे। उन कॉमिक्स में नायक नीली त्वचा चिपकाने वाली पोशाक पहनता था, दो पिस्तौलों से गोलियां बरसाता था और गुफाओं में रहता था।
प्राण कुमार शर्मा ने इस कंटेंट गैप (Content Gap) को सबसे पहले भांपा। उन्होंने खुद से एक बुनियादी दार्शनिक सवाल पूछा: क्या किसी समाज का रक्षक बनने के लिए भारी-भरकम डोले-शोले, चमगादड़ जैसी पोशाक या बंदूकों की जरूरत है? क्या एक साधारण भारतीय बुजुर्ग अपनी बुद्धि के बल पर समाज का सबसे बड़ा संकटमोचक नहीं बन सकता?

1969 में प्रसिद्ध बाल पत्रिका ‘लोटपोट’ (Lotpot) के पन्नों पर पहली बार चाचा चौधरी (Chacha Chaudhary) का अवतरण हुआ। प्राण ने जानबूझकर उन्हें कोई दिव्य शक्ति नहीं दी। उनकी लाल पगड़ी उत्तर भारत की पारंपरिक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक थी, उनकी सफेद लटकती मूंछें बुजुर्गियत के तजुर्बे का आईना थीं, और उनकी लकड़ी की छड़ी कोई जादुई छड़ी नहीं, बल्कि केवल सोचने के दौरान जमीन पर टिकने वाला सहारा थी। “चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है”—यह केवल एक पंचलाइन नहीं थी, बल्कि ज्ञान और बुद्धि को बाहुबल पर वरीयता देने वाला भारतीय दर्शन का जीवंत उद्घोष था।
बृहस्पति से आया साबू: हॉलीवुड के एलियन बनाम कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) का मासूम दानव
जब चाचा चौधरी की लोकप्रियता बढ़ने लगी, तो प्राण के सामने एक स्वाभाविक कथात्मक चुनौती (Storytelling Challenge) आई: यदि चाचा चौधरी केवल दिमाग से लड़ते हैं, तो जब सामने से कोई 100 टन की चट्टान या तोपों की मार आ जाए, तब क्या होगा?
हॉलीवुड ने हमेशा एलियंस को पृथ्वी पर हमला करने वाले, इंसानों का खून चूसने वाले खूंखार राक्षसों के रूप में दिखाया था। लेकिन 1972 में प्राण ने जब साबू (Sabu) को गढ़ा, तो उन्होंने इस एलियन मिथक को पूरी तरह उलट दिया:
- बृहस्पति ग्रह (Jupiter) का अप्रवासी: साबू को किसी सुदूर गैलेक्सी का विनाशक नहीं, बल्कि सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह ‘बृहस्पति’ से आया एक सीधा-सादा, विशालकाय प्राणी बनाया गया।
- विनाश नहीं, 108 रोटियों का भोलापन: साबू 15 फीट लंबा था, एक मुक्के से दीवारें गिरा सकता था, लेकिन उसका दिल एक अबोध बच्चे जैसा था। वह चाची के हाथ की बनी 108 रोटियां, एक पतीला हलवा और कई बाल्टी लस्सी पीकर खुश रहता था।
- ज्वालामुखी और क्रोध का मेटाफर: “जब साबू को गुस्सा आता है तो कहीं दूर ज्वालामुखी फटता है”—इस एक पंक्ति ने भारतीय बच्चों के मन में प्रकृति और साबू के रिश्ते को ऐसा स्थापित किया कि वह डर का नहीं, बल्कि सुरक्षा का सबसे बड़ा संबल बन गया।
राका (Raka) का जन्म: साबू के समानांतर प्राण ने जब अमर विलेन ‘राका’ को बनाया, जिसने एक तांत्रिक के जादुई अर्क को पीकर अमरता पाई थी, तो यह भारतीय कॉमिक्स इतिहास का सबसे बड़ा द्वंद्व बन गया। राका को कभी मारा नहीं जा सकता था—उसे कभी समुद्र की गहराइयों में तो कभी बर्फ की चट्टानों में जमाकर ही रोका जा सकता था।
सामाजिक यथार्थ के गुमनाम पात्र: बिल्लू, पिंकी, रमन और श्रीमतीजी
कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) केवल एक कॉमिक्स निर्माता नहीं थे, वे 1970 और 1980 के दशक के बदलते भारतीय मध्यवर्ग के सबसे बड़े समाजशास्त्रीय दस्तावेजनकर्ता (Sociological Chronicler) थे। उन्होंने समाज के हर वर्ग और हर उम्र के लिए एक अलग चरित्र का ताना-बाना बुना:
- श्रीमतीजी (Shrimatiji – 1968): ‘सरिता’ पत्रिका में प्रकाशित यह स्ट्रिप भारतीय कॉमिक्स की पहली स्वतंत्र महिला केंद्रीय पात्र थी। शीला और उनके पति किशोर बाबू के माध्यम से प्राण ने बढ़ती महंगाई, पड़ोसियों की ईर्ष्या, मध्यमवर्गीय बजट और गृहणियों के संघर्ष को व्यंग्य के साथ दर्ज किया।
- बिल्लू और उसके माथे के बाल (Billoo – 1973): गली क्रिकेट खेलने वाला, कान पर पैंसिल लटकाने वाला और कर्नल ढिल्लों के बाग से आम चुराने वाला बिल्लू हर मोहल्ले का लड़का था। प्राण ने उसके माथे पर बालों की लट ऐसी गिराई कि उसकी आंखें कभी नहीं दिखाई गईं। इसके पीछे प्राण का गहरा मनोवैज्ञानिक दर्शन था: वे चाहते थे कि भारत का हर किशोर बिल्लू के चेहरे में खुद की आंखें और खुद की पहचान देख सके।
- पिंकी और कुत-कुत गिलहरी (Pinki – 1978): जहां पश्चिमी ‘डेनिस द मिनेस’ केवल शैतानी और उपद्रव का प्रतीक था, वहीं प्राण की पांच साल की ‘पिंकी’ हमेशा दूसरों की मदद करने के चक्कर में पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लेती थी। उसका पड़ोसी ‘झपटजी’ और पालतू गिलहरी ‘कुत-कुत’ आज भी क्लासिक हास्य के मील के पत्थर हैं।
रमन और दफ्तर की राजनीति (Raman): नेहरू जैकेट पहनने वाला एक ईमानदार क्लर्क और उसका लालची, कामचोर बॉस। रमन के जरिए प्राण ने 1980 के दशक के सरकारी दफ्तरों के बाबू-कल्चर और लालफीताशाही पर वह तीखा कटाक्ष किया जो बड़े-बड़े संपादकीय नहीं कर पाते थे।
डायमंड कॉमिक्स और ए.एच. व्हीलर: रेलवे स्टेशनों से घर-घर तक क्रांति
1970 के दशक के अंत तक कॉमिक्स केवल अमीर और अंग्रेजीदां बच्चों का शौक मानी जाती थी। तभी प्राण की मुलाकात प्रकाशक गुलशन राय से हुई और इस जुगलबंदी ने डायमंड कॉमिक्स (Diamond Comics) के बैनर तले भारतीय पब्लिशिंग का चेहरा बदल दिया।
- सस्ते पॉकेट बुक्स का मॉडल: प्राण ने कॉमिक्स के आकार को छोटा (Pocket Book Size) किया और उसकी कीमत 2 से 5 रुपये के बीच रखी।
- ए.एच. व्हीलर (A.H. Wheeler) का नेटवर्क: उत्तर भारत के रेलवे स्टेशनों पर स्थित ए.एच. व्हीलर के बुकस्टॉलों ने प्राण की कॉमिक्स को रेल यात्रा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। ट्रेन के डिब्बे में सफर करता हुआ व्यापारी हो, नौकरीपेशा हो या स्कूल जाता बच्चा—हर किसी के हाथ में चाचा चौधरी (Chacha Chaudhary) की कॉमिक्स दिखने लगी।
- बहुभाषी प्रसार: प्राण की कॉमिक्स का अनुवाद हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु और उर्दू समेत 10 से अधिक भाषाओं में हुआ। प्राण के बनाए 500 से अधिक शीर्षकों (Titles) की 10 करोड़ से अधिक प्रतियां बिकीं, जो उस दौर के प्रिंट मीडिया का एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड था।
वैश्विक मान्यता: ‘भारत के वॉल्ट डिज्नी’ का अमर दस्तावेज
प्राण के अभूतपूर्व योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब आधिकारिक मुहर मिली जब 1976 में प्रख्यात अमेरिकी इतिहासकार मौरिस हॉर्न (Maurice Horn) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द वर्ल्ड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ कॉमिक्स’ (The World Encyclopedia of Comics) में प्राण कुमार शर्मा को स्थान दिया। हॉर्न ने उन्हें सीधे तौर पर “भारत का वॉल्ट डिज्नी” (Walt Disney of India) की उपाधि से नवाजा।
1995 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने उन्हें भारतीय हास्य विधा में अप्रतिम योगदान के लिए सम्मानित किया। 2001 में जब केतन मेहता ने चाचा चौधरी पर आधारित टीवी धारावाहिक बनाया, जिसमें रघुवीर यादव ने चाचा चौधरी का जीवंत अभिनय किया, तो यह भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे प्रिय धारावाहिक बन गया।
5 अगस्त 2014 को 75 वर्ष की आयु में कैंसर से जूझते हुए प्राण कुमार शर्मा ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया। मरणोपरांत भारत सरकार ने 2015 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ (Padma Shri) से अलंकृत किया।
आज जब डिजिटल स्क्रीन्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बच्चों की कल्पनाशक्ति सिमट रही है, तब कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा (Cartoonist Pran Kumar Sharma) की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि एक सादे कागज पर काली स्याही और शुद्ध भारतीय हास्य के जरिए पूरी दुनिया को जीता जा सकता है। उन्होंने हमें सिखाया कि जब भी समाज में बुराई और ताकत का अहंकार बढ़ेगा, तो उसका मुकाबला करने के लिए बंदूक नहीं, बल्कि एक लाल पगड़ी वाले बुजुर्ग की तरह शांत रहकर दिमाग को कंप्यूटर से भी तेज दौड़ाना होगा।
लेखक - नवनीत मिश्र
पत्रकार व मीडिया शोधार्थी
जनसंचार व मीडिया अध्ययन में मास्टर

निर्भीक इंडिया (NIRBHIK INDIA) एक समाचार पत्र नही अपितु 245 साल से भी लम्बे समय से चल रहे पत्रकारिता की विचारधारा है, जो हमेशा लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को मान्यता देने एवं जनता सर्वोपरि की विचारों का प्रतिनिधित्वकत्र्ता है। आप सभी हमारे साथ जुड़े अपने तन, मन व धन से हमें ताकत दें जिससे कि हम आप (जनता) के लिए आप (जनता) के द्वारा, आप (जनता) के आदेशों पर केन्द्र से सवाल करते हुए एक पूर्ण लोकतंत्र बना सकें।
Navneet Mishra is a seasoned journalist currently associated with Nirbhik India and its digital portal, nirbhikindia.in. With over six years of experience across print and digital platforms, Navneet specializes in politics, sports, economics, and geopolitics.
A Master’s graduate in Mass Communication from Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University, he is also a dedicated media scholar. His academic research focuses on “the pivotal role of Gorakhpur’s Hindi newspapers during the Indian freedom struggle against the British Crown”. Before joining Nirbhik India, Navneet spent five years at Adarsh Jeevan and gained valuable field experience at Amar Ujala Gorakhpur as training reporter only for 5 days.
———————————————————————————-
नवनीत मिश्रा वर्तमान में ‘निर्भीक इंडिया’ मीडिया समूह से जुड़े हैं। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है। पत्रकारिता के अपने 6 वर्षों के सफर में उन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों डेस्क पर काम किया है। उनके शोध का विषय ब्रिटिश शासन के खिलाफ गोरखपुर के अखबारों का योगदान रहा है, जो उनकी ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मामलों (Geopolitics) पर निरंतर लिखते रहे हैं। ‘आदर्श जीवन’ दैनिक में 5 साल का कार्यकाल और ‘अमर उजाला’ गोरखपुर में ट्रेनिंग रिपोर्टिंग के तौर पर मात्र 5 दिन काम क्या है उनकी लेखनी को और भी निखारता है।

You must be logged in to post a comment.